25-10-2025 (Important News Clippings)

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25 Oct 2025
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Date: 25-10-25

Litter bugs

How about fining those who throw junk in public places?

TOI Editorials

It can look like garbage and act like garbage but litter is something different – garbage placed where it shouldn’t be. As popular as this activity is among us Indians we were aghast to learn that a lady walking about outer London was fined £150 for it. All she had done was pour the last of her coffee down a drain. She hadn’t even thrown her mug in. It was reusable. Nearer us, in Singapore littering fines can go up to S$2,000 – and to S$10,000 beyond the third conviction. If our govts went about fining litterers so liberally, the collection could put GST revenues to shame.

Why are Indians so fond of littering? We see a choking river, we worsen its misery. We see a pristine one, we introduce it to plastic bags, paper napkins, rubber chappals. Sometimes we throw the half-eaten burger right next to a wastebin. My one chewing gum wrapper won’t make a difference, our demon self whispers. Except it’s joined by a hundred, thousand, million others, and it makes all the difference.

We loooove to holiday in Japan but guess what helps make it so holidayable? People carry their trash home rather than spray it about. We cleaned our homes thoroughly on Diwali but spread its detritus across our parks and streets. Cleaning all that is someone else’s job, we think. But if we want to live in a clean society, we too have to stop doing the dirty.


Date: 25-10-25

अमेरिका – रूस टकराव में भारत को हो रहा नुकसान

संपादकीय

ट्रम्प ने भारत को सस्ती दरों पर तेल सप्लाई करने वाली रूस की दो प्रमुख कंपनियों पर उस समय प्रतिबंध लगाया है, जब भारतीय दल अमेरिका में ट्रेड डील करने बैठा है। इस कदम का मतलब है कि या तो भारत रूस से तेल लेना बंद करे या 50% टैरिफ झेले। भारत ने भी रूस से तेल खरीद कम करने का मन बना लिया है। भारत चाहेगा कि ट्रम्प सरकार न केवल सजा के रूप में अगस्त में थोपे गए 25% सेकंडरी टैरिफ को खत्म करे बल्कि 25% सामान्य टैरिफ को भी 17% से कम करे। फिलहाल इसमें देरी से 12 करोड़ रोजगार देने वाले एमएसएमई सेक्टर्स पर असर पड़ने लगा है। तस्वीर का दूसरा पहलू है कि चूंकि भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है, इसलिए अगर रूस की जगह अन्य वैश्विक बाजार से लेगा तो उसे करीब 45 अरब डॉलर का नुकसान होगा। वैसे तो भारत ने पहले भी अमेरिकी नीति के अनुपालन में अपनी वाणिज्यिक स्वयत्तता छोड़ी है। ईरान पर यूएस प्रतिबंध के कारण भारत ने उससे तेल खरीदना बंद कर दिया था। वेनेजुएला से तेल की खरीद रोकने का भी यही कारण था । लेकिन रूस से भारत के संबंध अलग रहे हैं। वह पिछले कई दशकों से गाढ़े वक्त का दोस्त साबित हुआ है। रूस भी भारत की मजबूरी समझ रहा है, हालांकि उसने कहा है कि कोई भी राष्ट्र अपनी आत्म- गौरव की कीमत पर फैसले नहीं ले सकता।


Date: 25-10-25

देश की नियामकीय व्यवस्था में खामियां

एम एस साहू और सुमित अग्रवाल, (लेखक वकील हैं जिनका नियामक निकायों में कार्य करने का अनुभव है)

देश में शक्तियों के बंटवारे की बहस पारंपरिक रूप से संवैधानिक ढांचे के भीतर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर केंद्रित रहती है। बहरहाल आज कहीं अधिक बड़ी चुनौती इस शास्त्रीय त्रयी से इतर नियामकीय संस्थाओं में निहित है। नियामक अपने-अपने क्षेत्र में छोटे स्वयंभू राज्यों की तरह काम करते हैं और इस दौरान वे एक साथ अर्द्ध-विधायी, कार्यकारी और अर्द्ध न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं।

