नक्सल मुक्त हुए क्षेत्रों के लिए अवसर हों
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30 मार्च को गृहमंत्री ने लोकसभा में घोषणा की थी कि भारत अब नक्सल आतंक से मुक्त हो चुका है। इसके लिए उन्हें तीन साल का समय लगा। इस बीच बड़े अर्द्ध सैनिक ऑपरेशन किए गए। उन्होंने बिना किसी समझौते वाली सैन्य रणनीति को अपनाते हुए हथियार डालने वालों के लिए बातचीत और पुनर्वास, तथा मना करने वालों पर कोई रहम नहीं की।
उनकी इस रणनीति ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अकादमिक सोच को कुचल दिया। ऐसा करने के लिए उन्होंने आतंकवाद विरोधी कानूनों की सीमाओं को भी तोड़ दिया, और कानूनी प्रक्रिया को बिगाड़ दिया। मुद्दे की बात यह है कि इसकी भरपाई के लिए सरकार को स्थानीय जनता को आगे बढ़ाने में अब कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए –
- गृहमंत्री ने कहा है कि हर गांव में स्कूल और सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में रहने वालों को आधार, और राशन कार्ड देने का अभियान पहले ही शुरु हो चुका है।
- एक स्थिर और शांतिपूर्ण समाज के लिए सबको साथ लेकर चलने वाला विकास जरूरी है। वामपंथी आतंकवाद की हार से अब क्रोनी पूंजीवाद को वहाँ जड़ जमाने की छूट नहीं दी जानी चाहिए।
- क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को नियंत्रित किया जाना चाहिए।
- आदिवासियों के अधिकारों का सही मायने में विस्तार होना चाहिए। उन्हें संसदीय लोकतंत्र में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित- 02/04/2026