28-04-2026 (Important News Clippings)
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Gang of seven
Large-scale defections have rendered the Tenth Schedule impotent
Editorial
On April 24, seven of the Aam Aadmi Party (AAP)’s 10 Rajya Sabha members announced their merger with the Bharatiya Janata Party (BJP). The Rajya Sabha Chairman has accepted their claim of merger, raising the BJP’s strength in the Upper House to 113 and the combined strength of the National Democratic Alliance above the halfway mark for the first time. The episode highlights the nature of AAP, the crass opportunism of the turncoats, the machinations of the BJP, and the institutionalised defanging of the anti-defection law. Of the seven, Raghav Chadha, Sandeep Pathak and Swati Maliwal were part of AAP in an organic manner, to the limited extent that it had an identity beyond the whims of its founder, Arvind Kejriwal. For the other four, their exit is as opportunistic as their entries into AAP were. Mr. Kejriwal used to taunt the Congress for losing its legislators to the BJP in several States, as symptomatic of the erosion of its ethical responsibility. But a relentless campaign of anarchy in pursuit of power exposed the true character of AAP as a far cry from its grand claims. The disintegration of its Rajya Sabha contingent is the culmination of the cynicism and opportunism on which AAP thrived, imposing a heavy cost on the democratic institutions of India. It reaped what it sowed.
That is no reason to ignore the brazen misinterpretation — invoked by the gang of seven and accepted by the Chairman of the Rajya Sabha — of the Tenth Schedule of the Constitution, which bars the defection of elected representatives from their original party. The merger exception in the Schedule is clear that a party can merge with another, subject to the concurrence of two-thirds of its legislators. In 2023, the Supreme Court of India elaborated that the legislature party cannot dictate the course of the political party, and the two cannot be conflated. Two-thirds of the members of the legislature party of the original party must accept a merger for it to be valid under the anti-defection law. To turn this around and argue that two-thirds of a party’s legislative members can cross over to another party without attracting disqualification is a stretch, and is being challenged in the Court by AAP. The Court’s past interventions on similar developments are less than reassuring, sadly. Elected governments have been unseated on the back of large-scale defections, rendering the Tenth Schedule impotent in the recent past. That the Court could not set any deterrence to this open betrayal of popular mandates is borne out by the fact that such acts are being repeated with impunity.
संतुलन पर टिका व्यापार समझौता
अनंत स्वरूप, ( लेखक फिक्की के महासचिव हैं )
भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते यानी एफटीए का मूर्त रूप लेना भारत की व्यापारिक कूटनीति में महत्वपूर्ण कदम है। यह इसका भी स्पष्ट संकेत है कि देश पूरे आत्मविश्वास के साथ वैश्विक मंच पर जुड़ाव के लिए तैयार है। भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ और अधिक गहराई से जुड़ने का इच्छुक होने के साथ यह सुनिश्चित करने में भी लगा है उसके किसानों, श्रमिकों, छोटे उद्यमों यानी एमएसएमई और रणनीतिक क्षेत्रों के हित पूरी तरह सुरक्षित रहें। यह समझौता पिछले वर्ष मार्च में आरंभ हुई वार्ताओं का परिणाम है, जिस पर दिसंबर में ही सहमति बन गई थी और सोमवार को उस पर हस्ताक्षर भी हो गए। यह कवायद आर्थिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की दिशा में दोनों पक्षों की प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतीक बनकर भी उभरी है।