व्यवहार में अक्सर इसका अर्थ यह होता है कि एक नियामकीय एजेंसी के अंतर्गत एक ही व्यक्ति या शाखा कई भूमिकाएं निभा सकते हैं। उदाहरण के लिए कानून निर्माता, जांचकर्ता और निर्णयकर्ता की भूमिका। इन कामों की प्रक्रियागत सीमा बहुत धुंधली होती है। क्लैरिएंट इंटरनैशनल लिमिटेड ऐंड एएनआर बनाम सेबी (2004 ) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि नियामक न केवल नियमन तय करता है बल्कि वह उन्हें लागू भी करता है और उनके उल्लंघन पर फैसले भी देता है। उसने चेतावनी दी कि इन शक्तियों को एक ही संस्था में शामिल करना भविष्य में सार्वजनिक विधि से संबंधित कई चुनौतियां पैदा कर सकता है।

अब इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कार्यकारी और अर्द्ध न्यायिक कामों को अलग-अलग किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तथ्य स्थापित करने वाले लोगों को दंड देने के अधिकारी लोगों से अलग किया जा सके। विशाल तिवारी बनाम भारत संघ (2024) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को निर्देश दिया कि अर्द्ध न्यायिक और कार्यकारी शाखाओं में अंतर रखा जाए। प्रतिस्पर्धा कानून में एक तुलनात्मक संस्थागत डिजाइन मौजूद है जहां महानिदेशक कार्यालय (जांच) , भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से अलग स्वतंत्र रूप से काम करता है। कई नियामक यह परंपरा अपनाते हैं कि किसी एक पूर्णकालिक सदस्य के अधिकार क्षेत्र से उत्पन्न मामलों का निर्णय किसी अन्य सदस्य द्वारा किया जाता है।

इसके बावजूद अक्सर व्यवहार में यह पृथक्करण नाकाम हो जाता है। कंपनी कानून के तहत राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एनएफआरए) को अपनी कार्यप्रणाली को अलग-अलग विभागों में संगठित करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, ऑडिट गुणवत्ता समीक्षा को अनुशासनात्मक कार्यों से अलग न करने के कारण, दिल्ली उच्च न्यायालय ने डेलॉयट हस्किंस बनाम भारत संघ (2025) मामले में एनएफआरए द्वारा जारी कई कारण बताओ नोटिस और अंतिम आदेशों को रद्द कर दिया। इस निर्णय के विरुद्ध अपील स्वीकार करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने एनएफआरए को अंतिम आदेश जारी करने या उन्हें लागू करने से रोक दिया है, जब तक कि मामले का निर्णय नहीं हो जाता।

अमेरिका में बात इसके उलट है। वहां प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग यानी एसईसी और संघीय व्यापार आयोग अपने-अपने जांच स्टाफ और निर्णय लेने वाले आयुक्तों के बीच कठोर विभाजन रखते हैं। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एसईसी बनाम जार्केसी (2024) मामले में इस सिद्धांत पर दोबारा बल दिया और कहा कि एसईसी अपने आंतरिक प्रशासनिक कानून न्यायाधीशों का उपयोग धोखाधड़ी के मामलों में दीवानी दंड लगाने के लिए नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करना संविधान द्वारा प्रदत्त जूरी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन होगा। जब दंड या जुर्माना दंडात्मक प्रकृति का होता है, तो उसका निर्णय न्यायालयों द्वारा ही किया जाना चाहिए।

अर्द्ध विधायी और अर्द्ध न्यायिक कामों का मिश्रण और दिक्कतदेह है क्योंकि इसमें कानून बनाने वाले और निर्णय करने वाले एक ही व्यक्ति होते हैं। यह वैसा ही है जैसे कि संसद कानून बनाए और उनके उल्लंघन के मामलों में निर्णय भी दे। एनएफआरए का अनुभव बताता है कि कैसे नियामक विधायिका द्वारा तय सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन में नाकाम हो सकते हैं। हर नियामक से यह उम्मीद करना सही नहीं है कि वह खुद ऐसे उपाय अपनाएगा।

भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) ने आरंभ में ऐसे विनियम बनाए थे जो एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करते थे: किसी जांच से जुड़े पूर्णकालिक सदस्य को उसके निर्णय में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी। बाद में इस प्रावधान में संशोधन कर इसे केवल ‘संलिप्तता’ तक सीमित कर दिया गया। यह तकनीकी बदलाव दिखने में मामूली लग सकता है, लेकिन इसके गंभीर प्रभाव हैं। इससे उन सदस्यों को, जिनका जांच से पर्यवेक्षण या संस्थागत संबंध रहा है, उन्हीं मामलों का निर्णय करने की अनुमति मिल जाती है जिनकी निगरानी उन्होंने की थी। अपने विधायी अधिकार के साथ, नियामक ने पक्षपात के विरुद्ध एक सुरक्षा को कमजोर किया; और अब अपने न्यायिक अधिकार में, वह उसी कमजोर नियम को लागू कर रहा है जिससे हितों के टकराव का जोखिम वास्तविक और तात्कालिक हो गया है।

संवैधानिक व्यवस्था में जुर्माने विधायिका तय करती है और न्यायपालिका उन्हें लागू करती है। 1990 के दशक के आरंभ तक यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि सरकार के बाहर की कोई संस्था जुर्माना लगा सकती है। हालांकि नियामकीय शासन के हित में, सेबी को ऐसे दंड लगाने का अधिकार दिया गया, लेकिन यह कुछ सख्त शर्तों के अधीन था। कानून में उल्लंघनों और उनसे संबंधित दंडों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया था। सेबी केवल केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के तहत ही ये दंड लगा सकता था, और लगाए गए जुर्माने की राशि भारत की संचित निधि में जमा की जानी थी। यह दृष्टिकोण अन्य नियामकीय कानूनों में भी अपनाया गया है।

समय के साथ, उल्लंघनों और प्रतिबंधों की सूची सहायक कानूनों और अधीनस्थ निर्देशों के माध्यम से लगातार विस्तृत होती गई है। उदाहरण के लिए, सेबी अधिनियम किसी भी विनियम के प्रावधान के उल्लंघन को दंडनीय बनाता है, जिससे नियामक को नियम बनाकर नए उल्लंघन तय करने का अधिकार मिल जाता है। कुछ मामलों में, स्वयं विनियमों में अनुपालन न करने पर दंड निर्धारित किए गए हैं। उदाहरण के लिए, सेबी (स्टॉक ब्रोकर्स) विनियम, 1992 में ब्रोकर्स द्वारा की गई विभिन्न चूकों के लिए जुर्माने की एक विस्तृत श्रृंखला निर्धारित की गई है। इसी तरह का रुझान अन्य नियामकीय क्षेत्रों जैसे बीमा, पेंशन और दूरसंचार आदि में भी देखा जा सकता है।

यहां तक कि परिपत्रों ने भी समय के साथ उल्लंघनों की सूची को लगातार विस्तारित किया है। उदाहरण के लिए, 2020 में सेबी द्वारा जारी एक परिपत्र ने सेबी (सूचीबद्धता दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकताएं) विनियम, 2015 के तहत 28 विशिष्ट उल्लंघनों को सूचीबद्ध किया और उनके लिए जुर्माने निर्धारित किए, जिन्हें स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा लगाया जाना था और निवेशक संरक्षण कोष में जमा किया जाना था। नियामक की स्वीकृति से जारी हालिया स्टॉक एक्सचेंज परिपत्र ने ब्रोकर्स के लिए दंड ढांचे को तर्कसंगत बनाते हुए 12 नए जुर्माना प्रावधान जोड़े। इसका प्रभाव यह है कि नियामक स्वयं ही उल्लंघन की परिभाषा तय करता है और स्वयं या अपने प्रतिनिधियों को दंड लगाने का अधिकार भी देता है, जो विधायी और न्यायिक कार्यों के मिश्रण के खतरे को उजागर करता है।

