लैंगिक असमानता को कम करना जरूरी

Afeias
29 Apr 2026
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महिला आरक्षण की जोरदार चर्चा के बीच इस तथ्‍य पर भी ध्‍यान जाता है कि हमारे कार्यबल और अन्‍य गतिविधियों में महिलाओं की वास्‍तविक भागीदारी कितनी है। क्‍या वे पुरुषों के समान रैंक पाकर समान वेतन पा सकी हैं?

हाल ही में मुंबई की म्‍यूनिसिपल की प्रमुख एक महिला बनी हैं। लैंगिक समानता की दिशा में यह एक बड़ा कदम है। लेकिन मूल प्रश्न अभी भी ज्‍यो-के-त्‍यों खड़े हैं। कुछ बिन्‍दु –

  • अभी भी हमारे कार्यबल की उम्र वाली केवल 32% महिलाएं ही सक्रियता से काम कर रही हैं। इनमें से भी 80% ‘कमजोर’ यानि अनौपचारिक, कम गुणवत्ता वाले और सामान्‍य वेतन वाले काम कर रही हैं।
  • केवल 15% महिलाएं नियमित वेतन वाली नौकरियां करती हैं। जबकि उच्‍च शिक्षा में पंजीकृत महिलाओं का औसत पुरुषों के लगभग समान है।
  • इन 15% महिलाओं के लिए भी वर्क लाइफ डावांडोल रहती है। हर क्षेत्र में इनके करियर की प्रगति धीमी रहती है।
  • प्राइवेट सेक्‍टर में, पुरुषों के समान योग्‍यता वाली नई महिला नियुक्ति को कम वेतन दिया जाता है। वरिष्‍ठ पदों पर वेतन की असमानता और अधिक बढ़ जाती है।
  • अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की महिलाएं, पुरुषों की तुलना में औसतन 27% कम कमाती हैं। इसके कारण भिन्‍न-भिन्‍न हैं।
  • इस असमानता को ठीक करने के लिए अब सभी बड़ी कंपनियों में कम-से-कम एक महिला डायरेक्‍टर रखने की बाध्‍यता है। भले ही अनुपालन के लिए हो, लेकिन यह एक अच्‍छा कदम है।
  • अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष का लंबे समय से मानना रहा है कि महिलाओं को कार्यबल में लाने से बहुत लाभ हो सकते हैं। महिलाओं का कौशल उत्‍पादकता बढ़ाता है, जिससे सभी की प्रगति होती है।

कुल मिलाकर यह ‘महिलाओं का मुद्दा’ नहीं, अपितु सकल घरेलू उत्‍पाद का भी है। अत: इसे देशहित में देखा जाना चाहिए।

‘द टाइम्‍स ऑफ इंडियामें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-02/04/2026