भारत के लिए यह समझौता केवल इसलिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि यह एक उच्च आमदनी वाले और व्यापार एकीकृत बाजार में नए अवसर खोलता है, बल्कि इस दृष्टि से भी महत्व रखता है कि इसके माध्यम से भारत के ओशियानिया और प्रशांत क्षेत्र में संबंधों को नया आयाम मिलेगा। अभी भारत और न्यूजीलैंड के बीच 1.3 अरब डालर के द्विपक्षीय व्यापार में भारत को ही बढ़त की स्थिति प्राप्त है, मगर न्यूजीलैंड के 47.5 अरब डालर के आयात में भारत की हिस्सेदारी मात्र दो प्रतिशत के मामूली स्तर पर है। पहले भारतीय उत्पादों पर 10 प्रतिशत का सीमा शुल्क लगता था, लेकिन एफटीए से ये समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे।
व्यापक रूप से देखें तो भारत-न्यूजीलैंड एफटीए भविष्य को ध्यान में रखने वाला समझौता है, जो वस्तुओं और सेवाओं के साथ ही गतिशीलता एवं नवाचार को ध्यान में रखता है। न्यूजीलैंड भारतीय निर्यातों के लिए सभी टैरिफ लाइनों पर नि:शुल्क पहुंच प्रदान करने जा रहा है, जिसमें वस्त्र, परिधान, चमड़े के सामान, कालीन, आटोमोबाइल और कलपुर्जों पर ऊंचे टैरिफ समाप्त कर दिए गए हैं। इसके बदले में भारत लगभग 70 प्रतिशत शुल्क श्रेणियों में सीमित बाजार प्रवेश देगा और 30 प्रतिशत श्रेणी में शुल्क तत्काल समाप्त करेगा, जबकि शेष श्रेणियों में इसे चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा। भारत ने लगभग 30 प्रतिशत संवेदनशील ‘टैरिफ लाइनों’ को इस सूची से बाहर रखा है, ताकि घरेलू हितों की रक्षा की जा सके। इसमें डेरी उत्पादों, दालों, चीनी, खाद्य तेल, प्याज, मक्का और बादाम जैसी श्रेणियों को संरक्षण प्रदान किया गया है, जो खाद्य सुरक्षा के साथ ही किसानों के हितों को संबोधित करते हैं। अनूठी विशेषताएं इस एफटीए को और आकर्षण प्रदान करती हैं। जैसे न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब डालर के निवेश की बात की है। यह निवेश मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों पर केंद्रित होगा। इसमें एक पुनर्संतुलन का भी प्रविधान है, जो निवेश लक्ष्य पूरे न होने की स्थिति में भारत को उपचारात्मक उपाय करने की अनुमति देता है। यह कदम रोजगार, तकनीक हस्तांतरण और आपूर्ति शृंखला के एकीकरण को बढ़ावा देगा, जिसमें न्यूजीलैंड के मजबूत विदेशी निवेश प्रोफाइल का लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त, न्यूजीलैंड ओशियानिया-प्रशांत बाजारों और स्थापित वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में भारत के लिए एक रणनीतिक प्रवेश-द्वार (गेटवे) की भूमिका भी निभाएगा।
भारतीय प्रतिभाओं के लिए भी यह बहुत उपयोगी साबित होने जा रहा है। इसमें भारतीय छात्रों के लिए वीजा की कोई ऊपरी सीमा निर्धारित नहीं की गई है। उन्हें पढ़ाई के दौरान 20 घंटे काम करने और पढ़ाई के बाद भी चार साल तक के लिए प्रभावी वीजा दिया जाएगा। न्यूजीलैंड ने किसी एफटीए में पहली बार इस तरह का कोई प्रविधान किया है। एक नई अस्थायी रोजगार प्रवेश श्रेणी के तहत आइटी, स्वास्थ्य सेवा और इंजीनियरिंग क्षेत्र की प्रतिभाओं के लिए 5,000 प्रोफेशनल वीजा भी सुनिश्चित किए गए हैं। इसमें आयुष चिकित्सकों, योग प्रशिक्षकों, भारतीय रसोइयों और संगीत शिक्षकों जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के लिए भी तीन साल तक के वीजा का प्रविधान है। ये कदम लोगों के बीच यानी पीटूपी और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों यानी बीटूबी संबंधों की काया पलटने की क्षमता रखते हैं।
