26-05-2026 (Important News Clippings)
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Date: 26-05-26
From black to grey
India needs to prepare for a future with an ageing population
Editorial
If India wanted proof of its shifting demo- graphic status, then the latest SRS bulletin, 2024 has provided just that. The figures from the Sample Registration System – Statistical Report, 2024, offer incontrovertible proof-falling fertility rate, low crude birth rate – to show that India’s pace of population growth is considerably slowing down. While the pundits predict at least three decades of population growth for the country, the plunging fertility rate certainly commands pause for contemplation and forward planning, for India to crest a crisis that several nations are struggling to manage. India’s Total Fertility Rate has dropped to 1.9, lower than the re- placement level of 2.1, aided, in large, by a falling birth rate. As per the latest SRS data, India’s birth rate fell from 21 in 2014 to 18.3 in 2024; while death rate marginally went down from 6.7 to 6.4. The country is well on its way from population ‘explosion’ to one of ageing population and shrinking workforce expansion. India might still reap its demographic dividend – the median age in India is 29.2 years, in stark contrast to China (median age of 40.2), and several other European nations. In 2026, India has approximately 370 to 380 million youth, aged 15-29 years, representing roughly 27% of the country’s population. Estimates also put India’s below 35 years population at over 65% of the total, making it one of the world’s youngest cohorts.
In demographic terms, falling birth rate reflects a decline in fertility, linked to factors such as urbanisation, better education, access to contraception, and the desire for smaller families. India’s high life expectancy at birth (72 years) and dipping death rate offer the other side of the transition paradigm, implying better access to health care. India needs to reassess the path ahead and pivot to prepare for the needs of a future greying nation, when the demographic dividend disappears. The SRS data, however, flags a more im- mediate concern too – one of vast regional and rural/urban disparities. Overall, performance in rural areas is not on a par with the urban centres, and the southern States continue to stay ahead of the northern States. Overall, child survival improvements are real (the Infant Mortality Rate has fallen to 24) but high-burden States in the north are still at a much higher IMR. States and areas that lag will need targeted interventions, whether it is access to health care, awareness or education facilities to effect a national convergence.
हमारा कृषि प्रधान देश होना आयातों में नहीं झलकता
संपादकीय

वर्ष 2013-14 में भारत कृषि उत्पादों का निर्यात आयात के मुकाबले 27 अरब डॉलर ज्यादा (15.5 अरब आयात और 43.3 अरब निर्यात ) करता था। 2025-26 में यह अंतर घटकर मात्र 12.7 अरब (40.4 अरब के मुकाबले 53.1 अरब डॉलर) रह गया है। भारत में विदेश से वनस्पति तेल, दाल, फल और कच्चा कपास आता है। जरा सोचें, एक कृषि प्रधान देश में क्या उक्त सामग्रियों का डॉलर देकर आयात करना नीतिगत दोष नहीं है? सरकार मानती है कि किसानों को भारी पानी खपत वाली फसलें जैसे गन्ना, गैर-बासमती चावल और गेहूं की जगह दलहन और तिलहन की खेती की ओर जाना चाहिए। कृषि वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि समान फसल और क्रॉप रोटेशन के अभाव में उत्पादकता / उर्वरता ही नहीं, भूजल स्तर भी घट रहा है । लेकिन सरकार यह बात किसानों को समझा नहीं पा रही है। सरकार ने इस बार पुरानी गलती से बचते हुए आगामी खरीफ की 14 फसलों की एमएसपी घोषित करते हुए कोशिश की है कि कपास, दालों और तिलहन उत्पादों पर एमएसपी ज्यादा दी जाए, जबकि चावल पर मात्र 3% वृद्धि की है। मोटे अनाज की खेती प्रोत्साहित करने की कोशिश भी की गई है। लेकिन चूंकि दलहन और तिलहन पाला/रोग से जल्द खराब होते हैं, लिहाजा जब तक इनकी बीमा और फसल खरीद की गारंटी नहीं होगी, समस्या पूर्ववत ही बनी रहेगी।
Date: 26-05-26
क्या दुनिया में आज ऐसी कोई संस्था नहीं, जो दखल दे सके?
