15-05-2026 (Important News Clippings)

Afeias
15 May 2026
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Date: 15-05-26

​Cooling doctrine

Access to safe indoor temperatures must be a public-health entitlement

Editorial

Over the past decade, India’s response to extreme heat has settled into a familiar choreography. Summer comes and the National Disaster Management Authority (NDMA) regurgitates its tally of rising preparedness. The 16th Finance Commission has gone further, recommending that heatwaves be notified as a national disaster — a designation that would unbolt the door to dedicated central funding. But the heat action plan, as currently conceived, has reached the limits of what it can do. Even the NDMA concedes that the quality of these plans is uneven — several are imitations of plans drafted elsewhere. Where implementation happens at all, it leans heavily on short-term palliatives such as water kiosks, public advisories, and shaded waiting areas at bus stops. While these measures save lives at the margins, they do not alter the underlying exposure of the tens of millions of Indians who work, commute and sleep in conditions that are becoming, in the most clinical sense of the word, biologically untenable.

What India needs is something larger and more ambitious — a national cooling doctrine; a scalable framework that treats sustained access to safe indoor temperatures as a public-health entitlement to be guaranteed. The doctrine must begin where the harm is most acute: mandatory minimum cooling standards for indoor workplaces — factories, warehouses, commercial kitchens, call centres, delivery hubs — backed by an honest and fair inspection regime. Technology will have to do the heavy lifting by deploying passive cooling materials, reflective roofing deployed at scale, district cooling systems for dense urban zones, and cheaper, more efficient air conditioning calibrated for the peculiarities of Indian grids. But the problem cannot be solved by importing solutions designed for the temperate, wealthy economies of the global North. India’s heat is wetter, longer and more humid than the dry European summers that produced much of the existing cooling literature. Most Indians cannot afford the energy bills that western-style mechanical cooling implicitly assumes, as the grid in India, even on its best days, can supply at most 60% of its installed capacity. There is no quick fix on offer but to keep printing heat action plans while indoor temperatures climb is no longer a serious answer — it is theatre.


Date: 15-05-26

विकास के नए युग में पूर्वोत्तर

लक्ष्मण प्रसाद आचार्य, ( लेखक असम के राज्यपाल हैं )

भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि के कारण राष्ट्र की अमूल्य धरोहर रहा है। विविध जनजातीय परंपराएं, मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य, अद्वितीय लोक-संस्कृति और अपार संभावनाओं से परिपूर्ण यह क्षेत्र लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से अपेक्षाकृत दूर रहा। किंतु बीते एक दशक के दौरान पूर्वोत्तर में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है। असम सहित समूचा पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास, संपर्क, शांति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नए युग में प्रवेश कर चुका है। दशकों तक पूर्वोत्तर क्षेत्र संपर्क, आधारभूत संरचना की कमी तथा देश के अन्य हिस्सों से अलगाव जैसी चुनौतियों से जूझता रहा, किंतु क्षेत्र के सामरिक महत्व और अपार संभावनाओं को पहचानते हुए मोदी सरकार ने इसके विकास के लिए सक्रिय और समग्र दृष्टिकोण अपनाया। इस परिवर्तन के केंद्र में ‘एक्ट ईस्ट नीति’ रही है, जिसने पूर्वोत्तर को केवल सीमांत क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भारत के प्रवेश द्वार के रूप में पुनर्परिभाषित किया है।

