05-06-2026 (Important News Clippings)
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हम ‘क्लॉड माइथोस’ का सटीक उपयोग कर सकते हैं
संपादकीय
एन्थ्रोपिक ने अपने क्लॉड परिवार के सबसे ताकतवर और साइबर- सुरक्षा संस्करण माइथोस को भारत को देने का फैसला लिया है। कहने को तो यह रेस्ट्रिक्टेड वर्जन होगा, लेकिन यूएस के अलावा इस संस्करण का एक्सेस केवल अमेरिका के आठ मित्र यूरोपीय देशों सहित ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड को ही दिया गया है। भारत को इसका लाभ यह होगा कि इस मॉडल का इस्तेमाल करके वह बैंकों, टेलिकॉम सेक्टर, शेयर मार्केट, आर्थिक प्रतिष्ठानों व गतिविधियों और साइबर आधारित रक्षा प्रणाली की कमजोरियां जान सकेगा और उन्हें अभेद्य बना सकेगा । एन्थ्रोपिक का यह वर्जन चीन को नहीं दिया जा रहा है। हालांकि खबर है कि चीन ने भी जीटीजी 1002 पर क्लॉड जैसे ही किसी मॉडल का उपयोग किया है। इस बात की तस्दीक स्वयं एन्थ्रोपिक ने की है। बहरहाल भारत को रेस्ट्रिक्टेड वर्जन देने के पीछे तर्क यह है कि इसके लीक होने की गुंजाइश है और तब यह अवांछित तत्वों देशों के हाथ लग सकता है, जिससे भारी नुकसान हो सकता है। एन्थ्रोपिक के चीफ टेक्निकल ऑफिसर भारतीय हैं और भारत के इंजीनियरों की बड़ी तादाद एन्थ्रोपिक में काम कर रही है। इनका ऐसे जबरदस्त मॉडल्स को विकसित करने में बड़ा योगदान है। ट्रम्प की अनिच्छा के बावजूद एन्थ्रोपिक द्वारा भारत को अगला डेस्टिनेशन चुनना मायने रखता है।
Date: 05-06-26
दुनिया में देश की अच्छी छवि पेश करना भी हमारा फर्ज है
आरती जेरथ, ( राजनीतिक टिप्पणीकार )
किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीय पर्यटकों के बारे में सर्च कर लीजिए, विदेश यात्राओं के दौरान उनके व्यवहार, या कहें दुर्व्यवहार के अनेक वीडियो सामने आ जाएंगे। एक समूह चीन की दीवार पर उत्सवी परिधान पहनकर गरबा कर रहा है। दूसरा वियतनाम में हनोई की प्रसिद्ध ट्रेन स्ट्रीट पर शाहरुख खान के गीत ‘छैंया छैंया’ पर नाच रहा है। एक ग्रुप वियतनाम के ही एक एयरपोर्ट में रनवे के समीप की सड़क पर डांस कर रहा है, जिससे वहां का सुरक्षा स्टाफ परेशान नजर आता है। जबकि एक अन्य, अर्जेंटीना और ब्राजील की सीमा पर स्थित इगुआजु फॉल्स की बोट सफारी करते हुए ‘इंडिया, इंडिया’ के नारे लगा रहा है। इससे पहले उन्हीं लोगों ने नाव में चढ़ते वक्त कतार तोड़ने की कोशिश में धक्का-मुक्की भी की थी।
पेरिस, लंदन, बैंकॉक, बाली तक ऐसे कई उदाहरण आपको दिख जाएंगे। विरले ही ऐसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बचे होंगे, जहां भारतीय पर्यटकों ने व्यवस्था में खलल न डाला हो। एक वक्त था, जब विदेशों में अपने अक्खड़ रवैये के कारण अमेरिकी पर्यटकों को ‘द अग्ली अमेरिकन’ कहा जाने लगा था। लगता है भारतीयों पर भी वैसा ही ठप्पा लगने जा रहा है, क्योंकि उनमें से कई स्थानीय भावनाओं की अनदेखी करते पाए जा रहे हैं।
यह कहना सही नहीं होगा कि सभी भारतीय पर्यटक ऐसा दुर्व्यवहार करते हैं। असल में तो यात्रा-शिष्टाचार के उल्लंघन को लेकर सोशल मीडिया पर जो नाराजगी दिखाई देती है, वह ज्यादातर भारतीय ही जताते हैं। क्योंकि उन्हें डर है कि मुट्ठीभर लोगों के बिगड़ैल रवैये से न केवल विदेशों में भारत की छवि बिगड़ती है, बल्कि उनके लिए भी माहौल खराब होता है। लेकिन उनके चिंता जताने के बावजूद भारतीय पर्यटकों को लेकर ऐसी कहानियां सामने आती रहती हैं कि वे कीमतों को लेकर उग्र होकर मोलभाव करते हैं, वेटरों और दुकानदारों से रूखेपन से बात करते हैं और यहां तक कि होटलों से साबुन, तौलिया जैसी चीजें भी चुरा लाते हैं।
