माओवादी उग्रवाद कैसे हारा
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सरकार ने देश के 200 जिलों को प्रभावित करने वाले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए 31 मार्च तक की समय सीमा तय की थी। इस तिथि तक इसे खत्म कर भी दिया। इसके खत्म होने का महत्व किसी समय-सीमा में नहीं, बल्कि सरकार की रणनीतिक ताकत, शासन और संघर्ष के बदलते स्वरूप के बारे में ज्यादा है। कुछ बिन्दु –
- नक्सलवाद उन क्षेत्रों में ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से पनपा, जहाँ सरकार की पहुँच कम थी, आदिवासी अलगाव और आर्थिक अनदेखी थी। समय-समय पर सरकारें सख्त कार्रवाई, और विकास के रास्ते से इसे सुलझाने का प्रयास करने में नाकाम रही थीं।
- पिछले एक दशक में सरकार के लगातार प्रयासों से 2025 में इनसे प्रभावित जिलों की संख्या केवल 11 रह गई थी। कई स्तरों पर चलने वाली रणनीति में चुनाव कराए गए। उन गांवों तक भी वोटिंग हुई, जिन्हें कभी पहुंच के बाहर माना जाता था। साप्ताहिक बाजार खोले गए। सड़क-संपर्क बेहतर हुआ।
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- बदलाव का एक बड़ा कारण माओवादी नेतृत्व और केडर बेस पर लगातार दबाव रहा। गिरफ्तारियों, समर्पण और लक्षित ऑपरेशन ने इनके संगठित ढांचे पर लगातार प्रहार किया है। शीर्ष नेताओं के मारे जाने और आत्म-समर्पण में इनकी गतिविधियों की गति में रुकावट आती गई। भर्ती मुश्किल हो गई, संचार माध्यम बिखर गए, और पूरा नेटवर्क टूटता गया।
- इसके अलावा विकास की पहल ने बड़ी भूमिका निभाई है। सड़के, दूर-संचार माध्यम, बैंकिंग सुविधा, आदिवासी कल्याण तथा कौशल विकास से उग्रवाद की जड़ों को उखाड़ा गया है।
- यह कोई छोटी कामयाबी नहीं है। केन्द्र की नीति में लगातार बदलाव, राज्यों के साथ तालमेल और समय के साथ रणनीति को बदलने की इच्छा से यह संभव हुआ है।
इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी सीख यह है कि असमानता और बहिष्कार में जड़ जमाए हुए झगड़ों को सिर्फ ताकत से नहीं सुलझाया जा सकता है। उन्हें सरकार और उसके सबसे पिछड़े नागरिकों के बीच के रिश्ते को संवारने से भी सुलझाया जा सकता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संजय कुमार झा के लेख पर आधारित – 31/03/26