भारत की फैक्ट्रियाँ इतनी खतरनाक क्‍यों?

Afeias
19 May 2026
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हाल ही में देश की फैक्ट्रियों में सुरक्षा की अनदेखी के कारण लगातार हादसे हुए हैं। यहाँ बात सिर्फ पटाखा ईकाई की नहीं है। वेदांता के बॉयलर में भी धमाका हुआ है। ऐसा लगता है कि हादसों के प्रति हम बेपरवाह हो गए हैं। बसों में आग लगने से हर साल सैकड़ों लोग मारे जाते हैं, और सड़क हादसों में हर साल 1.8 लाख लोग मरते हैं। राजधानी तो कुछ सबसे खतरनाक फैक्‍ट्री हादसों की जगह रही है। हमने खतरों को सामान्‍य मान लिया है। जब कोरिया में, लिथियम बैटरी बनाने वाली कंपनी एरिसेल में धमाके में 23 मजदूर मारे गए थे, और सीईओ को चार साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।

हमारे यहाँ होने वाली दुर्घटनाओं को देखते हुए दो बातें साफ लगती हैं। पहली, हमारी नजर में जिंदगी सस्ती है। यही कारण है कि हम फैक्ट्रियों में कई निकास नहीं रखते। इलेक्ट्रिकल सिस्‍टम ओवरलोडेड और खराब देखरेख वाले बॉयलर रखते हैं। दूसरी, हमारा सतर्कता ढांचा लचर है। 2020 में, दिल्‍ली में हर 973 फैक्ट्रियों पर सिर्फ एक इंस्‍पेक्‍टर था। देश में खासतौर पर ऑटोमोटिव उद्योग हादसों के लिए बदनाम हैं। 2012 से 2020 तक के डेटा में निरीक्षण में भारी कमी बताई गई है।

बड़ी समस्‍या यहाँ है –

2017 के एक अध्‍ययन में दावा किया गया था कि भारत में हर साल काम से जुड़ी 48,000 मौतें होती हैं। सरकार इससे सहमत नहीं थी। उसका अपना डेटा औसतन 1,109 मौतें दिखाता है। लेकिन ये केवल पंजीकृत फैक्ट्रियों में होती हैं। समस्‍या यह है कि 90% भारतीय श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं। उनको तो सरकार गिनती ही नहीं। इससे भी ज्‍यादा यह कि औपचारिक क्षेत्र में होने वाले अधिकांश हादसे रिपोर्ट नहीं किए जाते हैं। इन्‍हें आपसी समझौते पर निपटा दिया जाता हे। यही कारण है कि अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन भारत को श्रमिकों के लिए खतरनाक देश कहता है। इस छवि में सुधार का समय आ गया है। आने वाले वर्षों में बेहतर स्थिति की उम्‍मीद की जानी चाहिए।

(‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ – 23/04/2026)