हाल ही में उद्योगपति हर्ष गोयनका ने ‘एक्स’ पर अपने साथ हुई ऐसी शर्मनाक घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि ऐसे व्यवहार के कारण ‘ब्रांड इंडिया’ को कैसी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि स्विट्जरलैंड के पर्यटन स्थल ग्स्टाड के एक होटल में भारतीय पर्यटकों के लिए विशेष नियमों की सूची देखकर वे हैरान रह गए। होटल के हर कमरे में लगे नोटिस में भारतीयों के लिए चेतावनी थी कि वे मुफ्त ब्रेकफास्ट बुफे से खाना बाहर न ले जाएं। सिर्फ उपलब्ध कराई गई कटलरी ही इस्तेमाल करें और बालकनी तथा गलियारों में शोर न मचाएं। उन्होंने एक और घटना बताई कि एक भारतीय कारोबारी किसी साल दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक में गए और रेस्तरां में इतना तेज पंजाबी म्यूजिक बजाने लगे कि पूरा शहर सुन ले। वे इसे भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का प्रदर्शन बता रहे थे।
असल बात यह है कि देश में रहकर सिविक सेंस की जो कमी हम प्रदर्शित करते हैं, वो अब विदेश में भी नजर आने लगी है। रोजाना हम देखते हैं कि हवाई जहाजों और रेस्तरां में बच्चों को उछल-कूद मचाने दिया जाता है। माता-पिता दूसरों को हो रही परेशानी से बेखबर बैठे रहते हैं। लोग सड़क पर चॉकलेट के रैपर और चिप्स के खाली पैकेट फेंक देते हैं। सोमवार को किसी सार्वजनिक पार्क में जाइए, जहां परिवारों ने रविवार को पिकनिक मनाई हो। जगह-जगह कागज की प्लेटें, गिलास और जूठन तक बिखरी होती है, जबकि वहां बाकायदा कूड़ेदान लगे होते हैं। कई देशों में, खासकर विकसित देशों में, बुनियादी सिविक सेंस स्कूलों से ही सिखाया जाता है और घरों में उसका पालन कराया जाता है। लेकिन लगता है कि शायद हमने अच्छे नागरिक बनने के महत्व को भुला दिया है।
थाईलैंड ने अवांछित पर्यटकों को छांटने के लिए वीसा नीति में बदलाव किया है। उसने 93 देशों के लिए वीसा-मुक्त प्रवेश समाप्त कर दिया है और भारत भी उनमें शामिल है, जबकि भारत से सर्वाधिक पर्यटक थाईलैंड जाते हैं। आज भारतीयों की वैश्विक मौजूदगी बढ़ी है। पर इसका यह भी मतलब है कि हमारे पर्यटकों की निगरानी अधिक होती है। ऐसे में हमारा फर्ज बनता है कि हम अपनी और अपने देश की बेहतर छवि पेश करें। आखिरकार, पर्यटक भी राजनयिकों की भांति ही भारत के प्रतिनिधि हैं।
पर्यावरण हितैषी भारतीय जीवनशैली
डॉ. अनिल गुप्ता, ( लेखक पर्यावरणविद् एवं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य हैं )
पर्यावरण संरक्षण भारत के लिए कोई नया विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी परंपरा और जीवन-पद्धति का हिस्सा रहा है। इसका प्रमाण हमारी धार्मिक गतिविधियों, परंपराओं, रीति-रिवाजों और दैनिक जीवन के व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति पृथ्वी को केवल भौतिक संसाधन नहीं मानती, बल्कि उसे मां के रूप में पूजती है। जंगल, वन्यजीव, वनदेवता और प्रकृति के विभिन्न स्वरूप हमारी प्राचीन सभ्यताओं तथा धार्मिक मान्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन मान्यताओं के कारण अनेक पौधों और पशु-पक्षियों को धार्मिक आस्था से जोड़कर संरक्षण प्रदान किया जा रहा है। जैसे पीपल, नीम, केला तथा अन्य अनेक वृक्षों को पूजनीय माना गया है। प्राचीन काल से ही ऐसे वृक्ष मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर लगाए जाते रहे हैं। इसी प्रकार अनेक पशु-पक्षियों को भी धार्मिक मान्यताओं के कारण विशेष सम्मान प्राप्त है। अधिकांश हिंदू देवी-देवताओं को किसी न किसी पशु या पक्षी के साथ दर्शाया गया है। ये मानव और प्रकृति के गहरे संबंध को भी व्यक्त करते हैं। यह सब दर्शाता है कि जंगल, पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि जैसे प्राकृतिक तत्व हमारी सभ्यता, संस्कृति और जीवन-दर्शन का अभिन्न अंग रहे हैं।
