रुपये को संभालने के फायदे कम, नुकसान ज्यादा
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डॉ. विजय अग्रवाल
पिछले कुछ हफ्तों से डॉलर की तुलना में रुपये का गिरना कौतूहल का विषय बना हुआ है। जितनी तेजी से रुपया गिर रहा है, उसकी कमजोरी पर टीका-टिप्पणी भी की जाती है। वहीं केन्द्रीय बैंक द्वारा मुद्रा को संभालने के लिए किए गए प्रयासों की सराहना भी हो रही है।
हमें यह समझने की आवश्यकता है कि विनिमय दर एक मूल्य होता है, जिसे अन्य मूल्यों की तरह मांग और आपूर्ति के सिद्धांत के अनुसार समायोजित किया जाना चाहिए। यदि हम कृत्रिम तरीके से इसे संतुलित करते हैं, तो भविष्य में व्यवधान आते हैं। जैसे- यदि किसी वर्ष बारिश के कारण सब्जी का उत्पादन कम होता है, तो इससे बाजार में सब्जियों की कीमतें बढ़ जाती हैं और उपभोग कम हो जाता है। तब किसानों को अधिक उपज के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसमें सरकार यदि हस्तक्षेप करे भी तो मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर खत्म नहीं होगा। सरकार बिक्री पर सीमा लगाती है, तो उपभोक्ताओं को सीमित पहुँच का सामना करना पड़ता है, जिससे नियंत्रण अप्रभावी ही रहता है। यही बात विदेशी मुद्रा बाजार पर भी लागू होती है।
डॉलर की मांग आपूर्ति से ज्यादा क्यों है?
- भारत का चालु खाता घाटा 2025-26 में लगभग 40 अरब डॉलर था। इसे पूरा करने के लिए विदेशी पूँजी अपर्याप्त थी।
- पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थिति के कारण चालू घाटा 80 अरब डॉलर होने की आशंका है, जो हमें निवेशकों से मिल सकते हैं। पर निवेशक वैश्विक जोखिम से बचने के लिए उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित विकसित अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करना चाहते हैं।
क्या रुपये की विनिमय दर गिरने देना सही होगा?
- रुपये की विनियम दर गिरने से विदेशी खरीदारों के लिए हमारा सामान सस्ता हो जाता है, जिससे हमारा निर्यात बढ़ता है। वहीं आयात के लिए हमें रुपये पहले की अपेक्षा ज्यादा देने पड़ते हैं। इससे आयात घटता है। इन दोनों तरीकों से रुपये का संतुलन बनाने में मदद मिलती है। इसीलिए रुपये की विनिमय दर को गिरने देना सही होता है।
- रुपया सस्ता होने के कारण भारतीय शेयर व बांड सस्ते हो जाते हैं इससे विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे अधिक डॉलर मिलते हैं तथा घाटा कम होता है।
यदि हम रुपये में संतुलन बनाने की कोशिश करें?
- इससे असंतुलन समय के साथ बढ़ सकता है। केन्द्रीय बैंक हर समय डॉलर बेचकर इसकी भरपाई नहीं कर सकता, क्योंकि एक समय के बाद रिजर्व खत्म हो जाएगा। इसीलिए अवमूल्यन अपरिहार्य है। हाँ, यह भी है कि कंपनियाँ सुरक्षित निवेश के लिए अपनी संपत्ति विदेश स्थानांतरित करती हैं।
- यदि निजी कंपनियों को यह पता चलता है कि केन्द्रीय बैंक विनिमय दर नियंत्रित करेगा, तो उनका रुझान बाजार से अधिक केन्द्रीय बैंक के अगले कदम पर रहता है। इससे नियंत्रण से निजी क्षेत्र की अस्थिरता बढ़ती है।
विनिमय दर कोई समस्या नहीं है, बल्कि समस्या का वह तंत्र है, जिससे समाधान किया जाता है। इसे नियंत्रित करने से समायोजन में अंतत: देरी होती है और लागत बढ़ जाती है। इसीलिए रुपये को स्वतंत्र रूप से चलने देना ही सही नीति है।