‘आशा’ व आंगनबाड़ी कर्मियों का प्रदर्शन
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पश्चिम बंगाल में ‘आशा’ और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे हैं। वे अपना वेतन पंद्रह हजार रुपये करने की मांग कर रहे हैं। आखिर इन कर्मियों का समाज और शासन में क्या महत्व है? इन्हें इनके काम के अनुसार उचित वेतन दिया जा रहा है या नहीं –
- इंदिरा गांधी की सरकार ने इनमें से कई कर्मियों को इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम के तहत ‘कर्मी‘ का दर्जा देने से मना कर दिया था।
- सामाजिक काम का बोझ बढ़ने से साथ ही इन्हें ‘स्कीम वर्कर्स‘ मानकर सामाजिक योजनाओं को आगे बढ़ाया गया, लेकिन इन्हें स्थायी सरकारी नौकरी नहीं दी गई।
- 1996 में कर्नाटक राज्य बनाम अमीर बी मामले में इन्हें सरकारी कर्मचारी मानने से मना कर दिया गया था।
- 2015 में एनडीए सरकार ने चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम का बजट ही कम कर दिया। इससे इन कर्मियों की राहत की रही सही उम्मीद भी चली गयी।
- इतना ही नहीं, 2018 में केंद्र ने इन कर्मियों के वेतन में अपनी भागीदारी को ही समाप्त कर दिया। समृद्ध राज्य इन्हें अच्छा मानदेय दे सके, लेकिन अन्य राज्यों में इनकी हालत खराब होती रही है।
- बहुत सी केंद्रीय और राज्य-स्तरीय कल्याणकारी योजनाओं को चलाने में ये कर्मी आगे रहते हैं। कोविड के दौरान भी आशा कर्मियों के सहयोग को जगह-जगह सराहा गया था। इसे देखते हुए केंद्र को चाहिए कि सोशल सिक्योरिटी कोड या सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत कानूनी तौर पर इन्हें वर्गीकृत करे और न्यूनतम वेतन व पेंशन कवरेज की गारंटी दे।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24 जनवरी, 2026