भारतीय पर्यावरण संरक्षण का दृष्टिकोण केवल व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, धार्मिक और नैतिक मूल्यों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यही परंपरा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारत को विश्व के अन्य देशों से अलग पहचान प्रदान करती है और प्रकृति के साथ हमारी एक टिकाऊ तथा संतुलित संबंध स्थापित करती है। यह भावना लोगों के संस्कारों और जीवनशैली में रची-बसी है, जिसे वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाते चले आ रहे हैं। वेद मानवता की ज्ञान-परंपरा के सबसे प्राचीन ग्रंथों हैं। इनमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के विषयों का वर्णन मिलता है। इस दृष्टि से वेद समग्र ज्ञान के स्रोत हैं। उगते हुए सूर्य, प्रभात की लालिमा, प्रकृति की निस्तब्धता और उसकी मधुरता का जितना सुंदर और संवेदनशील चित्रण वेदों में मिलता है, वैसा उदाहरण विश्व साहित्य में दुर्लभ है। वेदों में जीवन और प्रकृति को एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ माना गया है। वहां प्रकृति केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की सहचरी और प्रेरणा-शक्ति के रूप में प्रस्तुत है। यही कारण है कि वेद और आधुनिक विज्ञान को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जा सकता है।
पर्यावरण विज्ञान और जीव विज्ञान, दोनों आधुनिक विज्ञान की महत्वपूर्ण शाखाएं हैं, जिनके अंतर्गत पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक और जैविक घटकों के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। यद्यपि इन वैज्ञानिक विषयों का औपचारिक विकास 20वीं सदी में हुआ, किंतु इनके मूल तत्वों की झलक वैदिक साहित्य और प्राचीन भारतीय चिंतन में भी देखी जा सकती है। पर्यावरण की अवधारणा समय के साथ बदलती रहती है, क्योंकि यह उस समय की सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार पर्यावरण में जल, वायु और भूमि के साथ-साथ उनके तथा मानव, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्मजीवों और संपत्ति के बीच विद्यमान पारस्परिक संबंध भी शामिल हैं। इस परिभाषा के आधार पर कहा जा सकता है कि पर्यावरण के दो प्रमुख घटक हैं-जैविक और अजैविक। जैविक घटकों में मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पतियां और सूक्ष्मजीव शामिल हैं, जबकि जल, वायु, मिट्टी, प्रकाश और खनिज जैसे तत्व अजैविक घटकों के अंतर्गत आते हैं।
आधुनिक विज्ञान को इन परस्पर संबंधों की व्यापकता को समझने में लंबा समय लगा। जबकि वैदिक युग में लोग इसे पहले ही समझ गए थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जंगलों और पर्यावरण संरक्षण के संबंध में राजा के कर्तव्यों का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि शासक का दायित्व केवल जंगलों की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि नए वनों की स्थापना और संरक्षण सुनिश्चित करना भी है। सम्राट अशोक ने कुछ विशेष पशुओं की सूची जारी की थी, जिनके शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया था।
हिंदू अनुष्ठानों में प्रायः शांति मंत्रों का पाठ किया जाता है, जिनका मूल स्रोत वेद हैं। इन मंत्रों में समस्त सृष्टि के लिए शांति, संतुलन और कल्याण की कामना की जाती है। शांति मंत्रों में अंतरिक्ष में शांति, पृथ्वी पर शांति, जल में शांति, वनस्पतियों में शांति, वृक्षों में शांति, मध्य क्षेत्र में शांति तथा समस्त दैवी शक्तियों और ब्रह्मांडीय तत्वों में शांति की प्रार्थना की जाती है। अंत में यह कामना की जाती है कि वही शांति हमारे भीतर भी स्थापित हो। इन मंत्रों में सभी प्राकृतिक शक्तियों और सृष्टि के विभिन्न घटकों के बीच समन्वय, संतुलन और सद्भाव की भी भावना निहित है। सभी के सामूहिक कल्याण के लिए आज यही दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में जब विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है, तब भारतीय परंपराओं में निहित पर्यावरणीय दृष्टिकोण मानवता को प्रकृति के साथ संतुलित और सतत जीवन जीने की महत्वपूर्ण सीख देता है।