‘एक्ट ईस्ट नीति’ ने पड़ोसी देशों के साथ भौतिक और आर्थिक संपर्क को सुदृढ़ करने के साथ-साथ पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान को भी नई मजबूती प्रदान की है। राजमार्गों, रेलमार्गों, अंतर्देशीय जलमार्गों और हवाई संपर्क जैसी प्रमुख आधारभूत परियोजनाओं में तीव्र गति से प्रगति हुई है। पुलों के निर्माण और सीमा व्यापार अवसंरचना के विकास से लाजिस्टिक्स में सुधार हुआ है तथा क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा मिला है। पूर्वोत्तर राज्यों तक बेहतर रेल संपर्क और उड़ान योजना के अंतर्गत क्षेत्रीय हवाई अड्डों के विस्तार जैसी पहलों ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर और अधिक निकट ला दिया है। इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा पूर्वोत्तर के लिए संसाधनों के प्रवाह में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। विभिन्न मंत्रालयों को अपने सकल बजटीय समर्थन का एक निश्चित प्रतिशत पूर्वोत्तर के लिए निर्धारित करने का निर्देश दिया गया है। स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में प्रमुख योजनाएं दूरदराज के इलाकों तक पहुंची हैं। क्षेत्र में डिजिटल संपर्क को भी व्यापक बढ़ावा मिला है। इससे समावेशन को बढ़ावा मिला है तथा असमानता में कमी आई है। इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण आधार शांति और स्थिरता पर दिया गया विशेष बल रहा है।

सरकार ने विभिन्न हितधारकों के साथ सक्रिय संवाद स्थापित कर लंबे समय से चले आ रहे संघर्षों के समाधान और उग्रवादी समूहों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया है। ऐतिहासिक शांति समझौतों और निरंतर संवाद ने अधिक सुरक्षित वातावरण तैयार किया है, जिससे निवेश और पर्यटन को प्रोत्साहन मिला है। कृषि, बागवानी, हस्तशिल्प और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में लक्षित निवेश के माध्यम से आधुनिक तकनीकों, बेहतर बाजार पहुंच और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्टार्टअप और उद्यमिता को नीतिगत तथा वित्तीय सहयोग प्रदान कर क्षेत्र के युवाओं की नवाचार क्षमता को नई दिशा दी जा रही है। सरकार ने आधारभूत संरचना सुधार, पर्यटन स्थलों के प्रचार और यात्रा प्रक्रियाओं को सरल बनाकर इस क्षेत्र को देश और दुनिया के पर्यटकों के लिए अधिक आकर्षक और सुलभ बनाया है।

यद्यपि आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास महत्वपूर्ण हैं, किंतु पूर्वोत्तर की वास्तविक शक्ति उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता में निहित है। गुवाहाटी में बिहू, झुमुर और बागुरुंबा नृत्य के भव्य आयोजनों द्वारा गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड स्थापित करना केवल क्षेत्र की जीवंत परंपराओं का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की संस्कृति को वैश्विक मंच तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है। इसने पूर्वोत्तर और देश के अन्य हिस्सों के बीच भावनात्मक एकता को और अधिक मजबूत बनाया है। इसके अतिरिक्त पूर्वोत्तर की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। जोरहाट में महान आहोम सेनापति वीर लासित बोरफुकन की 125 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा की स्थापना क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास और देशभक्ति की भावना को समर्पित एक महत्वपूर्ण श्रद्धांजलि है। बटद्रवा थान सांस्कृतिक परिसर के विकास तथा महत्वाकांक्षी कामाख्या कारिडोर परियोजना जैसी पहलें असम और पूर्वोत्तर में आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को नई गति दे रही हैं। साथ ही चराइदेव के मोइदम को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त होना असम की ऐतिहासिक विरासत की वैश्विक पहचान है। कौशल विकास कार्यक्रमों, उच्च शिक्षा संस्थानों और खेल अवसंरचना के विस्तार ने युवाओं को आगे बढ़ने के नए अवसर प्रदान किए हैं। ‘लखपति दीदी’, जिसे क्षेत्र में ‘लखपति बाइदेउ’ के नाम से जाना जाता है, समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई है।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पूर्वोत्तर वास्तव में ‘अष्ट लक्ष्मी’ के रूप में उभरा है। अलगाव से एकीकरण और उपेक्षा से सशक्तीकरण तक की यह यात्रा प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक है। यह सिद्ध करती है कि दूरदृष्टि, दृढ़ संकल्प और सामूहिक प्रयास किस प्रकार एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।


