खतरनाक ढ़ंग से विभाजित होती दुनिया

Afeias
25 Apr 2026
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वर्तमान में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्धविराम जारी है, जिसमें पाकिस्‍तान को पहले मध्‍यस्‍थ फिर संदेशवाहक बताया गया। पाकिस्‍तान सुन्‍नी बहुत क्षेत्र है, जबकि ईरान शिया बहुल। फिर भी वे मुस्लिम के रूप में स्‍वयं के हितों को परस्‍पर जुड़ा हुआ मानते हैं। इसीलिए अब मुस्लिम जगत स्‍वयं को शिया या सुन्‍नी नहीं, बल्कि व्‍यापक रूप से मुस्लिम के रूप में ही देखना चाहता है।

सैमुअल पी. हंटिंगटन की पुस्‍तक ‘क्‍लैश ऑफ सिविलाइजेशन’ से –

  • सोवियन संघ के विघटन के बाद विश्‍व एकध्रुवीय हो गया है। आने वाले समय में संघर्ष राष्‍ट्रों के बीच नहीं, सभ्‍यताओं के बीच होगा। महाशक्तियों के बीच की प्रतिस्‍पर्धा सभ्‍यताओं के टकराव के रूप में प्रकट होगी।
  • यह संघर्ष विश्‍व शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह संघर्ष एक देश तक सीमित नहीं रहेगा, व्‍यापक स्‍तर पर फैल सकता है।
  • आज लोग आधुनिक पहचान के साथ-साथ अपनी पारंपरिक पहचान को भी पुन: खोज रहे हैं। इसी कारण वे नई परिस्थितियों के साथ-साथ पुराने द्वंदों को भी बनाए हुए हैं और भूलने के लिए तैयार नहीं हैं।
  • भविष्‍य का संघर्ष केवल आर्थिक असमानताओं के बीच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सभ्‍यताओं के बीच अधिक तीव्र रूप से सामने आएगा। यह इतिहास का एक अत्‍यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण दौर हो सकता है। 

विभाजित दुनिया कैसी है?

हटिंगटन सभ्‍यताओं को पश्चिमी, दक्षिण अमेरिकी, इस्‍लामिक, सिनिक, हिन्‍दु, ऑर्थोडाक्‍स, बौद्ध और जापानी के रूप में देखते हैं। वहीं हेनरी किसिंजर अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, रूस और संभवत: भारत के रूप में 6 बड़ी शक्तियाँ देखते हैं।

  • चीन, वियतनाम और जापान में बौद्ध धर्म का प्रभुत्‍व है और इन सभ्‍यताओं ने स्‍वंय को आर्थिक आधार पर आधुनिक बनाया है।
  • इस्‍लामिक विश्‍व अपनी पहचान सांस्‍कृतिक व पांथिक आधार पर अधिक सुदृढ़ करता है। ये पश्चिमी मूल्‍यों के प्रति नकारात्‍मक दृष्टिकोण रखते हैं। जबकि पश्चिमी तकनीकों का भी प्रयोग करते हैं।
  • पश्चिमी देशों में पंथ के प्रति अब पहले जैसा दृष्टिकोण नहीं दिखता। लोग बड़ी संख्‍या में चर्च जाते हैं। इसीलिए पंथ और राजनीति को पूरी तरह अलग रखना ज्‍यादा प्रभावी नहीं है।
  • फ्रांसीसी क्रांति के मूल्‍य स्‍वतंत्रता, समानता व बंधुत्‍व आज चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं। अब हर राष्‍ट्र स्‍वयं को व अपनी सांस्‍कृतिक पहचान को बेहतर सिद्ध करना चाहता है।
  • जैसे नाटो में तुर्किये को छोड़कर ईसाई बहुल देश हैं। उसी तरह अब मुस्लिम जगत में अपने गठनबंधन की बात होने लगी है, जहाँ पर एक पर आक्रमण दूसरे पर भी माना जाएगा।

यदि दुनिया में इन विभाजन के सैन्‍य व राजनीतिक मोर्चे भी खुल जाएंगे, तो विश्‍व मज‍हब, भाषा, क्षेत्रीय अस्मिता या सीमा के नाम पर हमेशा उलझा रहेगा। हमें पंथ या सभ्‍यता की श्रेष्‍ठता का दावा छोड़कर भोजन, आजीविका व आर्थिक स्थिरता की ओर ध्‍यान देना चाहिए। समृद्ध देश संसाधन-विहीन देशों की मदद करें अन्‍यथा वैश्विक असमानताएँ और संघर्ष मानवता के भविय को अनिचित बना सकते हैं।

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