Date: 05-06-26
एमएसएमई की महत्त्वकांक्षाओं को दबाना उचित नहीं
रमा बिजापुरकर
मीडिया एवं पेशेवर संगठनों द्वारा सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योग (एमएसएमई) से संबंधित गैर-वित्तीय नियामकीय सुधारों से जुड़ी उच्चस्तरीय समिति की कुछ सिफारिशों की व्यापक चर्चा हुई है। ये सिफारिशें कुछ हद तक स्वागतयोग्य और कुछ हद तक चिंताजनक हैं। किसी भी प्रयास से यदि प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए, समय, लागत कम करने के साथ ही नियमन एवं अनुपालन में खर्च होने वाली मानवीय ऊर्जा को बचाया जाए तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन, यदि ऐसा कुछ भी हो जो छोटे कारोबार की वृद्धि की इच्छा या क्षमता को रोकने वाला हो तब यह चिंताजनक है।
एमएसएमई को मजबूत और परिस्थितियों के अनुकूल अधिक लचीला बनाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित और सक्षम किया जाना चाहिए ताकि वे तेजी से अपना राजस्व बढ़ा सकें और निवेश के लिए जरूरी अधिशेष और कर्ज जुटा सकें।
इसके अलावा बाजार में इनकी पहुंच का दायरा बेहतर करने और सक्षम लोगों की नियुक्ति करने पर भी जोर देने की जरूरत है। यह विशेष रूप से उन सूक्ष्म कंपनियों के लिए सच है जो एमएसएमई का अधिकांश हिस्सा हैं और जिनका छोटा आकार और ऋण लेने में कठिनाई वास्तव में उन्हें छोटे झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
हम अपने अनुभव से जानते हैं कि चाहे वह वित्तीय या किसी और अन्य तरह का प्रोत्साहन हो, उसने कंपनियों को छोटे बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया है, बजाय इसके कि उन्हें अवसरों का लाभ उठाकर विकास और समृद्धि के लिए प्रेरित किया जाए। भारत की लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रतिष्ठा और डिजिटल दौर में आसानी से सुलभ पेशेवर संसाधन, वे सभी अवसर देते हैं। आज का दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि हम तेजी से बढ़ते हुए लाभ उठाएं न कि अपने दायरे को छोटा बनाए रखें। इसका उद्देश्य दीर्घकालिक लाभ बढ़ाना होना चाहिए, न कि तात्कालिक चुनौतियों को कम करना। उदाहरण के तौर पर, माल एवं सेवा कर (जीएसटी) से बाहर रहना वास्तव में बड़ी कंपनियों के लिए आपूर्तिकर्ता बनने की संभावना कम कर देता है क्योंकि वे कंपनियां खरीद पर दिए गए जीएसटी का समायोजन चाहती हैं।
समिति का जोर अनुपालन की मुश्किलों को कम करने और प्रक्रियाओं को सरल और सुव्यवस्थित बनाने पर है। उम्मीद है कि आगे चलकर हर सरकार और नियामक संस्था इसे अपना मुख्य उद्देश्य बनाएगी ताकि आकार की परवाह किए बिना सभी को लाभ मिल सके। उम्मीद है कि इससे एक नई डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का एक तरह का ‘अनुपालन ढांचा’ तैयार होगा, जिससे सभी फॉर्म और रिटर्न आसानी से भरे जा सकें। इसमें डेटा दर्ज करने के कई विकल्प हों ताकि अनुपालन स्वयं (डीआईवाई) किया जा सके। अनुपालन लागत को कम करना, कंपनी केंद्रित होने के बजाय नियामक-केंद्रित प्रयास होना चाहिए। केवल छूट देकर मानकों को कम करना उचित नहीं है क्योंकि इससे सुशासन कमजोर हो सकता है और लेखांकन की सख्ती घट सकती है।