डॉ. अरुणा शर्मा, ( प्रैक्टिशनर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट और इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव )
विश्व युद्धों के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) की स्थापना इसलिए की गई थी, ताकि भविष्य में हिरोशिमा-नागासाकी जैसी विनाशकारी घटनाओं और व्यापक पैमाने पर होने वाले युद्धों को रोकने के लिए बातचीत का मंच तैयार किया जा सके। इसके कुछ सर्वमान्य सिद्धांतों में क्षेत्रों का अधिग्रहण न करना, नागरिकों, रेडक्रॉस और सहायता एजेंसियों को हमले के क्षेत्र से बाहर रखना और उन्हें पहुंच प्रदान करना शामिल था।
लेकिन यूक्रेन, ईरान और लेबनान में जो हुआ, वो इन सिद्धांतों के बिलकुल उलट था। यूएन, नाटो और ब्रिक्स सदस्य देशों ने सभी पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए दखल जरूर दिया, लेकिन यहां तक पहुंचने में उन्हें कई महीने और साल लग गए। क्या आज यह आवश्यक नहीं कि ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए यूएन को सशक्त बनाए जाए? यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सतत विकास लक्ष्यों में बाधा न आए।
यूं तो एक चार्टर के जरिए बने यूएन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों को बढ़ावा देना, सामाजिक और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना, पर्यावरण की रक्षा करना और आपात स्थितियों में मानवीय सहायता प्रदान करना है। यह संघर्षों को रोकने, अंतरराष्ट्रीय कानून बनाए रखने और सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वैश्विक प्रयासों के समन्वय जैसे कार्य भी करता है।
लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजराइल युद्ध, गाजा, लेबनान आदि में यूएन को अपने इन उद्देश्यों की प्राप्ति में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालात ऐसे बन गए कि यूएन के लिए मानवीय सहायता सुनिश्चित करना तक कठिन हो गया और युद्ध-अपराधों की निंदा भी यूएन चार्टर के बजाय देशों के दबदबे के अनुसार की गई। ऐसे में इस संगठन को फिर से ताकतवर बनाने के लिए हमें शुरुआत से विचार करने की जरूरत है।
रूस-यूक्रेन युद्ध में यूएन महज कागजी कार्रवाई तक सीमित रहा था। उसने रूस की बिना शर्त-वापसी के प्रस्ताव पारित किए, शांति का फॉर्मूला पेश करने का प्रयास किया। लेकिन यह फॉर्मूला हमले के 4 साल बाद आया, इसलिए प्रभावहीन रहा। मानवीय सहायता सुनिश्चित करने में भी वह विफल रहा, क्योंकि प्रभावितों तक पहुंचने से उसे बार-बार रोका गया। भारी जनहानि होने के बाद जाकर वह 1.3 करोड़ प्रभावितों तक मदद पहुंचा सका। यूएन की इस मूकदर्शक भूमिका के कारण 2025 यूक्रेनवासियों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ।
फिर 2026 में इजराइल और ईरान के बीच नया मोर्चा खुल गया। इसने वैश्विक व्यापार मार्गों और आवागमन को बाधित किया। मानवाधिकारों का पूर्णत: उल्लंघन हुआ, जिसमें शुरुआत में ही ईरान में स्कूली छात्राओं पर हमला हुआ और लेबनान में भी ऐसी ही घटनाएं सामने आईं। यूएन के अन्य सदस्य भी तभी सक्रिय हुए, जब ऊर्जा सप्लाई रुक गई।
यूएन महासचिव के बयान भी संयम रखने जैसी अपील तक सीमित रहे, जबकि उद्देश्य महज अपील करना नहीं था, बल्कि सदस्य देशों को एकजुट होकर यह सुनिश्चित करना था कि यूएन के स्थापित मानदंडों का उल्लंघन न हो। ऐसे में क्या फिर से विचार करने जरूरत नहीं कि यूएन के पास स्वयं की ताकत होनी चाहिए?
यूएन का लक्ष्य मानवाधिकार उल्लंघन रोकना और समृद्धि लाना है। लेकिन युद्धों ने इन प्रयासों को बाधित किया और देशों को महंगाई और गरीबी के दुष्चक्र में धकेल दिया है। व्यापार और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। नागरिकों की जानें जा रही हैं और उन्हें गरीबी में धकेला जा रहा है। इस सब का दीर्घकालिक असर होगा। अंतरराष्ट्रीय कानून भी इन युद्धों के शिकार बने हैं। बड़ी चिंता इस संघर्ष के अन्य क्षेत्रों में फैलने की है।
आज फिर से यूएन और उसकी संस्थाओं को मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई है। पहला कदम दक्षिण अफ्रीका द्वारा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मानवीय अपराधों के खिलाफ मुकदमा शुरू करना था। इससे संघर्ष को बड़े युद्ध में बदलने से रोकने के लिए कुछ अवसर मिला, लेकिन यह भी ‘कागजी शेर’ ही साबित हुआ। न कोई संकल्प दिखा, न ठोस कार्रवाई की गई। हां, कूटनीतिक संवाद जरूर जारी रहे। लेकिन क्या अब अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मनवाने के लिए यूएन को और ताकतवर बनाने की जरूरत नहीं है?