भारत का नियामकीय परिदृश्य नए मोर्चों पर विस्तारित हो रहा है जैसे फिनटेक, डेटा संरक्षण, जलवायु प्रशासन आदि। ऐसे में नियामकों को सीमित शक्तियां देने की प्रवृत्ति बढ़ती जाएगी। नियामकों को अधिकार संपन्न बनाने में कुछ भी गलत नहीं है। आधुनिक बाजार मजबूत, प्रतिक्रियाशील संस्थानों की मांग करते हैं लेकिन शक्ति के साथ प्रतिरोध भी आना चाहिए। नियामकों को भी हितों के टकराव के मामलों में सावधानी बरतनी चाहिए।

भारत को ऐसी संस्थागत संरचना संबंधी कानूनों की आवश्यकता है जो स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करें कि प्रत्येक नियामक संस्था में तीन अलग-अलग शाखाएं हों- नियम निर्माण, कार्यान्वयन और न्याय निर्णयन के लिए। नियामकों को यह विवेकाधिकार नहीं होना चाहिए कि वे न्याय निर्णयन की प्रक्रिया को अपनी पसंद की किसी बाहरी एजेंसी को सौंप दें। जहां आंतरिक रूप से यह पृथक्करण संभव न हो, वहां स्वतंत्र पंचाटों को हस्तक्षेप करना चाहिए। न्यायालयों को सतर्क रहना चाहिए और उन नियामकों को चिह्नित करना चाहिए जो कानून बनाने और उसके उल्लंघन पर निर्णय देने की सीमाओं को धुंधला करते हैं।

भारत का संवैधानिक वादा केवल प्रभावी शासन का नहीं बल्कि निष्पक्ष शासन का है। जब नियामक नियम भी बनाते हैं और उनके उल्लंघन पर निर्णय भी सुनाते हैं तो वह वादा टूटने लगता है। भारतीय नियामक राज्य की ताकत का आकलन इस बात से नहीं होगा कि वह कितनी शक्ति जुटाता है बल्कि इस बात से भी होगा कि वह उसका कितना उचित इस्तेमाल करता है। अर्द्ध विधायी और अर्द्ध न्यायिक कार्यों का पृथक्करण कोई प्रक्रियागत जरूरत नहीं बल्कि शासन की निष्पक्षता और विश्वसनीयता की बुनियादी जरूरत है।


Date: 25-10-25

जैसी करनी, वैसी भरनी

संपादकीय

अफगानिस्तान सरकार ने कुनार नदी पर बांध निर्माण की योजना को तेजी से अमलीजामा पहनाने का आदेश दिया है, तो यकीनन इससे पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ जानी चाहिए, क्योंकि इस बांध के बनने के बाद कुनार की धारा को नियंत्रित करने में काबुल सक्षम हो जाएगा और इससे पाकिस्तानी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा की खेती-किसानी के अलावा उसकी कई पेयजल व पनबिजली परियोजनाएं भी प्रभावित होंगी। दरअसल, कुनार नदी पाकिस्तान के चित्राल क्षेत्र से निकलती है और अफगानिस्तान में 300 किलोमीटर तक बहती हुई दोबारा पाकिस्तानी नदी काबुल में आ मिलती है। अफगानिस्तान अपने बहाव क्षेत्र में इस पर तीन बांध बनाने की योजनाएं बना रहा है। उसके जल मंत्री मुल्ला अब्दुल लतीफ मंसूर ने एक्स पर अपनी पोस्ट में यह साफ कर दिया है कि अफगानों को अपने जल प्रबंधन का पूरा अख्तियार है। जाहिर है, पहले ही गरमी के दिनों में पानी की भारी किल्लत से जूझते पाकिस्तान का संकट और गहराएगा, क्योंकि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत पहले ही सिंधु नदी जल समझौते को स्थगित कर चुका है और उसकी ओर जाने वाले प्रवाह को रोक भी चुका है।