ऐसे में ऑडिट आवश्यकताओं में पूरी तरह ढील देने के बजाय, ऑडिट के दायरे को सीमित और स्पष्ट करना अधिक उपयोगी हो सकता है। साथ ही उम्मीद है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित उत्पाद भविष्य में ऑडिट की लागत को काफी कम कर देंगे। साल में एक बार बोर्ड बैठक करने के बजाय चार बार बैठक करना कहीं अधिक बेहतर है, खासतौर पर स्टार्टअप्स और उद्यमियों द्वारा संचालित संगठनों के लिए। यदि छोटी कंपनियों को निजी बाजारों से भी सार्वजनिक पूंजी तक पहुंच बनानी है तब उनके शासन-प्रबंधन स्तर को बेहतर बनाना बेहद जरूरी है।
बोर्ड बैठकों और उनमें होने वाली अनुपालन समीक्षा का एक सकारात्मक दबाव होता है। ये बैठकें कारोबारों को नियमित रूप से अपने आंतरिक प्रबंधन, वित्तीय स्थिति और रिकॉर्ड रखने पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे वे समय पर वित्तीय विशेषज्ञों की मदद ले पाते हैं और ‘बाद में दुरुस्त करने’ जैसी सोच के साथ नियमों की सीमाएं लांघने के प्रलोभन से बचते हैं। आज के समय में बोर्ड बैठकें ऑनलाइन भी की जा सकती हैं इसलिए इनकी लागत बहुत कम हो गई है। साथ ही, कई सक्षम और ईमानदार लोग बोर्ड सदस्य के रूप में योगदान देने को तैयार रहते हैं। कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए) ऐसे योग्य स्वयंसेवी बोर्ड सदस्यों का एक डेटाबेस भी बना सकता है।
अच्छा शासन शुरुआत से ही साफ-सुथरे और मजबूत व्यवसाय की नींव रखता है। खराब प्रचलन को बाद में बदलना कठिन होता है ऐसे में शुरुआत से ही सही चलन अपनाना बेहतर है।
अब स्टार्टअप यह समझ चुकी हैं कि निदेशक मंडल का मजबूत प्रशासन कंपनियों की रफ्तार नहीं रोकता बल्कि उनके जोखिम को कम करता है। जब रणनीतिक या वित्तीय मामलों में अनावश्यक साहसिक कदम उठाए जाते हैं तब निदेशक मंडल समय पर चेतावनी देकर संस्थापकों को संभावित गलतियों से बचा सकता है।
इसी तरह, यदि एमएसएमई क्षेत्र को तेजी से आगे बढ़ने और विस्तार के लिए तैयार करना है तब उसकी नींव भी सख्त अनुपालन और अच्छे शासन पर ही रखनी होगी। यह मानसिकता और उसी के आधार पर बना कानूनी ढांचा, फिर से विचार करने योग्य है कि स्टार्टअप और एमएसएमई अलग-अलग श्रेणियां हैं। यह सोच कि स्टार्टअप्स को बड़े सपने देखने, तेजी से बढ़ने और बाहरी पूंजी जुटाने का अधिकार है जबकि एमएसएमई को छोटा ही रहने, सीमित दायरे में काम करने और कम अपेक्षाओं के साथ चलने के लिए कहा जाए, यह एक तरह की वर्ग व्यवस्था है जिसे समाप्त किया जाना चाहिए।
आज के समय में हर कारोबार के पास एक मजबूत डिजिटल केंद्रीय तंत्र और आधुनिक नियम व प्रक्रियाएं होनी चाहिए ताकि वे आधुनिक दुनिया में प्रतिस्पर्धा कर सकें। केवल व्यावसायिक समझ ही पर्याप्त नहीं है, हालांकि छोटे भारतीय व्यवसायों ने अपनी समझ और क्षमता का भरपूर प्रदर्शन किया है। दरअसल, उपभोक्ता को सीधे सेवाएं या उत्पाद देने वाले (बी2सी) छोटे कारोबारों का एक बड़ा वर्ग है जो दो महत्त्वपूर्ण आर्थिक नीतिगत क्षेत्रों के मेल के आधार पर मौजूद है। मसलन घरेलू खपत को बढ़ावा देना और एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत करना। बड़ी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के भाषणों में भी इनका जिक्र एक मजबूत प्रतिस्पर्धा के रूप में किया गया है।
इन छोटे कारोबार ने बेहतर ग्राहक संबंध, सूझबूझ वाले नवाचार और कम कीमतों के सहारे पहले ही बाजार का अच्छा-खासा हिस्सा हासिल कर लिया है। वे अब विस्तार के लिए तैयार हैं। उन्हें छूट नहीं बल्कि प्रोत्साहन चाहिए, उन्हें वित्तीय सहायता और सरल, सुव्यवस्थित अनुपालन प्रक्रियाएं चाहिए न कि शासन संबंधी ढील।
भविष्य के लिए वर्तमान को बचाइए
अनिता भटनागर जैन, ( पूर्व आईएएस अधिकारी )
