भारत में बढ़ते तापमान पर कुछ बिन्दु
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- भारतीय मौसम विभाग के डेटा से पता चलता है कि 1961 से भारत के लू वाले क्षेत्रों में लू की आवृत्ति, हर दशक में, 1 दिन बढ़ी है। इसमें मध्य, उत्तर-पश्चिम और पूर्वी तटीय क्षेत्र शामिल हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत के कुल भू-क्षेत्र का लगभग 30% शामिल है।
- भारत की गर्मी को जानलेवा बनाने में केवल वायुमंडल की भूमिका नहीं है। भारतीय शहरों के कुछ हिस्से हीट आइलैंड बन जाते हैं। ये ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले 20 से. से 100 से. ज्यादा गर्म हो जाते हैं।
- इनके बनने का कारण कंक्रीट, डामर, पेड़ों की कटाई और ऑफिस को ठंडा रखने वाले हजारों एयर कंडीशनर हैं।
- 2015-19 और 2020-24 के बीच दिल्ली की औसत नमी आठ परसेंट पॉइंट बढ़ गई है। इसका कारण सिर्फ ग्लोबल-वार्मिंग नहीं, बल्कि तेजी से शहरी कच्ची भूमि का खत्म होना है। यहीं पर तकनीक का लालच खतरनाक होता है। लोग ज्यादा अच्छे और सस्ते एसी लगाना पसंद करते हैं। इसकी कीमत बाहर काम करने वाले, और रेहड़ी-पटरी वालों को चुकानी पड़ती है।
- इसके बजाय शहरी डिजाइन ऐसे बनने चाहिए, जिनमें रिफ्लेक्टिव मटेरियल और ग्रीन कवर जरूरी हो। बिल्डिंग कोड बदले मौसम के हिसाब से बनाए गए हों। सबसे जरूरी श्रम कानूनों को लागू करना है। इन कानूनों के अनुसार श्रमिकों को निश्चित हीट इंडेक्स सीमा से ऊपर होने पर काम नहीं कराया जा सकता है।
- साथ ही गर्मी के प्रबंधन को बजट में प्रमुख मुद्दा बनाकर योजना बनाई जानी चाहिए। बढ़ती गर्मी को राष्ट्रीय आपदा के अंदर शामिल किया जाना चाहिए।
(‘द हिन्दू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-30/05/2026)