Date: 15-05-26

पश्चिम एशिया संघर्ष और भारत के हालात

अजय छिब्बर, ( लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी के प्रतिष्ठित विजिटिंग स्कॉलर हैं )

होर्मुज स्ट्रेट से आवागमन लगातार बाधित होने के कारण अप्रैल के अपने स्तंभ में मैंने जिस मुद्रास्फीति जनित सुस्ती (स्टैगफ्लेशन) की आशंका जताई थी वह अब भारत और विश्व के लिए स्पष्ट वास्तविकता बनती जा रही है। विश्व बैंक के नवीनतम वस्तु पूर्वानुमान के मुताबिक युद्ध के चलते 2026 में तेल की कीमतें पहले की अपेक्षा 20 डॉलर प्रति बैरल अधिक रहने की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्र कोष यानी आईएमएफ का 2026 के लिए विश्व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि का 3.4 फीसदी का अनुमान घटकर करीब 3 फीसदी रह जाएगा। वैश्विक मुद्रास्फीति भी बुनियादी पूर्वानुमान की तुलना में लगभग 1 फीसदी अंक बढ़ जाएगी।

भारत को और अधिक मुश्किल हालात का सामना करना होगा। आईआईएम के कारोबारी पूर्वानुमान सर्वेक्षण के अनुसार जीडीपी वृद्धि 7 फीसदी से अधिक के स्तर से घटकर 6 से 6.5 फीसदी रह जाएगी और मुद्रास्फीति बढ़कर 5 फीसदी से ऊपर निकल जाएगी। यह 4 फीसदी मुद्रास्फीति के तय लक्ष्य से अधिक होगा। 2025 के अंत में भारत को ‘गोल्डीलॉक्स अर्थव्यवस्था’ (अच्छी वृद्धि, कम मुद्रास्फीति और उच्च रोजगार वाली) कहा गया था, लेकिन अब इसे रिवर्स गोल्डीलॉक्स कहा जा रहा है। पेट्रोल पंप पर कीमतों में वृद्धि को रोकना बहुत लंबे समय तक संभव नहीं है, क्योंकि इससे तेल सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों की वित्तीय स्थिति और राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को नुकसान पहुंचेगा। एलपीजी की कीमतें पहले ही बढ़ा दी गई हैं और डीजल तथा जेट ईंधन पर निर्यात शुल्क लगाया गया है। रुपया डॉलर के मुकाबले 95 पार चला गया है और एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल हो गया है। रिजर्व बैंक ने थोड़े समय के लिए हस्तक्षेप किया लेकिन जल्द ही समझ लिया कि यह हार जाने वाली लड़ाई है क्योंकि ईरान युद्ध से उत्पन्न संकट के चलते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजारों से 21 अरब डॉलर से अधिक की राशि निकाल ली है।

हालांकि ईरान युद्ध से पहले ही रुपया कमजोर हो गया था और 2025 में यह एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा था, क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजारों से 19 अरब डॉलर से अधिक की राशि निकाल ली थी। यह शुल्क संबंधी झटके के कारण हुआ। दरअसल, अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी शुल्क लगा दिए जिससे सभी चकित रह गए। लेकिन इसके साथ ही कम चर्चा में रहने वाला ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का झटका’ भी इसमें योगदान करने वाला रहा क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि भारत का सूचना प्रौद्योगिकी सोर्सिंग मॉडल पराजित होने वाला है। सरकार ने इस धारणा का मुकाबला एक बहुचर्चित एआई शिखर सम्मेलन के माध्यम से किया और 2030 तक एक मजबूत एआई पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए एक व्यापक एआई मिशन की घोषणा की है। इसमें स्वदेशी छोटे एआई मॉडल तैयार करना और स्टार्टअप्स तथा सार्वजनिक-निजी एआई परियोजनाओं को बढ़ावा देना शामिल है। परंतु यह सवाल बरकरार है कि एआई वरदान साबित होगा या अभिशाप क्योंकि भारत की बड़ी आईटी कंपनियों ने एआई अनुसंधान में निवेश करना उचित नहीं समझा है और उनका आउटसोर्सिंग मॉडल प्रभावित हो रहा है। वे कितनी जल्दी एआई का उपयोग करके अपने व्यापार मॉडल को नया रूप दे सकते हैं, यह देखना होगा।

