भारत में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव
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- पिछले 25 वर्षों में भारत में बहुत तेजी से प्रजनन दर में बदलाव हुआ है।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के डेटा से पता चलता है कि कुल प्रजनन दर; जो 1990 के दशक में प्रति महिला लगभग चार बच्चों की थी, अब गिरकर प्रतिस्थापन स्तर पर आ गई है। अधिकांश राज्यों में यह प्रति महिला 2.1 बच्चे या उससे कम है।
- राज्यों को उनके कुल प्रजनन दर के आधार पर तीन टियर में बांटा जा सकता है- कम, मध्यम और अधिक।
- सर्वेक्षण एक और दो में, केंद्रीय, उत्तर और पूर्वोत्तर राज्यों की तुलना में दक्षिणी राज्यों में प्रजनन दर कम थी।
- सर्वेक्षण – 3 मे अन्य राज्यों में भी कम प्रजनन दर मिलती है।
- पांचों सर्वेक्षण में पूर्वोत्तर राज्यों (त्रिपुरा को छोड़कर) उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में प्रजनन में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई है।
- जिन राज्यों में शुरू में ही प्रजनन दर काफी कम थी, उनमें कर्नाटक, प.बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और ओडिशा में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई है।
बड़े बदलाव के कारण –
- महिलाओं में बढ़ती शिक्षा।
- शिक्षा या अन्य कारणों से देर से शादी।
- शिक्षा के कार्यबल में स्थान मिलने से बच्चों की संख्या मे गिरावट।
- प्रवास, शहरीकरण और मीडिया के प्रसार के जरिए परिवार के आकार के नए नियमों का प्रचार होना।
- कई दशकों से चलने वाला परिवार नियोजन कार्यक्रम।
- स्वास्थ्य सेवा की सफलता। शिशु मृत्यु दर के कम होने से प्रजनन दर में गिरावट हो सकती है।
- बच्चों को पालने का बढ़ता खर्च।
अनेक नतीजे –
- प्रजनन दर का सीधा संबंध जनसांख्यिकीय लाभांश से है। इसमें युवा आबादी का अधिक अनुपात विकास की गति को तेज कर देता है। लेकिन श्रम प्रधान उद्योगों और सार्वजनिक निवेश के बिना कुछ लाभ नहीं हो सकता है।
- प्रजनन दर राजनैतिक अर्थव्यवस्था से भी जु़ड़ी हुई है। दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में पहले से गिरी प्रजनन दर के कारण बुजुर्ग जनसंख्या बढ़ रही है। इस पैटर्न से प्रवास, राजकोषीय स्थानांतरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलाव आ रहे हैं।
- दशकों तक, जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम महत्वपूर्ण रहे हैं। लेकिन अब कम प्रजनन दर वाले समाज के लिए एक संस्थागत नींव बनाना अधिक महत्वपूर्ण हो चुका है। इसमें बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, पेंशन सुविधा, पुरानी बीमारियों पर ध्यान देने वाला स्वास्थ्य विभाग, लगातार प्रवास और घरेलू बदलाव को संभालने वाला शहरी बुनियादी ढांचा भी शामिल है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित भार्गव बी.एस और अर्जुन जयदेव के लेख पर आधारित। 05 मार्च 2026