लखनऊ में पारा के 47 डिग्री पार करने पर जब सारे कारगर उपाय निष्फल हो गए, तब हमने ‘सोलर रिफ्लेक्टिव प्रूफ टाइल’ के बारे में पता किया। अनायास ही दादी की कही बात याद आ गई- भविष्य में आसमान से आग बरसेगी और सब खत्म हो जाएगा। मेरी बाल बुद्धि को तब यह बात समझ में नहीं आई, मगर आज यह प्रत्यक्ष देखने को मिल रही है।
समस्त पश्चिमी यूरोप में वसंत ऋतु होने के बावजूद प्रचंड लू जारी है। 22 अप्रैल, 2026 को एक नया अप्रिय कीर्तिमान स्थापित हुआ कि दुनिया के 50 सबसे अधिक तापमान वाले शहर भारत में हैं। मई में विभिन्न स्थानों पर 47 डिग्री से अधिक तापमान दर्ज हुआ। इनमें से उत्तर प्रदेश के बांदा में करीब 1,400 ट्रांसफर्मर को असहनीय तापमान में जलने से बचाने के लिए उन पर पानी डालना पड़ा। कई शहरों में विद्युत सब-स्टेशन पर पीएसी तैनात करनी पड़ी, मानो दंगे की आशंका हो। कई जगहों पर दिन में कर्फ्यू-सा सन्नाटा था। कुछ जगहों पर तो एलईडी रोशनी में रात्रि-खेती की जा रही। कभी-कभी लगता है, यह कोई भयावह स्वप्न है।
आज पर्यावरण दिवस है। करोड़ों की संख्या में पौधरोपण के नए कीर्तिमान बनेंगे। तमाम समारोहों में संसाधनों का अपव्यय होगा और अनगिनत प्लास्टिक का उपयोग होगा। बहुत से वक्ता कहेंगे, ‘हमें पर्यावरण भविष्य की पीढ़ी के लिए बचाना है।’ जी नहीं, अब वह समय निकल चुका है, अब तो आज की पीढ़ी के लिए इसे बचाना है। अच्छी बात है, ‘यूएनईपी’ द्वारा 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ की गई है। इस वर्ष की थीम है ‘जलवायु कार्रवाई- प्रकृति से प्रेरित, हमारी जलवायु और भविष्य के लिए।’
भारतीय संस्कृति तो सदा से प्रकृति-प्रेरित रही है। यहां वृक्षों की पूजा, जैसे आंवला नवमी, पीपल पूर्णिमा, तुलसी विवाह जैसे त्योहार हैं। हमारे देवी-देवताओं के वाहन भी पशु-पक्षी ही हैं, यानी मनुष्य व अन्य जीवों का सह-अस्तित्व। नदियों को तो यहां मैया कहा ही जाता है। भागवत पुराण में उल्लेख है कि भगवान कृष्ण ने अपने अनुयायियों को इंद्रदेव के अतिरिक्त प्रकृति की भी पूजा करने को कहा। आज इस सोच और आचरण में जमीन-आसमान का अंतर है। ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ आम बात हो गई है, क्योंकि अनियंत्रित विकास से जीव-जंतुओं के घर, यानी वन समाप्त होते जा रहे हैं। शरद और ग्रीष्म ऋतु के बीच की मनोहारी वसंत ऋतु तो अब लगभग समाप्त हो गई है। कम फूलों के कारण पराग न मिलने से मधुमक्खियों ने अनेक स्थानों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया है।
पर्यावरण विशेषज्ञ रिचर्ड महापात्रा की मानें, तो जलवायु परिवर्तन इस शताब्दी का अस्तित्वगत खतरा है। इसके कारण वैश्विक गरीबी में साल 2030 तक तीन प्रतिशत कमी का लक्ष्य कई दशकों में भी पूरा नहीं हो सकेगा। विश्व की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी जलवायु संबंधी चरम घटनाओं से प्रभावित है और उनमें भी सबसे अधिक निर्धन वर्ग असुरक्षित है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, लू के बढ़ते दिनों के कारण आने वाले समय में भारत में धान का उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट सकता है। हमारे देश में 70 प्रतिशत कैलोरी तो चावल से ही प्राप्त होती है, तो इसका परिणाम हम सब पर पड़ेगा। गेहूं का उत्पादन भी 34 प्रतिशत तक गिरने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन से मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं। सेहत की एक नई चुनौती ‘इको घबराहट’ है, जो उन लोगों में पाई जा रही है, जिनका जीवन-यापन, निवास स्थान बदलती हुई जलवायु से प्रभावित हो रहा है। युवा पीढ़ी में अपने भविष्य को लेकर असामान्य चिंता है कि उनके जीवन-काल में यह पृथ्वी रहने लायक रहेगी या नहीं?
