अमेरिका–सऊदी असैन्य परमाणु समझौते के प्रभाव
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यह समझौता पश्चिम एशिया में ऊर्जा सहयोग के साथ-साथ परमाणु अप्रसार और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाला कदम है।
प्रमुख प्रभाव :
- परमाणु अप्रसार की चुनौती : यदि सऊदी अरब को परमाणु ऊर्जा संबंधी गतिविधियों में अधिक छूट मिलती है, तो क्षेत्र में परमाणु प्रसार की आशंका बढ़ सकती है।
- ईरान पर प्रभाव : ईरान अपने यूरेनियम विस्तार के अधिकार पर और दृढ़ हो सकता है तथा अमेरिका की नीति को दोहरे मानदंड के रूप में देख सकता है।
- ईरान–सऊदी प्रतिद्वंद्विता : दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
- इजरायल की सुरक्षा चिंता : क्षेत्र में इजरायल की परमाणु श्रेष्ठता को चुनौती मिलने की आशंका बढ़ेगी।
- अब्राहम अकॉर्ड : अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इस समझौते के माध्यम से इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध सामान्य करे। लेकिन सऊदी अरब की स्थिति स्पष्ट रही है कि इजरायल से संबंध सामान्य करने के लिए फिलिस्तीनी राज्य की दिशा में एक विश्वसनीय मार्ग होना आवश्यक है। अतः समझौते का राजनीतिक कार्यान्वयन जटिल हो सकता है।
- अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा : खाड़ी में अमेरिकी प्रभाव बढ़ने से चीन अपनी गतिविधियाँ हिंद-प्रशांत में और तेज कर सकता है।
भारत पर प्रभाव –
- ऊर्जा सुरक्षा : खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता से तेल की कीमतों और भारत के आयात बिल पर प्रभाव पड़ सकता है।
- प्रवासी भारतीय : खाड़ी देशों में भारतीय समुदाय और उससे जुड़े रेमिटेंस भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- रणनीतिक संतुलन : भारत को सऊदी अरब, यूएई, इजरायल, ईरान और अमेरिका के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने होंगे।
- ईरान संबंध : ईरान भारत के लिए मध्य एशिया तक संपर्क तथा चाबहार के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
- चीन का मुद्दा : यदि चीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी गतिविधियाँ बढ़ाता है, तो भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग का महत्व बढ़ेगा।
क्वाड का महत्व : हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त बनाए रखने के लिए भारत को जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ नौसैनिक सहयोग मजबूत करना होगा। इसलिए परमाणु सहयोग को केवल ऊर्जा परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और वैश्विक शक्ति-संतुलन के व्यापक संदर्भ में देखना आवश्यक है।
‘द इकोनॉमिक टाइम्स‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 28/07/26