फिर भी भारत 2025 से अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में उभरा। लेकिन अब तेल संकट और युद्ध से संबंधित आपूर्ति व्यवधानों ने पुन: धन को भारत से बाहर निकालना शुरू कर दिया है। रुपया भी कमजोर हुआ है। शुल्क का झटका कम हो गया है क्योंकि अब भारत संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल 10 फीसदी आयात शुल्क देता है, जो अन्य देशों के समान है। लेकिन डॉनल्ड ट्रंप व्यापार समीक्षाएं करवा रहे हैं और चुनिंदा देशों पर फिर से शुल्क लगाने का इरादा रखते हैं। इस पर नजर रखनी होगी। तेल की कीमतें अंततः पलट सकती हैं, लेकिन फिलहाल भारत की मुद्रा फिर से बुरी तरह प्रभावित हुई है। भारी भंडार होने के बावजूद यह एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल है। कुल मिलाकर, 2025 की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 10 फीसदी कमजोर हो चुका है। परिणामस्वरूप आईएमएफ के अनुसार डॉलर के संदर्भ में भारत को ब्रिटेन ने पीछे छोड़ दिया है और अब यह दुनिया की पांचवीं नहीं बल्कि छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, यहां तक कि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भी अब भारत से अधिक है।

तेज़ी से गिरती विनिमय दर से एक और बड़ी चिंता यानी चालू खाते के घाटे को संतुलित करने में मदद मिलेगी जो 2026 में जीडीपी के 2 फीसदी से अधिक हो सकता है। यह एक खतरनाक स्तर है। आयात को महंगा बनाने और निर्यात को प्रोत्साहित करने से कमजोर रुपया चालू खाते के घाटे को कम करने में मदद करेगा। लेकिन इसे कमजोर वैश्विक मांग दबा सकती है। अब तक के सभी अध्ययनों से पता चलता है कि निर्यात वैश्विक वृद्धि पर बहुत अधिक निर्भर करता है और वह कमजोर हो रही है। खाड़ी देशों को भारत का निर्यात, जो एक बड़ा बाजार है, युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसका मतलब है कि भारत द्वारा हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौतों विशेषकर यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अब न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौतों को अंतिम रूप देना और लागू करना बेहद महत्त्वपूर्ण होगा।

युद्ध ने केवल तेल ही नहीं बल्कि गैस और उर्वरक को भी प्रभावित किया है। सब्सिडी वाले यूरिया (नाइट्रोजन) पर अत्यधिक निर्भरता ने मिट्टी के पोषक तत्व अनुपात को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम संतुलन की ओर बदलाव आवश्यक हो गया है। किसानों को सीधे नकद हस्तांतरण (जैसे प्रति एकड़ निश्चित भुगतान) की ओर बढ़ना, मौजूदा इनपुट आधारित सब्सिडी को बदलना और उर्वरकों के लिए बाजार आधारित मूल्य निर्धारण की अनुमति देना काफी समय से लंबित है। भारत को अपनी गैस आवश्यकताओं में विविधीकरण की ओर भी देखना चाहिए। अमेरिका एक संभावित स्रोत है, लेकिन यह भी संभव है कि अगला अमेरिकी प्रशासन निर्यात करने के लिए इतना इच्छुक न हो और योजनाओं को रद्द कर दे। बाइडन प्रशासन के दौरान ऐसा हुआ था। यदि जो बाइडन ने एलएनजी निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाया होता तो आज भारत अपनी गैस आवश्यकताओं को लेकर इतनी परेशानी में न होता। ऑस्ट्रेलिया, रूस, मलेशिया और इंडोनेशिया भविष्य में खाड़ी से विविधीकरण के लिए अधिक विश्वसनीय समाधान प्रदान कर सकते हैं।

