उच्च शिक्षा संस्थान रैंकिंग में भारत की लंबी राह

Afeias
06 Jul 2026
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क्यूएस वर्ल्ड रैंकिंग में कुछ भारतीय संस्थानों की रैंकिंग में सुधार से भारत को उच्च शिक्षा में केवल क्रमिक सुधार से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि वैश्विक उत्कृष्टता (Global Excellence) को लक्ष्य बनाना चाहिए।

मुख्य तर्क –

  1. रैंकिंग में सुधार, लेकिन संतुष्टि नहीं –
  • 2026 में कुछ भारतीय संस्थानों की रैंकिंग सुधरी है। सर्वोच्च भारतीय संस्थान भी लगभग 118वें स्थान पर है, जबकि हांगकांग विश्वविद्यालय 11वें और पेकिंग विश्वविद्यालय 13वें स्थान पर हैं। इसलिए केवल रैंकिंग में मामूली सुधार का उत्सव पर्याप्त नहीं है।
  1. चीन से सीखने की आवश्यकता –

चीन ने विश्वविद्यालयों को वैश्विक स्तर तक पहुँचाने के लिए विश्व भर से श्रेष्ठ शिक्षकों की भर्ती की। शोध परियोजनाओं की स्वायत्त शुरुआत की। अनुसंधान पर भारी निवेश किया। उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच मजबूत संबंध बनाए।

  1. अनुसंधान क्षमता ही वास्तविक शक्ति –

विश्वविद्यालय रैंकिंग किसी देश की ज्ञान सृजन (Knowledge Creation) क्षमता का संकेतक है। चीन के उच्च गुणवत्ता वाले शोध में योगदान भारत से कई गुना अधिक है। AI अनुसंधान में भी चीन वैश्विक नेतृत्व की स्थिति में पहुँच चुका है।

  1. भारत की चुनौतियाँ –

उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों की संख्या कम है। शोध और अनुसंधान पर व्यय सीमित है। अंतरराष्ट्रीय फैकल्टी और छात्रों की संख्या कम है। उद्योग–शिक्षा सहयोग पर्याप्त मजबूत नहीं है।

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य –

  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में भारत का शोध एवं अनुसंधान व्यय लगभग 0.65% है।
  • चीन लगभग 2.6% तथा दक्षिण कोरिया 4% से अधिक अनुसंधान पर खर्च करते हैं।
  • भारत में GER (Gross Enrolment Ratio) बढ़ा है, लेकिन गुणवत्ता और शोध अभी भी चुनौती बने हुए हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य –

बहुविषयक विश्वविद्यालय, अनुसंधान को बढ़ावा, अंतरराष्ट्रीयकरण, राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र की स्थापना।

सीमाएँ –

क्यूएस रैंकिंग पूर्ण मापदंड नहीं है। भारतीय विश्वविद्यालय सामाजिक समावेशन, कम लागत और बड़े छात्र आधार जैसी अलग चुनौतियों का सामना करते हैं। रैंकिंग में अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रभाव भी रहता है।

आगे का मार्ग –

  • शोध एवं अनुसंधान निवेश को GDP के कम-से-कम 2% तक बढ़ाना।
  • विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्तता देना।
  • वैश्विक स्तर की फैकल्टी एवं छात्रों को आकर्षित करना।
  • उद्योग–विश्वविद्यालय साझेदारी मजबूत करना।
  • प्रदर्शन-आधारित वित्तपोषण और शोध संस्कृति को बढ़ावा देना।
  • भारतीय संस्थानों का अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (19/06/26)