तालिबान सरकार के इस रुख की तात्कालिक वजह पाकिस्तान के साथ हालिया झड़पें बताई जा रही हैं, जिनमें दर्जनों बेकसूर अफगानी मारे गए हैं और 400 से भी अधिक ग्रामीण जख्मी हुए हैं। मगर वास्तविकता यह है कि वर्षों से जारी अंदरूनी हिंसा की रफ्तार थमने बाद तालिबान निजाम अब दुनिया के देशों से वैधता हासिल करना चाहता है। रूस ने तालिबान सरकार को मान्यता भी दे दी है और अब भारत समेत कई पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूती देने के लिए काबुल ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी का भारत दौरा इसी दिशा में उठाया गया कदम था। भारत सरकार ने इसी मंगलवार को काबुल में अपने दूतावास को फिर से बहाल कर दिया है। इस्लामाबाद को यह सब नागवार गुजरना ही था। वह नहीं चाहेगा कि काबुल और नई दिल्ली के रिश्ते दोस्ताना हों। चूंकि ऑपरेशन सिंदूर के रूप में भारतीय सीमा में अपने किसी दुस्साहस की कीमत वह भली-भांति जान चुका है, इसलिए अब अपने पुराने साथी तालिबान के खिलाफ ही उसने मोर्चा खोल दिया है।

पड़ोसी देशों के खिलाफ षड्यंत्र रचने की कुटिल नीति ने ही पाकिस्तान को आतंकियों को अपनी गोद में बैठाने को मजबूर किया और इसका खामियाजा खुद उसके समाज, उसकी अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ रहा है। वह अमेरिका व चीन जैसी बड़ी शक्तियों का मोहरा बनकर रह गया है। विडंबना यह है कि कंगाली के कगार पर पहुंचकर भी वह ईमानदार आत्मालोचन को तैयार नहीं, अब वह उस तालिबान से उलझना चाहता है, जिसे खुद उसने पाला-पोसा और काबुल पर काबिज होने में जिसकी मदद की। मगर वह भूल बैठा है कि तालिबान अब कोई बागी समूह नहीं, अफगानिस्तान के सवा चार करोड़ लोगों के हितों की रक्षा के लिए जिम्मेदार निजाम है। अफगानिस्तान सरकार का दावा है कि कुनार नदी पर बांध बनने से उसकी करीब डेढ़ लाख एकड़ खेती को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो सकेगा और साथ ही 45 मेगावाट बिजली पैदा होगी। जाहिर है, यह बांध परियोजना उसकी ऊर्जा जरूरतों और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। ऐसे में, वह उस पड़ोसी पाकिस्तान के प्रति क्यों कोई मुरव्वत बरते, जो उसके लोगों के दमन करने, उन्हें मारने पर आमादा है?


Date: 25-10-25

साफ होने के करीब पशुपति से तिरुपति का लाल गलियारा

दिलीप त्रिवेदी, ( सेवानिवृत्त महानिदेशक, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल )

हाल के दिनों में देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। इस बार के आत्मसमर्पण में सबसे बड़ी बात यह रही कि नक्सलियों के कई बड़े नेताओं ने भी हथियार छोड़े हैं। जो बचे हैं, वे अलग-थलग पड़ रहे हैं। यह घटना उनके खिलाफ चल रहे अभियान के लिए कारगर साबित हो रही है और उग्रवाद खात्मे के कगार पर पहुंच गया है। यह सरकार के लिए और सुरक्षा बलों के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह और आगे बढ़ेगा और नक्सलवाद देश से पूरी तरह खत्म होगा, ऐसी उम्मीद हम सबको करनी चाहिए।