आवश्यकता है कि यूएन सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन हो। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका के साथ ईरान, भारत, द. अफ्रीका को स्थायी सदस्य बनाया जाए। महासभा द्वारा अस्थायी सदस्यों को चुने जाने की व्यवस्था भी जारी रहनी चाहिए।
गैर इस्लामी है सड़क पर नमाज
फिरोज बख्त अहमद, ( लेखक पूर्व कुलाधिपति और समाजसेवी हैं )

पहले से ही 45-50 डिग्री में धधक रहे भारत में बंगाल के एक भड़काऊ नेता हुमायूं कबीर ने यह कहकर सियासी पारा और बढ़ा दिया है कि आने वाली बकरीद को मुस्लिम सड़कों पर ही नमाज पढ़ेंगे, जबकि यह गैर-इस्लामी, गैर-कानूनी और गैर-इंसानी कृत्य है। विडंबना यह है कि भोले भाले आम मुस्लिम ऐसे ही लोगों को अपना नेता समझ लेते हैं। सड़क पर नमाज पढ़ने की जिद शायद बंगाल और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के सड़कों पर नमाज न पढ़ने के आदेश के चलते की जा रही है। इस्लाम के बारे में कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार की राय रखे, यह उसका निजी अधिकार है, मगर इसमें तीन बढ़िया बातें अवश्य हैं।
प्रथम तो इस्लाम कहता है, ‘लकुम दीनोकुम वले यदीन,’ अर्थात तुम्हें तुम्हारा दीन मुबारक, हमें हमारा! दूसरी बात है ‘हुकूक-उल-इबाद’ अर्थात बिना किसी फर्क के दूसरों के जायज अधिकारों की मान्यता और तीसरा है, ‘फमैयांमल मिस्काला जर्रातिन खैरईंयरा/ वमैयांमल मिस्काला जर्रातिन शररईंयरा’ अर्थात यदि कोई भी मुस्लिम कितनी ही मामूली अच्छाई किसी के साथ भी करेगा तो उसे उसका बदल यानी फल मिलेगा। इसी प्रकार यदि किसी मुस्लिम ने किसी के साथ कोई बुराई की तो उसे उसका भी वैसा ही बदल यानी फल मिलेगा। इन्हीं सब कारणों से भी सड़क पर नमाज पढ़ना गैर-इस्लामी है।
हदीस-ओ-कुरान की रोशनी में हजरत मोहम्मद (स.) के अनुसार सात स्थानों पर नमाज पढ़ने की स्वीकृति नहीं है, जिनमें सड़क भी शामिल है। जो आम रास्ता हो, वहां पर नमाज की तो बिल्कुल मनाही है। यह ध्यान रहे कि अरब देशों में सड़कों पर नमाज की इजाजत नहीं है। हजरत मोहम्मद ने अपने हाथों से कुदाल के जरिये एक ऐसी निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार को गिरा दिया था, जिसे कुछ जोशीले मुस्लिम सहाबा किसी गैर मुस्लिम की जमीन पर कब्जा कर वहां मस्जिद बना कर दीन की खिदमत करना चाह रहे थे, मगर क्या औसत मुस्लिम उनके बताए रास्ते पर चल रहे हैं? इस संदर्भ में एक जुमला चल निकला है, ‘हम हजरत मोहम्मद साहब को तो मानते हैं, मगर उनकी बात नहीं!’