वस्त्र-परिधान क्षेत्र को इस एफटीए से बड़ा संबल मिलने जा रहा है। न्यूजीलैंड हर साल 1.2 अरब डालर के परिधान आयात करता है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी केवल चार प्रतिशत है, जो इस एफटीए के बाद परवान चढ़ती दिखेगी। चमड़ा और फुटवियर के अलावा रत्न एवं आभूषण जैसे क्षेत्र भी इसके बड़े लाभार्थी बनकर उभरेंगे, जहां पूर्ववर्ती टैरिफ भारतीय उत्पादों की संभावनाओं की राह में अवरोध बन रहे थे। इसी तरह इंजीनियरिंग वस्तुओं के 6.6 अरब डालर के बाजार में भारत की जो हिस्सेदारी महज एक प्रतिशत रही, वह भी बढ़ने के भरे-पूरे आसार हैं। फार्मा बाजार में भी भारत की केवल 5.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी को भी एफटीए के बाद और विस्तार मिलेगा।
समझौते की ताकत इसके संतुलन और आपसी संवेदनाओं की मान्यता में निहित है। भारतीय कृषि क्षेत्र की संवेदनाओं को समझते हुए न्यूजीलैंड कीवी फल, सेब और शहद उत्पादन के लिए कार्य योजनाओं और उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना में भी सहयोग करेगा। भौगोलिक संकेतकों यानी जीआइ टैग वाले उत्पादों को भी समझौते में सुरक्षा प्रदान की गई है। यह एफटीए यही रेखांकित करता है कि भारत वैश्विक बाजारों के साथ गहन एकीकरण के लिए तैयार तो है, लेकिन वह अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए संतुलित रूप से ही इस राह पर आगे बढ़ेगा। यह संतुलित समझौता कृषि क्षेत्र को संरक्षण प्रदान करते हुए सेवाओं और निवेश के लिए द्वार भी खोलता है। तीन वर्षों में दसवें एफटीए समझौते पर भारत के हस्ताक्षर रेखांकित करते हैं कि देश व्यापारिक मोर्चे पर एक नए युग की दहलीज पर खड़ा है। एक ऐसा युग जहां भारतीय महत्वाकांक्षाओं का संगम वैश्विक अवसरों के साथ हो रहा है और इसमें नपे-तुले संरक्षण एवं खुले बाजार की संकल्पना में संतुलन साधा जा रहा है।
Date: 28-04-26
सीमाओं से परे
संपादकीय
वैश्विक व्यापार में आ रहे बदलावों को समझने का एक तरीका है गुरुत्व मॉडल जो कहता है कि दो देशों के बीच होने वाला द्विपक्षीय व्यापार उनके आर्थिक आकार के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम विश्व आर्थिक परिदृश्य में प्रकाशित एक अध्ययन दिखाता है कि सेवाओं के मामले में यह तर्क कमजोर हो रहा है, और हाल के दशकों में सेवाओं का निर्यात वस्तुओं की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ा है। 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में, दूरी में 1 फीसदी की वृद्धि से सेवाओं के व्यापार में 0.63 फीसदी की कमी आती थी, ठीक वैसे ही जैसे वस्तुओं के व्यापार में। लेकिन 2022–23 तक यह प्रभाव घटकर 0.52 फीसदी रह गया। सरल शब्दों में कहें तो सेवाओं के लिए भौगोलिक दूरी का महत्त्व कम हो गया है। वर्ष2008 के वित्तीय संकट और ‘स्लोबलाइजेशन’ (वैश्वीकरण की धीमी होती प्रक्रिया) के बाद भी, सेवाओं का व्यापार वैश्विक वृद्धि का एक मजबूत वाहक बनता जा रहा है।
इस बदलाव को दो शक्तियां आगे बढ़ा रही हैं। पहली, सेवाओं की प्रकृति खुद बदल गई है। पहले सेवाओं के व्यापार में परिवहन और यात्रा का वर्चस्व था, जो लोगों और वस्तुओं की आवाजाही पर निर्भर करते थे और 2000 में सेवाओं के व्यापार का लगभग 70 फीसदी हिस्सा थे। लेकिन 2023 तक ऐसी सेवाओं का हिस्सा घटकर 40 फीसदी से भी कम हो गया। उनकी जगह आधुनिक सेवाएं मसलन सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और व्यापार सेवाएं आदि आ गई हैं, जिन्हें बिना भौतिक निकटता के सीमाओं के पार पहुंचाना आसान है।
दूसरा, तकनीक ने व्यापार के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लाउड कंप्यूटिंग और रिमोट वर्क ने कई सेवाओं को व्यापार योग्य बना दिया है। फिर भी, अनेक अवसर अब भी दोहन करने के लिए हैं। वैश्विक स्तर पर सेवाओं का व्यापार मुख्य रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित है। साथ ही, बाधाओं की प्रकृति भी बदल रही है। वस्तुओं के व्यापार में जहां शुल्क प्रमुख हैं, वहीं सेवाओं को नियामक और संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसे डेटा स्थानीयकरण नियम, लाइसेंसिंग आवश्यकताएं, विदेशी स्वामित्व पर प्रतिबंध और अनुपालन मानक।
बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव इन बाधाओं को और मजबूत कर रहे हैं, जिससे बाजार तक पहुंच अधिक जटिल हो रही है। भारत का सेवाओं का निर्यात कुछ ही बाजारों, विशेषकर अमेरिका और यूरोप पर निर्भर है, जिससे यह नियामक जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत का सेवाओं का व्यापार समग्र व्यापार प्रदर्शन का केंद्र बन गया है। वैश्विक सेवाओं के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2005 में 1.9 फीसदी से बढ़कर 2023 में 4.3 फीसदी हो गई। वित्त वर्ष 25 में सेवाओं का निर्यात रिकॉर्ड 387.5 अरब डॉलर तक जा पहुंचा जो 13.6 फीसदी की वृद्धि है, जबकि सेवाओं का व्यापार अधिशेष 188.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह भी रिकॉर्ड है और वस्तु व्यापार घाटे के लगभग दो-तिहाई हिस्से को कवर करता है। स्टैनफर्ड आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) इंडेक्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार, एआई कौशल की पहुंच में भारत, अमेरिका के ठीक पीछे दुनिया में दूसरे स्थान पर है। इसका एक प्रमुख कारण वैश्विक क्षमता केंद्रों का उदय रहा है, जो वित्त वर्ष 20 से वित्त वर्ष 25 के बीच लगभग 7 फीसदी वार्षिक दर से बढ़े, और जिन्हें प्रतिभा उपलब्धता तथा लागत लाभ ने सहारा दिया।
जैसे-जैसे दूरी का महत्त्व कम होता जा रहा है और डिजिटल व्यापार बढ़ रहा है, भारत के पास एक स्पष्ट अवसर दिख रहा है। ध्यान सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर होना चाहिए। एआई जैसे उच्च-स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना, और नियामक बाधाओं को बहुपक्षीय प्रयासों या गहरे द्विपक्षीय और क्षेत्रीय एकीकरण ढांचों के माध्यम से आसान बनाना होगा जो सीमाओं के पार प्रवाह को सक्षम करें। सेवाओं का निर्माण क्षेत्र के साथ गहरा एकीकरण भी महत्त्वपूर्ण होगा ताकि विकसित हो रही वैश्विक सेवाओं की अर्थव्यवस्था से पूर्ण लाभ उठाया जा सके। हालांकि भारत के पास सेवाओं के निर्यात को बढ़ाने की क्षमता है और उसे नए बाजारों और क्षेत्रों की तलाश करनी चाहिए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सेवाओं में अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन के बावजूद नीतिगत ध्यान माल व्यापार से नहीं हटाना चाहिए। अधिक वस्तु निर्यात बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में मदद करेगा।
Date: 28-04-26
एक मजबूत भारत का निर्माण पथ
नौशाद फोर्ब्स, ( लेखक फोर्स मार्शल के सह- अध्यक्ष, नयनता विश्वविद्यालय के संस्थापक सदस्य, सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष और सेंटर फॉर टेक्नॉलजी इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च के वर्तमान अध्यक्ष हैं। )
एक पुराना चीनी शाप कहता है, ‘ईश्वर करे तुम्हारा दिलचस्प समय आए’| यह कहावत सुनने वाले के लिए अव्यवस्था, अनिश्चितता और उथल-पुथल की कामना करती है। यही पिछले छह हफ्तों में दुनिया का सार है, जब अमेरिका और इजरायल ने जंग छेड़ी। इस युद्ध ने गैस की कमी, व्यापक आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान और तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दी है। हम इस अनिश्चितता, अशांति और अव्यवस्था की दुनिया से प्रभावी ढंग से कैसे निपट सकते हैं ? जैसे-जैसे हम तात्कालिक चुनौतियों से निपट रहे हैं, हमें दीर्घकालिक सुदृढ़ता की अपनी आवश्यकता पर भी ध्यान देना होगा।