जब हम नक्सली उग्रवाद के खतरों की बात करते हैं, तो हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि यह उग्रवाद उस तरह का नहीं है, जैसा कश्मीर या पूर्वोत्तर में रहा है, जहां देश से ही अलग होने की बात की जाती रही। नक्सली उग्रवाद मूलतः देश के अंदर ही हिंसात्मक गतिविधि है, जो सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। उनका नारा ही है, ‘सत्ता वोट से नहीं, बंदूक की नली से निकलती है’। दूसरी बात, जो नक्सलियों की गतिविधि के बारे में है कि शुरू में यह उग्रवाद दो हिस्सों में बंटा था। एक का नेतृत्व बिहार में सीपीआई (एमएल) करता था, तो दूसरे का आंध्र प्रदेश का पीपुल्स वार ग्रुप । बाद में दोनों जब कमजोर पड़े, तो उनमें एका हो गई। एकीकृत माओवादी समूह ने रणनीति बनाई कि नेपाल के पशुपति से आंध्र प्रदेश के तिरुपतितक एक ‘रेड कॉरिडोर’ बनाएंगे। उस समय उनके पक्ष में माहौल था, क्योंकि नेपाल में भी माओवाद चरम पर था।

देश के आदिवासी इलाकों में आदिवासियों के शोषण ने नक्सलियों को उर्वर जमीन मुहैया कराई। झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विभिन्न सुरक्षा बलों के पदाधिकारी के तौर पर तैनाती के दौरान मैं खुद गवाह रहा हूं कि यहां की सबसे प्रमुख वनोपज – तेंदूपत्तों के माध्यम से आदिवासियों का शोषण होता था। गैर आदिवासी इलाकों के ठेकेदार आज से 15-20 साल पहले उनसे पांच रुपये में एक हजार तेंदूपत्ता लेते थे, जिन्हें वे बीड़ी की फैक्टरियों में पांच सौ रुपये में बेचते थे। नक्सलियों ने उन्हें इस शोषण के बारे में समझाया और वहां अपनी गहरी पैठ बना ली। नक्सलियों की भौतिक ताकत पुलिस, जमींदार, जेल, थाने के हथियार होते थे। उनका नारा ही था, पुलिस का हथियार, हमारा हथियार’ । इसलिए जब भी वे पुलिस बल या जेलों पर हमला करते, तो वहां से हथियार वे सबसे पहले लूट ले जाते थे। इसी तरह आदिवासी इलाकों की खदानों के ठेकेदारों को धमकाकर वे वहां उपयोग होने वाली विस्फोटक सामग्री ले लेते थे। नक्सल प्रभावित राज्यों की पुलिस इतनी कमजोर थी कि न उनके पास न पर्याप्त संख्या थी, न प्रशिक्षण और न ठीक-ठाक हथियार। इसी बीच छत्तीसगढ़ में एक और घटना हो गई, जिसमें नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे। इसी तरह, 2010 में कांग्रेस की यात्रा पर हमले में प्रदेश के उसके कई बड़े नेता मारे गए।

इसके बाद केंद्र ने भी इसे गंभीरता से लिया। राज्यों को पुलिस बल, उन्हें प्रशिक्षण और हथियार आदि के लिए पर्याप्त राशि दी जाने लगी। सामाजिक स्तर पर भी काम शुरू हुए। जैसे, आदिवासियों से संपर्क का कोई साधन नहीं था। वे बाहर निकलते नहीं थे। इन मुद्दों पर ध्यान दिया गया। थानों की किलेबंदी की गई, रणनीति अपनाकर वहां संपर्क स्थापित किया गया। स्थानीय लोगों को भरोसे में लेकर उनकी बोली समझी जाने लगी। इस दौरान नक्सलियों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर माहौल बनने लगा, क्योंकि नक्सली नेताओं ने महिलाओं का शोषण शुरू कर दिया। इससे वहां के लोग उनके खिलाफ हुए व पुलिस तक जानकारी पहुंचाने लगे।

एक बात और, यहकाम एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि इसकी शुरुआत 2006 से ही हो गई थी और 2012-13 तक केंद्र ने पूरा जोर लगा दिया। तब के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने बयान भी दिया था कि यह वाम उग्रपंथ देश में उपस्थित कश्मीर के आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक है और इसे पहले खत्म करना होगा। तो, दशकों के गंभीर प्रयास, सबके सहयोग से जो अभियान शुरू हुआ, उसका परिणाम अब दिख रहा है। आगे भी ऐसा चलता रहा, तो यह लाल आतंक देश से समाप्त हो जाएगा, ऐसा विश्वास सबको रखना चाहिए।