दुर्लभ खनिज और साझा हित
To Download Click Here.

भारत व अमेरिका के विदेश मंत्रियों के बीच जरूरी खनिजों एवं दुर्लभ धातुओं की आपूर्ति को लेकर अहम् समझौता हुआ। मार्को रूबियो क्वाड की बैठक के लिए भारत आये हुए थे। इस समझौते में खनन, प्रसंस्करण व भंडारण के बारे में भी बात की गई है। भारत ने भी इस समझौते में अपने दुर्लभ खनिजों के भंडारण के बारे में बताया है।
दुर्लभ खनिज व जरूरी खनिज –
- दुर्लभ खनिज गैर ईंधन खनिज हैं, जिनका उपयोग बैटरी, घडि़यां, वायरिंग, सैन्य-हार्डवेयर, सेमीकंडक्टर और अन्य तकनीकी उत्पाद बनाने के लिए किया जाता है। इनकी संख्या 17 है। जिनमें लैंथेनाइड (धात्विक तत्व), स्कैडियम (उपयोग एअरोस्पेस व खेल उपकरण में) और याट्रियम (लेजर और सेरेमिक निर्माण) प्रमख हैं। लैंथेनाइड, उच्चतम तापमान वाले स्थाई चुंबक में प्रयोग होता है, जिसे इलेक्ट्रिक वाहनों व पवन चक्कियों के निर्माण में उपयोग किया जाता है।
निकल, कोबाल्ट, लीथियम, एल्यूमीनियम और जिंक सबसे जरूरी खनिजों में शामिल हैं।
जुलाई 2023 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास तीस खनिज, जिसमें-बेरिलियम, बिस्मथ, कोबाल्ट, तांबा तथा प्लैटिनम समूह तत्व फास्फोरस, पोटाश और दुर्लभ मृदा तत्व जैसे रेनियम, सिलिकान, कैडेमियम जैसे तत्व मौजूद हैं। हमारे पास 1 करोड़ 30 लाख टन मोनाजाइट है, जो दुर्लभ आक्साइड है तथा मुख्य प्राकृतिक स्रोतों में से एक है।
इस समझौते से जुड़े विचारणीय बिन्दु –
- विदेश मंत्रालय की ओर से जारी दस्तावेज में कहा गया है कि क्वाड देशों की सरकारें और निजी कंपनियाँ इस पहल के लिए ऋण गारंटी, सब्सिडी और दीर्घकालिक खरीद समझौतों का उपयोग करते हुए 20 लाख डालर जुटाने का इरादा रखती हैं। इन देशों को धन खनन, प्रसंस्करण व पुर्नचक्रण में लगाना है। क्या हमारे हित भी यही हैं?
- अमेरिका 12 जरूरी खनिजों के लिए पूरी तरह तथा 29 अन्य जरूरी खनिजों की 50% आपूर्ति के लिए आयात पर निर्भर है। अमेरिका इन खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। क्या वह हमारी खनिज आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद करेगा?
- दुर्लभ खनिज सेमीकंडक्टर व कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए भी जरूरी है। चीन ने खनिजों की आपूर्ति पर अपना नियंत्रण बना रखा है। खनिज भंडार का 60% तथा विश्व की जरुरत का 90% चीन के पास है। अमेरिका ने स्वयं अन्य आपूर्तिकर्ता के रूप में हमें चुना है।
- भारत के मोनाजाइट में 70 लाख टन से अधिक दुर्लभ मृदा आक्साइड मौजूद है। चीन के पास लगभग 4 करोड़ 40 लाख टन है, जो ज्ञात भंडारों का आधा हिस्सा है।
- वर्ष 2026-27 के बजट में ओडीशा, केरलम, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में ‘दुर्लभ खनिज गलियारा’ बनाने के नीतिगत उपाय किए गए हैं। यहाँ प्रसंस्करण, अनुसंधान व उन्नत तकनीक के केन्द्र होंगे। पर प्रश्न यह है कि जब स्वयं यह करना था, तो दूसरे देशों के सुपुर्द करना क्यों? बहुपक्षीय सहमति के बावजूद द्विपक्षीय समझौता क्यों? क्या हम नहीं जानते कि अमेरिका अपने हित ही सर्वोपरि रखता है?
- अमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका में ‘फलवोर्वा रेयरअर्थ्स प्रोजेक्ट’, इससे पहले बलूचिस्तान में निवेश की घोषणा तथा ‘पैक्स सिलिका पहल’ के तरह अलग-अलग देशों से 11 समझौते किए है और अब उसकी नजर भारत के खनिजों पर है। भारत का कहना है कि अमेरिका के साथ यह समझौता सहयोग को और गहरा करेगा और चीन के दबदबे को चुनौती देगा।
भारत के दुर्लभ खनिज भंडार मिलकर एकीकृत विनिर्माण पारिस्थिकी तंत्र की स्थापना कर कच्चे माल के आधार को मजबूत कर सकते हैं। एकपक्षीय समझौते के बजाय परस्पर हितों को ध्यान में रखकर सहयोग की रणनीति तय की जा सकती है।