तात्कालिक प्रवृत्ति यही होगी कि हम अपने भीतर झांकें और आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ें। परंतु पूरी दुनिया और भारत भी, दूसरे देशों पर इतना अधिक निर्भर है कि यह एक प्रभावी रणनीति नहीं हो सकती है। वर्ष 2020 में गलवान के बाद हमने चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश की। विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगाए और आयात को सीमित करने की कोशिश की। इसका नतीजा क्या हुआ ? चीन को हमारा माल निर्वात 20 अरब डॉलर से कम पर ठहर गया। चीन से हमारा आयात दोगुना यानी 60 अरब डॉलर से बढ़कर 120 अरब डॉलर से अधिक हो गया। इसके चलते व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर का स्तर
पार कर गया।
आत्मनिर्भरता का विकल्प है परस्पर निर्भरता । यानी ऊर्जा के लिए, विशेष मशीनरी के लिए, विमान के लिए, मध्यवर्ती रसायनों के लिए कुछ इलेक्ट्रॉनिक घटकों के लिए हम दूसरों पर निर्भर रहेंगे। हमें यहसुनिश्चित करना चाहिए कि दूसरे भी हम पर तने ही निर्भर हो, उन चीजों के लिए जो केवल हम प्रदान कर सकते हैं, या उन उत्पादों और लागतों के लिए जो विशिष्ट रूप से बेहतर हों। यहां हमें काम करना है। भारत को दुनिया के लिए कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बनना होगा। इसके लिए घरेलू मजबूती और अंतरराष्ट्रीय महत्त्वा दोनों की आवश्यकता है।
घरेलू मजबूती कैसे हासिल होगी
हमारी अर्थव्यवस्था की मध्यम अवधि की बुनियादी स्थिति मजबूत है। उचित वृद्धि, कम महंगाई, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, और मजबूत बैंक तथा कंपनी बैलेंस शीट आदि इसके उदाहरण हैं। इसलिए, जब हम वर्तमान व्यवधान से निपट रहे हैं तो हमें दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर काम करना होगा । घरेलू मजबूती एक मजबूत अर्थव्यवस्था से आएगी, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और महत्त्वाकांक्षी कंपनियों पर आधारित होगी।
हमें सही कंपनियों की जरूरत है। प्रतिस्पर्धात्मकता को नीति के माध्यम से लागू करना होगा। इसका सबसे अच्छा तरीका है दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों से आयात के लिए खुले रहना। आगे बढ़ते हुए, वास्तव में प्रतिस्पर्धी कंपनी की एक अच्छी कसौटी है निर्यात क्या हम अपने मुख्य व्यवसाय में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों से उनके ही घरेलू मैदान में सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं? 1991 के बाद के सुधारों की विशेषता कंपनियों में बदलाव रही, जहां कम प्रतिस्पर्धी कंपनियां बाहर हो गईं और अधिक सफल कंपनियां फली- फूलीं। सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवाएं और औषधि उद्योग जैसे नए क्षेत्र प्रमुखता से उभरे, जिन्होंने हमारी सबसे सफल कंपनियां पैदा की। उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता विश्व बाजारों में सफलता से सिद्ध हुई। लेकिन यह बदलाव 2000 के दशक से कम हो गया। हमें इसे फिर से शुरू करने की आवश्यकता है।
हमें स्वामित्व वाली (प्रोपराइटरी) तकनीक में निवेश करना चाहिए। जैसा कि इस स्तंभ में भी लंबे समय से तर्क दिया है, भारतीय उद्योग को अपने आंतरिक शोध एवं विकास में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। एक अच्छा लक्ष्य यह होगा कि हम शोध एवं विकास में निवेश को अपने वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.3 फीसदी से पांच गुना बढ़ाकर विश्व औसत 1.5 फीसदी तक पहुंचें। लेकिन इससे भी अधिक उपयोगी यह होगा कि अपने उद्योग की शीर्ष 10 या 20 कंपनियों के साथ गंभीर मानक तय किए जाएं। वे बिक्री के फीसदी के रूप में कितना निवेश करते हैं? उनके पास शोध एवं विकास में कितने लोग हैं? उनकी योग्यताएं क्या हैं? और उनका शोध एवं विकास हर वर्ष क्या उत्पादन करता है या नतीजे देता है? कौन से नए उत्पाद आए, कौन से पेटेंट और डिजाइन पंजीकरण हुए, कौन से नए व्यवसायों और बाजारों में प्रवेश हुआ? और इन सभी मानकों पर बेहतर करने का लक्ष्य रखा जाए।
इसका अधिकांश हिस्सा उन कार्यों से संबंधित है जो कंपनियों को स्वयं करने चाहिए, एक ऐसे नीतिगत वातावरण के समर्थन से जो प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे घरेलू मजबूती के लिए उद्योग और राज्य दोनों की समान रूप से महत्त्वपूर्णं भूमिकाएं हैं।