फिर हम किसे झुठला रहे हैं? अपने आप को? प्रगति के आकलन के लिए आंकड़े आवश्यक हैं, पर क्या फर्जी आंकड़ों व रैंकिंग का कोई दीर्घकालीन परिणाम है? हर वर्ष पर्यावरण दिवस पर पौधरोपण के नए कीर्तिमान स्थापित होते हैं। यदि अधिकांश रोपित पौधे जीवित रहते, तो जलवायु में सुधार कुछ वर्षों में ही परिलक्षित हो जानी चाहिए थी।
बीते 27 वर्षों से यह लेखिका पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी रही है और लगभग सात लाख विद्यार्थियों व शिक्षकों के साथ सतत जीवन शैली पर ‘इंटरेक्टिव सेशन’ ले चुकी है। इसी क्रम में एक विद्यार्थी की सुंदर पर्यावरण परियोजना को देखकर जब उससे पूछा गया कि परियोजना में दर्शायी गई किस बात को उसने अपने जीवन में अपना रखा है? तो उसने बेलाग कहा, ‘मैम, कोई नहीं। यह तो केवल एक परियोजना है अच्छे नंबर पाने के लिए।’ जब तक बड़े लोग, समाज के प्रतिष्ठित, विख्यात व्यक्ति अपने आचरण में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता नहीं दर्शाएंगे, तब तक बच्चों का ज्ञान तो कागजी ही रहेगा।
पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों पर दिए जा रहे अनुदान के फलस्वरूप अब ईवी वाहन समस्त वाहनों का सात प्रतिशत हो गया है। वर्ष 2030 तक 30 प्रतिशत ईवी निजी वाहनों का लक्ष्य है। गौर करने की बात यह है कि इनमें से कितने इलेक्ट्रिक वाहन ‘क्लीन एनर्जी’ से संचालित हैं, वरना केवल प्रदूषण का स्थान बदलेगा। प्रकृति हमें संतुलन सिखाती है। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘पृथ्वी के पास मनुष्य की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन है, परंतु उसकी लोलुपता के लिए नहीं।’ आज के भौतिकवादी युग में खरीदारी एक मनोवैज्ञानिक बीमारी सी हो गई है। प्रकृति दूसरों को देना सिखाती है, जो हमारी संस्कृति की मूल विचारधारा रही है, पर आज पूरा ध्यान ‘मैं’ पर केंद्रित है।
धरती बहस या समझौते नहीं करती। वह सिर्फ संकेत भेजती है- पिघलते ग्लेशियर, बढ़ते समुद्री जल-स्तर, भयावह वनाग्नि, असहनीय तापमान और चरम जलवायु घटनाओं के रूप में। ये संदेश अब सशक्त हो गए हैं। दशकों से दुनिया जलवायु परिवर्तन की बात सुनती आ रही है- चेतावनी, लक्ष्य, दूर की समय-सीमा। यह प्रतिक्रिया प्राय: शोरगुल से घिरी रही है- निर्णय व कार्यान्वयन में देरी करना, ध्यान भटकाना और कुछ लोगों द्वारा तो खारिज कर देना।
अब विनाश सामने है, तो क्या हम जागेंगे? क्या हम व्यक्तिगत और सामुदायिक रूप से वृक्ष लगाएंगे और उनका ध्यान रखेंगे? क्या हम जीवन शैली के चार जादुई मंत्रों- ‘रिफ्यूज-रिड्यूस-रीयूज और रिसाइकिल’ को अपने दैनिक आचरण का हिस्सा बनाकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाएंगे? क्या बड़े अपने आचरण से बच्चों को प्रेरित करेंगे? क्या हम समाधान का हिस्सा हैं या ‘अपनी पृथ्वी अपना घर’ के विनाश के मूकदर्शक? निर्णय तो हमें ही करना होगा।
Date: 05-06-26
ट्रंप अरब देशों पर अब्राहम समझौता थोप न पाएंगे
औसाफ सईद, ( पूर्व राजनयिक )
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मई 2026 के आखिर में एक प्रस्ताव रखा कि ईरान समेत सभी अरब और इस्लामी देश अनिवार्य रूप से अब्राहम समझौते में शामिल हों। यह शर्त पश्चिम एशिया में स्थिरता लाने के बजाय वाशिंगटन की राजनीति को बेनकाब करती है। अब्राहम समझौता 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुआ ऐतिहासिक कूटनीतिक समझौता है, जिसके तहत इजरायल और कई अरब- मुस्लिम देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी को खत्म करके औपचारिक राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध स्थापित किए गए हैं।