उम्मीद है कि तेल संकट नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज बदलाव को प्रेरित करेगा। आपूर्ति व्यवधानों ने दिखाया है कि तेल और अन्य महत्त्वपूर्ण इनपुट में अधिक भौतिक भंडार वांछनीय हैं। रूस जैसे भरोसेमंद साझेदारों के साथ दीर्घकालिक तेल अनुबंध किए जाने चाहिए भले ही अमेरिका दबाव डाले। साथ ही, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता महत्त्वपूर्ण है। भारत को यह संकेत देना होगा कि उसे मनमाने ढंग से दबाया नहीं जा सकता और उसके कुछ प्रमुख रणनीतिक हित हैं।

अब समय आ गया है कि भारत ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे समान विचारधारा वाले देशों के साथ-साथ अपने ब्रिक्स प्लस साझेदारों के साथ मिलकर इस अस्थिर दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए। बजाय इसके कि वह एक अप्रत्याशित अमेरिकी प्रशासन को खुश करने की कोशिश करे और बार-बार ठुकराया जाए। यदि अमेरिका इतनी भारी लागत के साथ दुनिया के बाकी हिस्सों पर एक मनमाना युद्ध थोप सकता है और अपनी इच्छा से बार-बार शुल्क लगा सकता है तो उससे मित्रता का कोई लाभ नहीं नजर आता।


Date: 15-05-26

अशांत मणिपुर

संपादकीय

मणिपुर तीन साल से हिंसा की आग में झुलस रहा है। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है। करीब ढाई सौ से ज्यादा लोग हिंसा में जान गंवा चुके हैं। हजारों लोगों के विस्थापन से राज्य का सामाजिक ताना-बाना टूट-सा गया है। राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद आखिर क्या वजह है कि उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश नहीं लग सका है। बीते बुधवार को उग्रवादियों ने एक बार फिर हमला कर तीन लोगों की हत्या कर दी। कांगपोकपी जिले में अंधाधुंध गोलीबारी में चार नागरिक भी घायल हो गए। इस घटना से नाराज नागरिकों ने राष्ट्रीय राजमार्ग-2 को बंद कर दिया। गौरतलब है कि यह मार्ग मणिपुर को न केवल नगालैंड से, बल्कि देश के अन्य हिस्सों से भी जोड़ता है। इस समय राज्य में कानून-व्यवस्था की जो स्थिति बनी हुई है, वह बेहद चिंताजनक है। एक बार फिर हुई हिंसा से साबित होता है कि सुरक्षा एजेंसियां सशस्त्र समूहों को नियंत्रित कर पाने में विफल रही हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप का भी कोई असर नहीं दिखता। समझौते भी औपचारिक बनकर रह गए हैं।

दरअसल, मणिपुर में शांति बहाली का कोई भी प्रयास इसलिए भी नाकाम हो जाता है, क्योंकि परस्पर विरोधी समूहों को कायदे से अब तक संवाद की मेज पर नहीं लाया जा सका है और न ही शायद इसकी जरूरत महसूस की गई। यही वजह है कि अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे सशस्त्र समूहों में एक-दूसरे के प्रति संदेह और अविश्वास खत्म नहीं हो रहा। यह निराशाजनक ही है कि जब भी राज्य में थोड़ी-बहुत स्थिति सुधरती दिखाई देती है, कोई न कोई उग्रवादी हमला राज्य को हिंसा की आग में झोंक देता है। सरकार अगर अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधियों को संवाद के लिए राजी करती, तो शायद उनके बीच भरोसा कायम होता। मगर केंद्र से लेकर राज्य सरकारों के भीतर इस मसले पर कोई संजीदगी नहीं दिखती। आज राज्य में शांति प्रबंधन की नहीं, बल्कि उसे स्थापित करने के लिए सक्रिय होने की जरूरत है। इसके लिए राज्य सरकार और केंद्रीय सुरक्षा बलों को मिलकर काम करना होगा, अन्यथा मणिपुर में लगातार जारी हिंसा के घातक नतीजे सामने आ सकते हैं।