मुस्लिमों की भी जायज शिकायत है, जिससे कुछ हिंदू भी सहमत हैं कि जब कांवड़ यात्राएं लाउडस्पीकरों के साथ निकलती हैं और विभिन्न अवसरों पर शोभा यात्राएं निकलती हैं तो उससे भी लोगों को समस्या होती है। इसका तर्क यह दिया जाता है कि ये सब कार्य तो वर्ष में एक बार ही होते हैं और मुस्लिम तो हर हफ्ते सड़कों पर नमाज पढ़ते हैं। अब इसमें सरकारें यह कर सकती हैं कि मात्र ईद, बकरीद और जुमातुल विदा को 25 से 30 मिनट तक के लिए नमाज की अनुमति दे सकती हैं। वैसे अगर मस्जिद में जगह कम है तो दो या तीन बार जमातें की जा सकती हैं। नमाज घरों या छतों पर भी हो सकती है। कई जगहों पर होती भी है। आम मुसलमानों के साथ समस्या यह है कि वे स्वयं ही न तो अपने मजहब को अच्छी तरह समझते हैं और न ही दूसरों को समझा पा रहे हैं। अल्लाह केवल मुस्लिमों का नहीं, सभी का है। इसी कारण उसे रब्बुल आलमीन कहा जाता है यानी सभी का ईश्वर। ऐसे ही हजरत मोहम्मद साहब को भी रहमतुल्लिल आलमीन अर्थात केवल मुस्लिम को वरदान देने वाला नहीं, बल्कि सभी पर रहमत न्योछावर करने वाला पैगंबर कहा गया है।
इस्लाम को एक फुटबाल की तरह इधर-उधर भटकाया जाता रहा है। इसमें हमारे अपने ही कुछ उलमा, सियासी नेता और बौद्धिक वर्ग के लोग शामिल हैं। हुमायूं कबीर धमका रहे हैं कि लोग सड़कों पर नमाज पढ़ेंगे और बकरीद पर गायों की कुर्बानी भी देंगे। ऐसे ही लोगों के कारण तनाव फैलता है। अच्छी बात यह है कि कौम को गलत रास्ते पर डालने वाले ऐसे लोगों का विरोध करने वाले भी मुस्लिम समाज में मौजूद हैं, जैसे ‘इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन आफ इंडिया’ के अध्यक्ष ख्वाजा इफ्तिखार अहमद। उन्होंने उन बंगाली मुसलमानों को मुबारकबाद दी, जिन्होंने बकरीद पर गाय की कुर्बानी न करने का निर्णय लिया। शायद आम मुस्लिम यह भूल गए हैं कि मोहम्मद साहब ने कहा है कि गाय का दूध रहमत है और गोश्त जहमत (जहर)! गाय के बचाव में इससे अधिक क्या कहा जा सकता है।
यह ध्यान में रखते हुए कि हिंदू समाज गाय का आदर करता और उसे पूजता है, मुसलमान न के बराबर ही गाय को काटते हैं। इतिहास बताता है कि अपने दौर में शहंशाह बहादुर शाह जफर ने भी फतवा दिया था कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी न दी जाए। इसी प्रकार से दारुल उलूम देवबंद की ओर से भी फतवा जारी किया जा चुका है कि गाय का वध न करें, क्योंकि हम साझा विरासत के पैरोकार हैं और ऐसा कोई कार्य न करें कि जिससे किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस लगे। वास्तव में यह बात सभी मजहबों के लोगों पर लागू होती है। एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करना चाहिए।
भारत के मुसलमान भलीभांति समझते हैं कि कुरान उनका धार्मिक संविधान है तो बाबा साहेब भीमराम आंबेडकर का लिखा कानून उनका राष्ट्रीय संविधान। जब किसी भी आस्था, मजहब को मानने वाला सड़क पर आता है तो वह भारतीय पहले होता है और हिंदू, मुस्लिम बाद में। अब समय है कि हम न तो हिंदू कार्ड खेलें, न मुस्लिम कार्ड, बल्कि भारत कार्ड अपने हाथ में मिलकर थामें, ताकि जगत गुरु बनने की राह पर स्पीड ब्रेकरों से पार पाते हुए सफलता से निकल सकें और देश को विकसित बना सकें।
पर्यटन में संभावनाओं की नई डगर
सुरेश सेठ