तथ्य यह है कि ट्रंप जिन देशों को इसमें शामिल करना चाहते हैं, उनमें से आधे दशकों से इजरायल के साथ कूटनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं। ये देश हैं, मिस्र, जॉर्डन और तुर्किये। वहीं सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों ने साफ कर दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा करने का उनका कोई इरादा नहीं है। यूएई, बहरीन, मोरक्को व सूडान तो अमेरिकी सुरक्षा और आर्थिक प्रलोभनों के कारण पहले से ही इजरायल के साथ हैं। इसलिए ट्रंप का यह दांव भले वाशिंगटन के मुफीद हो, पर पश्चिम एशिया में इसका असर उल्टा होगा।
इस प्रकरण में सऊदी अरब का रुख सबसे अहम व सुसंगत रहा है। रियाद पिछले चार सालों से लगातार दोहराता आ रहा है कि संबंध सुधारने के लिए फलस्तीनी राष्ट्र-निर्माण की दिशा में पहल जरूरी है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का यह रुख अडिग है। हालांकि, दक्षिणपंथी इजरायल सरकार फलस्तीनी राष्ट्र की कट्टर विरोधी है। 28 मई को जब ट्रंप अरब नेताओं पर इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने का दबाव डाल रहे थे, तभी इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुलासा किया कि उन्होंने अपनी फौज को गाजा पट्टी का 70 प्रतिशत हिस्सा कब्जे में लेने का निर्देश दिया है। यह हमास के साथ अक्तूबर 2025 में हुए संघर्ष-विराम समझौते का उल्लंघन था, जिसके तहत इजरायल को गाजा की सिर्फ 53 प्रतिशत जमीन आवंटित की गई थी। जब उनसे पूछा गया कि क्या इजरायल को पूरा गाजा ले लेना चाहिए, तो उनका जवाब था- पहले 70 प्रतिशत। पाकिस्तान ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया। कतर ने इसे खारिज कर दिया, तो तुर्किये ने अव्यावहारिक बता दिया।
सऊदी अरब में 81 प्रतिशत लोग इजरायल से रिश्ते सामान्य करने को खराब मानते हैं। अब्राहम समझौते में शामिल मोरक्को की स्थिति यह है कि 2022 में वहां की 31 प्रतिशत जनता ने इसे समर्थन दिया था, जो गाजा संघर्ष के बाद 13 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप का फॉर्मूला नेताओं से यह उम्मीद करता है कि वे पहले रिश्ते सामान्य करें और फिर फलस्तीनी राष्ट्र की बात करें। जब ट्रंप ने कहा कि तेहरान शायद किसी दिन इन समझौतों में शामिल हो सकता है, तो ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसे ‘कोरी कल्पना’ कहकर तुरंत खारिज कर दिया और कहा कि ईरान कभी भी ‘किसी ऐसे कब्जे वाले शासन को मान्यता नहीं देगा, जिसने नरसंहार किया हो और बच्चों की हत्या की हो।’ उल्टे तेहरान ने संघर्ष-विराम के किसी भी समझौते को सभी मोर्चों पर लड़ाई रोकने की शर्त से जोड़ दिया है।
यहां बड़ी परीक्षा नई दिल्ली की है। भारत ने इजरायल, यूएई समेत खाड़ी क्षेत्र के साथ बेहद सावधानी से संबंध विकसित किए हैं। इसकी यह रणनीति भारत-इजरायल-यूएई-अमेरिका साझेदारी और प्रस्तावित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे का आधार है। भारत के ईरान से भी पुराने संबंध हैं। भारत की नीति द्वि-राष्ट्र समाधान की है। ऐसे में, फलस्तीनी अधिकारों को हाशिये पर धकेलने वाला जबर्दस्ती का प्रस्ताव उसके हित में नहीं है। इस पूरे प्रकरण का सबक साफ है कि ट्रंप संबंध सामान्य बनाने को लेकर जितनी जोर-जबरदस्ती करेंगे, उतनी ही अपनी विदेश-नीति को बदनाम करेंगे। अमेरिकी सूत्रों ने पुष्टि की है कि ईरान के साथ अस्थायी ढांचा समझौता 31 मई तक राष्ट्रपति के पास लंबित था, जिसमें अब्राहम समझौते का कहीं कोई जिक्र नहीं था।
साफ है, संबंधों को स्थायी बनाना है, तो उसे थोपा नहीं जा सकता व फलस्तीन को अनदेखा नहीं किया जा सकता। क्षेत्रीय आम सहमति के बिना बनी शांति, बस दिखावा होगी और दिखावे ज्यादा दिन नहीं टिकते।