गिरता संघवाद

Afeias
04 May 2026
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हर चुनावी मौसम का एक ऐसा मुहावरा है, जो बड़ा लुभावना लगता है, वह है- ‘डबल-इंजन सरकार’। सुनने पर ही समझ में आ जाता है कि दो सरकारें विकास को गति देने के लिए मिलकर काम कर रही हैं। वास्‍तव में, इस कहावत के पीछे भारत के संघवाद के बारे में एक गंभीर संवैधानिक सवाल छिपा हुआ है।

समान दल का लाभ –

चुनाव प्रचार के दौरान यह संदेश साफ-साफ दिया जाता है कि केन्‍द्र में शासन करने वाली पार्टी को ही राज्‍य मतदाता चुनें, ताकि राज्‍य को तेज विकास का लाभ मिल सके। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं, तो राज्‍य को निधि मिलनेमें सकट का सामना करना पड़ सकता है।

भारत का संविधान ऐसे तंत्र की कल्‍पना नहीं करता है, जहाँ राज्‍य सरकारें केन्‍द्र में शासन करने वाली पार्टी के हित या दया पर निर्भर हों। हमारा लोकतंत्र संघवाद पर आधारित है, जिसमें केन्‍द्र और राज्‍य अपने-अपने क्षेत्रों में एक-दूसरे के सहायक बनते हैं। केन्‍द्र सरकार को पूरे देश की जनता का प्रतिनिधि माना जाता है, न कि केवल उन राज्‍यों का, जहाँ उनकी पार्टी का शासन है। दूसरे, राष्ट्रीय करों से जमा धन भारत संघ का है, किसी सत्ताधारी दल का नहीं। अत: इन संसाधनों का बंटवारा इस पर निर्भर नहीं करता कि राज्‍य पर किस पार्टी का राज है।

वित्त आयोग और राजकोषीय संघवाद –

 अनुच्‍छेद 280 के तहत, हर पाँच साल में वित्त आयोग नियुक्‍त किया जाता है। संविधान में इसका गठन इसलिए ही किया गया है कि संघीय राजस्‍व को राज्‍यों के साथ सही तरीके से साझा किया जा सके। हाल के कुछ वर्षों में राजकोषीय संघवाद से जुड़े कई विवाद सामने आते रहे हैं।

दक्षिणी राज्‍यों ने अपनी जनसंख्‍या वृद्धि पर अच्‍छा नियंत्रण किया है। लेकिन केन्‍द्रीय निधि के आवंटन में अगर जनसंख्‍या डेटा का उपयोग किया जाता है, तो यह नियंत्रण उनके लिए सज़ा बन सकता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलगांना की सरकारों ने तर्क दिया है कि उन्‍हें इस स्थिति से निकालने में वित्त आयोग को निष्‍पक्षता दिखानी चाहिए।

विधायी मामलों में भी टकराव –

हाल के कुछ वर्षों में, राज्‍यों में पदस्‍थ राज्‍यपाल प्रतिनिधि सरकार के विधेयकों को स्‍वीकृति देने से पहले लंबे समय तक रखे रहते हैं। देरी उन राज्‍यों में हुई, जहाँ विपक्षी दलों की सरकारें हैं। ऐसी देरी पर उच्‍चतम न्‍यायालय ने भी स्‍पष्‍ट कहा है कि यह संवैधानिक रूप से गलत है।

एक साथ देखें तो, वित्तीय या राजकोषीय ट्रांसफर, गवर्नरों की मनमानी और दिल्‍ली में उप राज्‍यपाल का प्रतिनिधि सरकार के लिए गतिरोध पैदा करने का मामला ऐसा रहा है, जो बताता है कि जब राजनैतिक तालमेल नहीं होता या डबल-इंजन की सरकार नहीं होती है, तो संघवाद की भावना को कैसे खोखला कर दिया जाता है।

संरचनात्‍मक बदलाव की जरूरत –

  • वित्त आयोग की सिफारिशों को और ज्‍यादा जरूरी बनाया जा सकता है।
  • राज्‍यपालों को विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए एक तय कानूनी समय सीमा तय की जा सकती है।
  • संघवाद की रक्षा के लिए अंतरराज्‍यीय परिषद का प्रावधान है। संविधान के अनुच्‍छेद 263 में इसे संवैधानिक निकाय के रूप में स्‍थापित किया गया है। इसका उद्देश्‍य केन्‍द्र-राज्‍य समन्‍वय को मजबूत करना है। इसे सक्रिय किया जा सकता है।

विकास राजनैतिक समरसता पर निर्भर नहीं हो सकता है। यह उन नियमों और संस्‍थाओं पर टिका होना चाहिए, जो, हर राज्‍य और हर नागरिक के साथ बराबरी का व्‍यवहार कर सके।

द हिन्‍दूमें प्रकाशित एस.वाई.कुरैशी के लेख पर आधारित- 23/03/2026