हमारे देश में पर्यटन को विशेष महत्त्व दिया गया है। वैसे तो भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन कमाई पर्यटन क्षेत्र से होती है। इसको कई तरीके से वर्गीकृत कर देखा जा सकता है जैसे, चिकित्सा पर्यटन और धार्मिक पर्यटन। इस तरह के पर्यटन से विदेशी राजस्व भी प्राप्त हो जाता है, क्योंकि कई देशों से पर्यटक और यात्री भारत आते हैं और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार को समृद्ध करते हैं।
रमणीक स्थलों के पर्यटन को भी कमाऊ माना गया है। पहाड़ों, नदी किनारे और समुद्र तट पर बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। इस पर्यटन को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। कई स्थलों का पुनरुद्धार कर पर्यटकों को आकर्षित किया गया है। आकर्षक पर्यटन स्थलों को देखने जब विदेश वे आते हैं, इससे देश को फायदा ही होता है।
मगर अब एक नया संकट हमारे सामने हैं। ईरान और अमेरिका युद्ध के कारण कच्चे तेल, गैस और उर्वरक का भारी संकट पैदा हो गया है। देश के शीर्ष नेतृत्व ने मितव्ययी होने का संदेश दिया है। सोना न खरीदने, पेट्रोल-डीजल बचाने और विदेशी यात्राएं कम करने की नसीहत दी गई है। लक्ष्य एक ही है कि विदेशी पूंजी बचाई जाए, ताकि विदेशी विनिमय में हम अपने बजट घाटे और चालू घाटे को संभाल सकें और डालर के मुकाबले रुपए के गिरते जाने से बचा सकें।
इन चुनौतियों के बीच पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। उसे और विकसित किया जा सकता है। इस पर काम करने की जरूरत है। भारत कई संस्कृतियों का देश है। इतनी विविधता वाला राष्ट्र दुनिया में कहीं नहीं हैं। कृषि प्रधान देश होने के कारण भारत की एक अनूठी लोक संस्कृति भी है। ग्रामीण समाज के हर क्षेत्र की अपनी विशेषता है। अपने-अपने लोकगीत हैं और अपनी-अपनी लोक परंपराएं हैं।
अगर इनकी ओर देश और विदेश के पर्यटकों को आकर्षित किया जाए, तो हमारा राजस्व बढ़ेगा। विदेशी पूंजी कमाने का एक नया रास्ता निकलेगा। हमारे सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े बताते हैं कि कृषि क्षेत्र के मुकाबले सेवा क्षेत्र से कहीं अधिक राजस्व प्राप्त होता है। सेवा क्षेत्र में पर्यटन क्षेत्र मुख्य भागीदार है।
अगर पर्यटन क्षेत्र में हम लोक संस्कृति से परिचय का एक नया आयाम जोड़ दें, तो पर्यटकों की एक बड़ी संख्या हमारे सामने होगी। देश के कई कोने पर्यटन का आकर्षण बन जाएंगे। भारत में विदेशी पर्यटकों की आमद इस तरह भी बढ़ाई जा सकती है। हमारी घरेलू दस्तकारियां, हमारे अनूठे लोक नृत्य और ग्रामीण समाज का लोक व्यवहार पर्यटकों के लिए बहुत बड़ा आकर्षण का केंद्र है। बस इसको और प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इससे हम विदेशी पर्यटकों के लिए भारत में एक नई दुनिया खोज सकते हैं।
पिछले दिनों पंजाब में एक नई नीति शुरू हुई है जिसे ‘होमस्टे नीति’ कहा जाता है। इसमें पंजाबी संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने का ‘मास्टर प्लान’ बनाया गया है। ‘होमस्टे’ को लेकर नवाचार या उससे जुड़े नव उद्यमियों के लिए आनलाइन पंजीकरण की नीति बनाई गई है। यह भी घोषणा की गई है कि ऐसे उद्यमियों को योजनाबद्ध तरीके से पांच करोड़ तक की सबसिडी दी जा सकती है।
मगर पंजाब ही क्यों, हम इसका विस्तार देश के हर राज्य में कर सकते हैं, क्योंकि हर राज्य की ग्रामीण संस्कृति और उसका लोकाचार और व्यंजन अलग-अलग हैं। इसे बढ़ावा दें, तो पर्यटक देश के हर कोने में जाना पसंद करेंगे। इस प्रकार हम देखते ही देखते पूरे देश को पर्यटकों के लिए आकर्षक स्थल बना सकते हैं। पंजाब में जो योजना बनाई गई है, इसका नाम ‘फार्मस्टे पालिसी 2026’ दिया गया है।