Date: 15-05-26

सोने की खरीद में संयम जरूरी

सौम्य कांति घोष , ( सदस्य, 16वां वित्त आयोग )

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाए रखने के लिए लोगों से सोने की खरीद से बचने, घर से काम करके ईंधन की खपत कम करने और गैर-जरूरी विदेश यात्राओं को टालने जैसे उपाय अपनाने की अपील की है। उन्होंने यह आह्वान मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई अस्थिरता को देखते हुए किया है। इस पर चर्चा करने से पहले हमें उन संकेतकों पर नजर डालनी चाहिए, जिनसे पता चलता है कि बीते वर्षों में भारत की आर्थिक सेहत कैसी रही?

आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024, 25 और 26 (साल 2025-26) में भारतीय अर्थव्यवस्था ने करीब 7.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। इस दौरान महंगाई दर औसतन चार फीसदी, बैंकों का औसत शुद्ध लाभ 3.8 लाख करोड़ रुपये, वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात की औसत वृद्धि दर 3.5 प्रतिशत, बेरोजगारी दर 3.1 फीसदी और विदेशी मुद्रा भंडार 691 अरब डॉलर रहे हैं। इस काल-खंड में कुल आयात में पेट्रोलियम और सोने का हिस्सा लगभग 33 फीसदी रहा।

इस व्यापक आर्थिक मजबूती के विपरीत, अप्रैल 2025 से अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में 11.2 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशियाई मुद्राओं में औसतन 5.3 फीसदी की वृद्धि देखी गई है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की मुद्राओं में तो औसतन 13.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस अवधि में डॉलर सूचकांक में 5.6 फीसदी की गिरावट आई है। हालांकि, एक तथ्य यह भी है कि इस दौरान निवेश पूंजी (पोर्टफोलियो कैपिटल) बाहर जाती रही, जो 1991 के बाद सबसे अधिक है। इस वर्ष जनवरी से अब तक 21.3 अरब डॉलर की राशि बाहर जा चुकी है। साफ है, रुपये के मूल्य में अभी जो गिरावट दिख रही है, उसकी वजह भारत की आर्थिक नीति नहीं है। आरबीआई ने भी अपने हालिया बयान में इसका जिक्र किया है। फिर रुपये में इस गिरावट की वजह क्या है?

एक संभावित कारण यह है कि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए काफी समय तक रुपये को ‘शॉक-एब्जॉर्बर’ (झटका सहने वाले औजार) के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसका शुरू-शुरू में तो फायदा मिला था, लेकिन एक समय के बाद निर्यात पर इसका असर खत्म हो गया और आयात भी बढ़ने लगा। चूंकि रुपया शॉक-एब्जॉर्बर के रूप में काम कर रहा था, इसलिए बाजार भी इसमें शामिल हो गया। बाजार के खिलाड़ी डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने का दावा कर रहे थे, लिहाजा लगता है कि वह ‘सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी’ (ऐसी परिस्थिति के बारे में भविष्यवाणी, जो इंसानी व्यवहार में बदलाव के कारण सच हो जाए) सच हो गई, जबकि व्यापक आर्थिक कारक (मैक्रो-फंडामेंटल्स) कुछ और संकेत दे रहे थे। भले ही रुपये की कीमत में गिरावट भारत की ‘मैक्रो-फंडामेंटल्स’ की सीमाओं से परे है, पर हमें मौजूद विकल्पों पर गौर करना ही चाहिए।

सैद्धांतिक रूप से देखें, तो भुगतान संतुलन के मुद्दे को सुलझाने और भारत के आर्थिक कारकों के अनुकूल रुपये की कीमत बनाए रखने के लिए एक व्यापक नीति की जरूरत है। डॉलर के मूल्य में हर एक रुपये की बढ़ोतरी होने पर, भारत की जीडीपी में लगभग 60 अरब डॉलर की गिरावट हो सकती है।

