कोल एक्सचेंज नियम से ऊर्जा संतुलन की उम्मीद
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हाल ही में केंद्र सरकार ने कोयला एक्सचेंज नियम, 2026 प्रस्तुत किए हैं। फिलहाल भारत के ऊर्जा क्षेत्र की रीढ़ कोयला है। देश में 70% विद्युत की पूर्ति कोयले के जरिए ही होती है। हमारा देश दुनिया का दूसरा बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता है। यह कोयले का सबसे बड़ा आयातक भी है।
सरकार के इस एक्सचेंज प्रस्ताव के क्या मायने हैं –
वर्तमान परिदृश्य –
- अधिकांश कोयला लेन-देन उत्पादकों और खरीदारों के बीच दीर्घकालिक अनुबंधों के माध्यम से होता (विशेषकर बिजली क्षेत्र के लिए)।
- इसके बाद नीलामी, आयात और कैप्टिव खनन की बारी आती है।
बदला हुआ स्वरूप –
- कोल एक्सचेंज एक विनियमित इलेक्ट्रॉनिक व्यापार मंच के माध्यम से काम करेगा। यहाँ कोयला उत्पादक, व्यापारी और उपभोक्ता बाजार द्वारा निर्धारित पारदर्शी कीमतों पर कोयले की खरीद-बिक्री कर सकते हैं।
- इन नियमों का मुख्य उद्देश्य प्रतिस्पर्धा के माध्यम से पारदर्शी मूल्य का निर्धारण किया जाना है। साथ ही छोटे उद्योगों और एमएसएमई को आसानी से कोयला उपलब्ध कराना है। देश के एक हिस्से के अतिरिक्त कोयले का उपयोग कमी वाले क्षेत्र में करना है।
इन उद्देश्यों के पूरा होने से घरेलू कोयला भंडार का बेहतर उपयोग हो सकेगा और ऊर्जा क्षेत्र की कार्य कुशलता में वृद्धि होगी।
चुनौतियां –
- कोयले की गुणवत्ता अलग-अलग होने के कारण मानकीकरण आवश्यक है।
- समय पर आपूर्ति के लिए परिवहन और लॉजिस्टिक्स में सुधार जरूरी है।
- प्रभावी विवाद निवारण तंत्र बनाया जाना चाहिए।
- खुदरा उपभोक्ताओं की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 जून 2026