रोजगार के प्रति समाज का नजरिया बदलने की जरूरत
To Download Click Here.

अजीज प्रेमजी यूनिवतर्सिटी की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026, बताती है कि भारत अपनी 40 साल पुरानी बेरोजगारी की समस्या को कैसे ठीक कर सकता है। संरचनात्मक बदलावों के अलावा, रिपोर्ट में इस बारे में ‘समाज के नजरिए में बदलाव‘ की जरूरत पर बात की गई है। कहा गया है कि समाज को ‘ज्ञान‘ और ‘गरिमापूर्ण काम‘ की परिभाषा पर फिर से विचार करना चाहिए। फिलहाल हमारे देश में जाति, वर्ग और औपनिवेशिक विरासत आज भी बताती है कि कौन सा काम सम्मानजनक है।
देश में आज भी अधिकतर युवा शारीरिक मेहनत की तुलना में मानसिक मेहनत को ज्यादा अच्छा और उच्च स्तरीय मानते हैं। परिवार और समाज से स्वीकृत काम पाने के लिए स्टेटस या सामाजिक स्तर सबसे जरूरी होता है। यही कारण है कि देश में बेरोजगारी इतनी ज्यादा है।
- 2023 में 20-29 वर्ष के सिर्फ 6.7% युवा स्नातक के पास स्थायी वैतनिक नौकरी थी। लगभग 40 प्रतिशत बेरोजगार थे। सेल्फ एम्प्लॉयड या अंडरएम्प्लॉयड होने के लिए तैयार युवाओं में इन आधे से भी कम लोगों के पास काम था।
- भारत की 36.7 करोड़ कामकाजी वर्ग की जनसंख्या है। 15-29 वर्ष की उम्र की यह जनसंख्या अमेरिका की कुल आबादी से भी दो करोड़ ज्यादा है। यदि स्कूल और कॉलेज वालों को छोड़ दें, तो कार्यबल में 26.3 करोड़ लोग हैं।
- रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि 2036 तक, 20-24 उम्र के समूह में, नौकरी पाने लायक स्नातक पुरूष 38 प्रतिशत होंगे, जबकि 2023 में ये 26 प्रतिशत थे। 25-29 वर्ष के पुरूषों में यही 30 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत होने का अनुमान है।
रिपोर्ट कहती है कि कौशल विकास, व्यावसायिक और पेशेवर तकनीकी प्रशिक्षण को आसान पहुँच वाला बनाना होगा। प्रशिक्षित वर्ग को रोजगार पर लगाने के लिए औपचारिक क्षेत्र का विस्तार करना होगा। सबसे जरूरी है कि रोजगार की दुनिया को जाति और वर्ग से अलग करना होगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 मार्च 2026