आजकल होटलों के अतिरिक्त रमणीक स्थलों पर आने वाले नव दंपतियों या विदेशी पर्यटकों को ‘होमस्टे’ की सुविधा दी गई है। हिमाचल और उत्तराखंड की सरकारें इस तरह के निवेश को अपने यहां प्रोत्साहित कर रही है। अब पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों को पर्यटकों के लिए आकर्षक बनाया जा सकता है। पंजाब ने इस दिशा में पहल कर दी है। अब यहां किसान पर्यटकों को ठहराने, खाने-पीने और ठेठ ग्रामीण जीवनशैली का अनुभव कराने की सुविधा शुरू कर सकेंगे।
ध्यान देने की बात है कि पंजाब ही नहीं पूरे देश में छोटे किसानों की की बड़ी संख्या है, जिनके पास औसत क्षेत्र दो एकड़ से पांच एकड़ तक जमीन है। इससे आय इतनी कम होती है कि उनका जीना मुश्किल हो जाता है। आजादी के इतने साल गुजर जाने के बाद भी वे अपनी खेती को व्यावसायिक नहीं बना सके और आज भी उन्हें मानसून पर निर्भर रहना पड़ता है।
मगर अब यह सहारा भी कमजोर पड़ने लगा है। पर्यावरण पर प्रदूषण की मार का असर उन पर भी पड़ा है। बारिश के मौसम में भीषण गर्मी पड़ती है और जब फसलें पकने लगती हैं तो बारिश होने लगती है। ऐसी स्थिति में किसानों को अतिरिक्त आय की जरूरत है। विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं को जो इस समय खेतीबाड़ी में हाथ बंटा कर परिवार की मदद करती हैं। उनको अतिरिक्त आय का साधन दिया जा सकता है।
वह साधन है- ‘फार्मस्टे’। इसमें इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है। वे पर्यटकों को ठहराने और ग्रामीण जीवनशैली से परिचित कराने में सहयोग कर आय का उपार्जन कर सकती हैं।
अगर हम लोक संस्कृति के वाहक बन कर पूरे देश के ग्रामीण परिवेश को पर्यटकों के लिए विशेष पर्यटन क्षेत्र बना दें, तो सोचिए, इससे राजस्व में कितनी वृद्धि हो जाएगी। यही सोच कर पंजाब ने नई नीति बनाई है। पहाड़ों में बने ‘होमस्टे’ की तर्ज पर ‘फार्मस्टे’ को विकसित किया जा रहा है। ऐसा हर राज्य क्यों न करें? सभी राज्यों की अपनी लोक संस्कृति है और अपना ग्रामीण आकर्षण।
पंजाब आने वाले पर्यटक खेतों में रह कर ट्रैक्टर चलाने, बैलगाड़ी की सवारी करने, पशुपालन देखने और गांवों के पारंपरिक खानपान व रहन-सहन को करीब से महसूस कर सकेंगे। इसी प्रकार हर राज्य अपनी-अपनी ग्रामीण संस्कृति के अनूठेपन और अपने लोकगीतों एवं लोकनृत्यों से पर्यटकों को लुभा सकता है।
पंजाब में यह तय किया गया कि इस तरह के पर्यटन के लिए किसान के पास कम से कम एक एकड़ कृषि भूमि जरूर हो। इस प्रकार यहां के छोटे किसानों को अतिरिक्त आय का एक साधन मिल गया है। पंजाब में बनी नई नीति में साफ किया गया है कि कुल जमीन के केवल दस फीसद हिस्से पर ही निर्माण किया जा सकेगा, जबकि बाकी 90 फीसद क्षेत्र खुला रखना होगा, ताकि पर्यटकों के लिए खेती और उसका प्राकृतिक स्वरूप बना रहे।
पंजाब में इस परियोजना पर निवेश में दस फीसद सबसिडी मिलेगी। इसकी अधिकतम सीमा पंच करोड़ है। विदेशी पर्यटक आते हैं तो ‘फार्मस्टे’ संचालक को 24 घंटे के भीतर फार्म-सी भरकर प्रशासन को सूचना देनी होगी और ध्यान रखना होगा कि उनका ‘फार्मस्टे’ ग्रामीण परिवेश को बरकरार रखे। गांवों की शांति और सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। यह योजना अपने आप में महत्त्वपूर्ण है।
इससे पहले निर्यात के लिए भी हर राज्य की दस्तकारी को विशेष रूप से प्रोत्साहन देने की योजना बनाई गई थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। मगर इस योजना में क्योंकि साधारण व्यक्ति का अपना उद्यम शामिल है, इसलिए इसके कामयाब होने की गुंजाइश काफी अधिक है।