विदेश में मजबूती हासिल करना
घरेलू उद्योग का दूसरा पक्ष है अंतरराष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा हमारे मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की तेजी से चल रही वार्ताएं स्वागतयोग्य हैं। हमें इन समझौतों का उपयोग एक मजबूत रणनीतिक संबंध बनाने के लिए करना चाहिए । पश्चिम एशिया में हमारे करीबी संबंध हमें युद्ध से प्रभावित क्षेत्र के पुनर्निर्माण और सुधार में गहराई से शामिल होने में मदद कर सकते हैं। यूरोपीय संघ का एफटीए यूरोप और भारत के लिए रक्षा और शिक्षा से लेकर संस्कृति तक हर क्षेत्र में संबंधों को गहरा करने का अवसर है।
हमें एशिया के अधिकांश हिस्सों के साथ र गढरे करने की जरूरत है। हमारी ‘एक्ट ईस्ट’ (पूर्वी देशों के साथ सक्रिय रिश्ते ) नीति को नारे से आगे बढ़कर वास्तव में क्रियान्वित होना चाहिए। कम से कम हम दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान), जापान और दक्षिण कोरिया के साथ मौजूदा व्यापार समझौतों को नवीनीकृत और मजबूत कर सकते हैं। हम व्यापक और प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौते (सीपीटीपीपी) में शामिल होने पर विचार कर सकते हैं, जो प्रशांत क्षेत्र की 11 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण ब्रिटेन को एक साथ लाता है। यह एक गहरा और व्यापक समझौता है, जिसमें सरकारी खरीद से लेकर निवेश तक हर चीज के लिए उच्च मानक हैं। यह अध्ययन करना कि हमारी पात्रता के लिए किन चीजों में बदलाव जरूरी है, उपयोगी घरेलू सुधारों की पहचान करने में सहायक हो सकता है, भले ही हम इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि यह अभी हमारे राष्ट्रीय हित में नहीं है।
हम ग्लोबल साउथ या वैश्विक विकासशील देशों की आवाज होने का दावा करते हैं लेकिन शायद अन्य देश ऐसा नहीं महसूस करते। एक उपयोगी दृष्टिकोण यह हो सकता है कि हम विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र में साझा रुख अपनाएं, और अफ्रीका में संबंधों और व्यापार का विस्तार करें। हमें लैटिन अमेरिका में भी नए सिरे से रुचि लेनी चाहिए, जहां कई क्षेत्रों में गहरी समानता है। जिसमें पारिवारिक व्यवसाय का महत्त्व और एक ऐसा विविध समाज शामिल है, जो पारिवारिक संबंधों को समान महत्त्व देता है।
जहां राज्य उन सभी देशों के साथ करीबी संबंध सुनिश्चित करने में नेतृत्व कर सकता है जो हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं, वहीं उद्योग को अपने विदेशी निवेश के साथ उस नेतृत्व के अनुरूप कार्य करना चाहिए। हमारी औद्योगिक महत्त्वाकांक्षा एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति बनाने की होनी चाहिए। हमारी अग्रणी कंपनियां यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्री अमेरिका और पश्चिम एशिया में एक साथ काम करने में सहज कैसे हों ? भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के श्रीलंका, इंडोनेशिया, ब्रिटेन, ओमान और मिस्र जैसे विविध देशों में गए प्रतिनिधिमंडलों को यह संदेश मिला है कि वहां भारतीय कंपनिओं की सक्रिय मांग है। हमें इस दिशा में आगे काम करना चाहिए।
वास्तव में हमारे लिए पूरी दुनिया है। चीन छोड़कर शेष एशिया हमारे जीडीपी का तीन गुना है। पश्चिम एशिया, तुर्किये और अफ्रीका मिलकर 5 लाख करोड़ डॉलर से अधिक जोड़ते हैं, और लैटिन अमेरिका 7 लाख करोड़ डॉलर से अधिक इन्हें जोड़ें तो हमारे पास अमेरिका या चीन से बड़ा बाजार है। यूरोपीय संघ इसे दोगुना कर देता है।
आज, हमारी आईटी सेवाएं, औषधि उद्योग, और वस्त्र एवं परिधान, वाहन कलपुर्जे और इंजीनियरिंग उद्योगों की कुछ कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्षम हैं। भारतीय उद्योग को उनका अनुसरण करना चाहिए। हमारी कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर हैं और उन्हें विविधता लाने की आवश्यकता है। पिछले वर्ष ट्रंप के शुल्क संबंधी कदमों ने इसे लेकर एक उपयोगी संकेत दिया है।