अब आइए, प्रधानमंत्री के सुझावों को समझते हैं। सबसे पहले सोने की बात। भारत हरेक साल लगभग 750-800 टन सोना आयात करता है। घरेलू बाजार में स्थानीय सोने की आपूर्ति बेहद कम है। 2024 में घरेलू आपूर्ति का 86 फीसदी सोना आयात किया गया था, जिसके कारण बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च हुई थी। हालांकि, ओडिशा, मध्य प्रदेश व आंध्र प्रदेश में सोने की नई खानों की खोज से आयात पर दबाव कम हो सकता है, जो हमारे चालू खाता में संतुलन के लिए जरूरी है, किंतु इसमें कुछ समय लगेगा। इसलिए, आयात कम करने के लिए सोने की खरीद में संयम बरतना बुरा फैसला नहीं है।

केंद्र सरकार ने अब सोने सहित कीमती धातुओं के आयात पर सीमा शुल्क छह फीसदी से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है। अब एक दशक पूर्व घोषित स्वर्ण मुद्रीकरण नीति को भी विस्तार देना चाहिए। आरबीआई की 1992 की सिफारिश के अनुसार सोने पर एक राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए। इस नीति में व्यापार, अति-शुद्ध कीमती धातुओं के आयात, आभूषण निर्यात, निवेश आदि शामिल किए जाने चाहिए। सोने की कीमतों में वृद्धि का सकारात्मक पक्ष यह है कि ‘गोल्ड लोन’ में भी उछाल आया है। वित्त वर्ष 2025-2026 के अंत तक यह करीब 7.5 लाख करोड़ रुपये का था। इस तरह के कर्ज विशेषकर छोटे व सीमांत किसानों, बटाईदारों और खेती-बाड़ी के कामों में लगे लोगों के लिए अल्पकालिक कृषि ऋण के प्रमुख स्रोत होते हैं।

अब बाहर जाने वाले पैसों की चर्चा। वित्त वर्ष 2022-26 के दौरान, ‘लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम’ (एलआरएस) के तहत भारतीयों ने लगभग 136 अरब डॉलर रकम विदेश भेजे, जिसका 77 फीसदी हिस्सा अचल संपत्ति की खरीद, कर्ज/इक्विटी में निवेश, उपहार और विदेश यात्रा खर्च के रूप में बाहर गया। वित्त वर्ष 2013 में रिजर्व बैंक ने एलआरएस की सीमा को दो लाख डॉलर से घटाकर 75,000 डॉलर कर दिया था। अब इस सीमा का पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए।

इसी तरह, एनआरआई बॉन्ड पर भी विचार-विमर्श होना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्कीम लाने की मौजूदा लागत काफी ज्यादा हो सकती है। विदेशी निवेशकों के लिए भी कर ढांचे पर विचार किया जाना आवश्यक है, जिसमें 2023 के बाद बदलाव आया है। निस्संदेह, युआन-आधारित लेन-देन में आए उछाल ने भी गिरते रुपये की चर्चा करने वालों का ध्यान खींचा होगा, लेकिन तथ्य कुछ और संकेत देते हैं। आंकड़ों की मानें, तो मार्च 2026 तक लगभग 97.6 प्रतिशत स्पॉट युआन लेन-देन डॉलर में निपटाए गए थे, यानी युआन से जुड़े अधिकतर विदेशी मुद्रा स्पॉट मार्केट लेन-देन अब भी मुख्य रूप से डॉलर में ही हो रहे हैं।

इन सबको देखते हुए ‘ब्रिक्स पे’ की तरह ‘ब्रिक्स प्लस मुद्रा’ विकसित करना जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ‘ग्लोबल साउथ’ के व्यापार में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक है। जाहिर है, अब ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत है, जिसका नेतृत्व ब्रिक्स प्लस करे और जो वैश्विक मुद्रा बाजार के व्यवहार को उसी तरह आमूल-चूल बदल सके, जिस तरह ‘ब्रेटन वुड्स प्रणाली’ ने बदला था।