भारतीय शिक्षा व्यवस्था की अव्यवस्था से जुड़े कुछ बिंदु

Afeias
25 Aug 2026
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शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता का प्रश्न –

1948-49 के विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने चेतावनी दी थी कि सरकारी सहायता का अर्थ शैक्षणिक नीतियों और कार्यप्रणाली पर सरकारी नियंत्रण नहीं होना चाहिए। आज अत्यधिक राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप से संस्थानों की शैक्षणिक स्वतंत्रता, नवाचार और बौद्धिक विकास प्रभावित हो रहा है।

विभिन्न राज्यों में सरकार बदलने के साथ शिक्षा नीतियों में बदलाव, भाषा को लेकर विवाद तथा राजनीतिक हस्तक्षेप शिक्षा-व्यवस्था में असंगति पैदा करते हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को पर्याप्त स्वायत्तता देते हुए उनसे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।

पहुँच बढ़ी, लेकिन शिक्षा का दायरा संकुचित हुआ –

शिक्षा का विस्तार मुख्यतः नामांकन और विद्यालयों तक पहुँच बढ़ाने पर केंद्रित रहा है। लेकिन शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों—जैसे हस्तकला, व्यावहारिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता, रचनात्मकता और समस्या-समाधान – को अक्सर सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों तक सीमित कर दिया गया है।

बुनियादी सुविधाओं की कमी –

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर के एक इंटर कॉलेज में लगभग 1,500 विद्यार्थियों द्वारा स्वच्छ पेयजल, पंखों और शौचालयों की मांग को लेकर विरोध करना शिक्षा-व्यवस्था की बुनियादी विफलताओं को दर्शाता है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार केवल कक्षा में प्रवेश तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए सम्मानजनक और सुरक्षित शिक्षण वातावरण भी आवश्यक है।

पहुँच के साथ गुणवत्ता की उपेक्षा –

शिक्षा नीति लंबे समय तक नामांकन और विद्यालयों की संख्या बढ़ाने पर केंद्रित रही, जबकि सीखने की वास्तविक गुणवत्ता पीछे छूट गई।

परिणामस्वरूप अनेक विद्यार्थियों में कक्षा के अनुरूप पढ़ने, लिखने और बुनियादी गणितीय क्षमता का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता है।

परीक्षा-केंद्रित शिक्षा की समस्या –

शिक्षा की गुणवत्ता को केवल अधिक परीक्षाओं, मानकीकरण या तकनीक के माध्यम से नहीं सुधारा जा सकता। बच्चों को एक परीक्षा से दूसरी परीक्षा की ओर लगातार धकेलने से –

  • रटने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
  • जिज्ञासा और रचनात्मकता कम होती है।
  • मानसिक दबाव बढ़ता है।
  • सीखने का उद्देश्य केवल अंक और रैंक तक सीमित हो जाता है।

शिक्षक शिक्षा-सुधार की केंद्रीय कड़ी –

कक्षा में वास्तविक बदलाव तभी संभव है, जब शिक्षक प्रशिक्षित, प्रेरित और सक्षम हों। इसके लिए आवश्यक है कि –

  • शिक्षक भर्ती पारदर्शी और योग्यता-आधारित हो।
  • शिक्षक प्रशिक्षण को व्यावहारिक और निरंतर बनाया जाए।
  • शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों का प्रशिक्षण मिले।
  • शिक्षकों को पर्याप्त शैक्षणिक स्वतंत्रता दी जाए।

कोचिंग उद्योग का बढ़ता प्रभाव –

प्रतियोगी परीक्षाओं की अत्यधिक महत्ता ने विद्यालयी शिक्षा को कई बार केवल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी का माध्यम बना दिया है।

इंजीनियरिंग और चिकित्सा शिक्षा में राजनीति, निजी संस्थानों और कोचिंग उद्योग के बीच बने हित-संबंधों ने शिक्षा की गुणवत्ता और समान अवसरों को प्रभावित किया है।

महँगी कोचिंग आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए असमानता बढ़ाती है तथा शिक्षा को सामाजिक अधिकार के बजाय बाजार-आधारित सेवा में बदल सकती है।

आगे की राह –

भारत को शिक्षा में केवल “पहुँच” से आगे बढ़कर गुणवत्ता, समानता, कौशल और स्वायत्तता पर ध्यान देना होगा। भारत की शिक्षा-व्यवस्था को केवल नई योजनाओं या अधिक परीक्षाओं की नहीं, बल्कि एक व्यापक “सिस्टम रीबूट” की आवश्यकता है। शिक्षा ऐसी हो, जो बच्चों को केवल अंक और प्रमाणपत्र न दे, बल्कि उन्हें –

  • सोचने,
  • प्रश्न करने,
  • कौशल विकसित करने,
  • रचनात्मक बनने,
  • और बदलती दुनिया में सार्थक योगदान देने योग्य बनाए।

प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए विरोध या धरना करने की आवश्यकता न पड़े, यही एक न्यायपूर्ण और सक्षम शिक्षा-व्यवस्था का लक्ष्य होना चाहिए।

द टाइम्स ऑफ इंडियामें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 31/07/26