घरेलू मजबूती और अंतरराष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा का संयोजन भारत पर निर्भरता पैदा कर सकता है। सरकार की नीतियां और भारतीय उद्योग मिलकर काम करें तो भारत दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण बन सकता है और एक परस्पर निर्भर भविष्य प्रदान कर सकता है।
एक अच्छा समझौता
संपादकीय
लगभग दो महीने से ईरान में जारी तनाव के बाद विश्व स्तर पर एक खुशखबरी सामने आई है। भारत और न्यूजीलैंड ने ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर करके जैसी सकारात्मकता का संचार किया है, उसकी विश्व को बड़ी जरूरत है। हां, मोटे तौर पर यह समझौता बीते वर्ष दिसंबर में ही हो गया था, लेकिन विश्व में बिगड़े हालात की वजह से इसमें लगभग चार महीने का समय लग गया। जो समझौता हुआ है, उसके बीस पहलू या अध्याय हैं। इनमें सबसे ऐतिहासिक है व्यापार और निवेश। विश्व में एक समय केंद्रीकृत व्यापार व्यवस्था बनती दिख रही थी, लेकिन बीते चार वर्ष से ज्यादातर देश द्विपक्षीय समझौते को तरजीह दे रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन का जादू खत्म हो चुका है। आश्चर्य नहीं कि बीते चार वर्ष में भारत कम से कम सात व्यापार समझौते कर चुका है। न्यूजीलैंड एक छोटा, पर विकसित देश है और आज के दौर में एक-एक देश का महत्व है। हर व्यापारी या उत्पादक मुल्क दुनिया में अपने बाजार का विस्तार ऐसे ही कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित ही खुशी का इजहार करते हुए कहा है कि यह समझौता भारतीय किसानों, युवाओं, छात्रों, महिलाओं, कारीगरों, एमएसएमई और नवाचारियों को लाभ पहुंचाएगा।
इस समझौते से भारत का ही नहीं, न्यूजीलैंड का भी निर्यात बढ़ेगा। भारत से जो उत्पाद न्यूजीलैंड जाएंगे, उनमें से 95 प्रतिशत पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा। जाहिर है, इससे भारतीय व्यापारियों को सुविधा होगी। इसके अलावा, न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्ष में भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। भारतीय पेशेवरों को न्यूजीलैंड में काम के ज्यादा अवसर मिलेंगे। सबको पता है, न्यूजीलैंड से फलों का आयात होता है, एवोकाडो व ब्लूबेरी जैसे फलों की भारत में मांग तेजी से बढ़ रही है। इस समझौते में खास यह भी है कि दोनों देशों के बीच कृषि सहयोग समझौता हुआ है। मतलब, भारतीय किसानों को कीवी, सेब की खेती और शहद उत्पादन में न्यूजीलैंड से सहायता मिलेगी। चूंकि भारत में जलवायु की विविधता है, तो फल उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत बहुत कुछ कर सकता है। ऐसे कृषि समझौते भारत को यूरोपीय संघ या यूरोपीय देशों के साथ भी करने चाहिए। भारत फल उत्पादन के मामले में केवल चीन से पीछे है और आम, केला और पपीता उत्पादन में अव्वल है। चूंकि भारत में खुद की खपत बहुत ज्यादा है, इसलिए निर्यात के लिए गुणवत्तापूर्ण उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। इस संदर्भ में न्यूजीलैंड में खेतों की कमी है, पर भारत में ऐसी कोई कमी नहीं है। भारत को ऐसे नए अवसर का फायदा जरूर उठाना चाहिए।
भारत-न्यूजीलैंड व्यापार समझौते को पूरी गंभीरता से लेना चाहिए। ध्यान रहे, भारत अपने व्यापार या निर्यात के घड़े को बूंद-बूंद से भर सकता है। उसे केवल अमेरिका पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। यह अफसोस की बात है, अमेरिका युद्ध में अपना वक्त बर्बाद कर रहा है और इस वजह से भारत के साथ उसके व्यापार समझौते में बेवजह देरी हो रही है। यह देरी भी भारत को अपने लिए नए देश-नए बाजार खोजने पर मजबूर कर रही है। देश की जरूरतों के हिसाब से भारतीय निर्यात का बढ़ते जाना जरूरी है, ताकि उत्पादन की रफ्तार में कमी न आए। भारतीय निर्यात को बढ़ाने के लिए भारत सरकार को उद्योग जगत के साथ मिलकर काम को और तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए। यहां असीम क्षमता है और क्षमता संवर्द्धन की संभावना भी।