गहराता ईंधन संकट
To Download Click Here.

फरवरी में पश्चिमी एशिया में युद्ध छिड़ते ही एलपीजी गैस संकट के बादल मंडराने लगे थे। फिलहाल इस ईंधन का देश में आयात 20 लाख टन प्रतिमाह से घटकर 10 लाख टन प्रतिमाह से भी कम रह गया है। भारतीय रिफाइनर्स ने एलपीजी का उत्पादन 30% बढ़ा दिया है। कमी को देखते हुए सरकार ने व्यावसायिक एलपीजी की राशनिंग भी कर दी है, और कीमतें भी बढ़ा दी हैं। घरेलू उपभोक्ताओं को अभी इससे दूर रखा गया है। लेकिन संकट जारी रहने पर परेशानी बढ़ सकती है –
- कीमतों में तेजी या आपूर्ति में कमी से लाखों गरीब परिवारों को साफ ईंधन उपयोग के प्रयासों पर पानी फिर सकता है।
- व्यावसायिक एलपीजी के साथ भी कुछ ऐसा ही खतरा है। होटल और रेस्टोरेंट के अलावा सिरेमिक जैसे उद्योग में भी एलपीजी का उपयोग ज्यादा होने लगा था। युद्ध के पहले व्यावसायिक एलपीजी का घरों में उपयोग तीन गुना तेजी से बढ़ रहा था।
- भारत अब अमेरिका से ज्यादा गैस लेने की कोशिश कर रहा है। इसे शिप करने में ज्यादा खर्च और समय दोनों लग जाते हैं।
ऐसे संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक उपायों की जरुरत –
- हाइड्रोजन एक अच्छा विकल्प है। लेकिन यह मुख्यत: उद्योगों में फीडस्टॉक के तौर पर काम करता है।
- ट्रांसपोर्ट, खाना बनाना, हीटिंग, पावर जेनरेशन आदि क्षेत्रों के लिए परमाणु, नवकरणीय ऊर्जा और बायोफ्यूल के विकल्प बढ़ाने होंगे। हमारे पास कचरे के ढ़ेरों पहाड़ हैं। इनसे गैस बनाने पर तेजी से काम करने की जरुरत है।
- एक अंतिम किन्तु सरल उपाय यह है कि हम ईंधन के उपयोग में मितव्ययिता बरतें। न केवल एलपीजी, बल्कि पेट्रोल-डीजल और जीवाश्म ईंधन में भी की जाने वाली किफायत अर्थव्यवस्था को कुछ बल देती है।
(‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-02/05/2026)