27-12-2025 (Important News Clippings)
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Social scourge
Child marriages lead to poor outcomes in health, education, poverty alleviation
Editorial

India has committed to end child marriage by 2030 through the UN’s Sustainable Development Goals (SDG), and while it has made comprehensive strides, there are still miles to go to achieve the target. The Union government recently marked the first anniversary of its Bal Vivah Mukt Bharat Abhiyan with a 100-day awareness campaign for a country free of child marriage. It is a fact that child marriages have been consistently dropping, from 47.4% in 2005-06 to 23.3% in 2019-21, according to National Family Health Survey (NFHS) data. But in a diverse country of a population of 146 crore, the ground reality is that progress is varied and uneven across States and socio-economic demographics. While the highest child marriage rates among women aged 18 to 29 years are prevalent in West Bengal, Bihar and Tripura, States such as Jharkhand, Andhra Pradesh, Assam, Telangana, Madhya Pradesh and Rajasthan are not far behind. There is a direct co-relation between child marriage, poverty and education, as the UN Population Fund’s analysis of NFHS data shows. While 40% of girls from the lowest quintile of the household wealth index married before they became adults, in comparison to just 8% of those from the highest quintile, 48% of girls with no education were married below 18 years in comparison to only 4% among those with higher education.
The Prevention of Child Marriage Act, 2006, is the flagship law to end the practice, but figures from National Crime Bureau Records indicate infrequent application of the law and a low conviction rate. Also, the use of laws such as the Protection of Children from Sexual Offences Act, which are stringent and provide no leeway for consenting sexual adolescents, has led to other concerns. Afraid of triggering harsh punishments from the criminal justice system, many underage girls are turning to unregistered, unprofessional help, endangering their health further. Already, it is established that child marriages can lead to poor maternal and child health. In this backdrop, it is imperative to study why States such as West Bengal, which incentivises girls to study with a cash scheme, still has a high incidence of child marriage. The Centre’s ‘Beti Bachao Beti Padhao’ campaign has to do much more to reach the most vulnerable communities, and ensure that infrastructure, including clean toilets and safe public transport, are in place to keep girls at school. According to Girls Not Brides, a global partnership, at least nine of the 17 SDGs will not be achieved without ending child marriage. In India, unless the several factors driving child marriage — poverty, and education, health and gender inequality — are addressed, it will be impossible to bridge the gap between policy and practice.
संगठित अपराध का तंत्र
संपादकीय
दिल्ली में आयोजित आतंकवाद रोधी सम्मेलन में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संगठित अपराध तंत्र का जो डाटाबेस जारी किया, वह समय की मांग के अनुरूप है। इस डाटाबेस में देश में सक्रिय आतंकी संगठनों और गैंगस्टरों का कच्चा-चिट्ठा है। इसमें गुम और बरामद हथियारों का भी विवरण है। इसे इसलिए तैयार किया गया है, क्योंकि आतंकी संगठनों और माफिया सरीखे अपराधियों के गिरोहों के बीच साठगांठ बढ़ती चली जा रही है।
कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनसे यह इंगित हुआ कि आतंकियों को किसी न किसी स्तर पर अपराधियों का सहयोग मिला। आम तौर पर आतंकी अपनी गतिविधियों को अंजाम देने में तभी सफल हो पाते हैं, जब उन्हें स्थानीय स्तर पर किसी तरह की मदद मिलती है। यह किसी से छिपा नहीं कि अब आतंकी और गैंगस्टर हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी करने लगे हैं। सीमा पार से ऐसे हथियार आ रहे हैं, जो आतंकियों के साथ बड़े अपराधियों तक भी पहुंच रहे हैं।
कुछ समय पहले ऐसे एक गिरोह का भंडाफोड़ भी किया गया था, जो सीमा पार से आए हथियारों को अपराधियों तक पहुंचाता था। एनआईए की ओर से तैयार उक्त डेटाबेस सभी राज्यों की पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को उपलब्ध होगा। आशा की जा रही है कि इससे आतंकवाद और संगठित अपराध से मिलकर निपटने में सफलता मिलेगी, लेकिन उचित होगा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसा वास्तव में हो। यह इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भी है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जो कुछ भी संभव हो, किया जाना चाहिए।
एक ओर जहां आतंकियों के दुस्साहस का दमन किए जाने की सख्त जरूरत है, वहीं दूसरी ओर बड़े अपराधियों पर भी लगाम लगाने की आवश्यकता है। यह ठीक नहीं कि कुछ अपराधी जेल में रहकर भी अपनी गतिविधियां चलाते रहते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, इसके कारणों का पता लगाकर उनका निवारण प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए।
यह सही है कि केंद्र सरकार आतंकवाद का सामना करने के लिए प्रतिबद्ध है और उसकी इस प्रतिबद्धता के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं, लेकिन आतंकी खतरे को कम करने के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है, क्योंकि वे अपने तौर-तरीके बदलने के साथ आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
आवश्यक केवल यह नहीं कि आतंकी संगठनों और अपराधियों की टोह लेने का काम और कुशलता से किया जाए, बल्कि इसकी भी है कि अदालतें आतंकवाद के मामलों का निपटारा करने में शीघ्रता का परिचय दें। कई ऐसे मामले हैं, जिनमें आतंकियों को सजा सुनाने में जरूरत से ज्यादा देरी हुई। जब ऐसा होता है तो आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति पर सवाल उठते हैं। आतंकवाद एक ऐसा खतरा है, जिस पर चौतरफा प्रहार किया जाना चाहिए।
Date: 27-12-25
दिल्ली इलेक्ट्रिक वाहन रणनीति
संपादकीय

दिल्ली सरकार ने अगले साल संशोधित इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति लागू करने का निर्णय लिया है। यह स्वच्छ परिवहन में हुई प्रगति और वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केवल ईवी पर निर्भर रहने की संरचनात्मक सीमा को रेखांकित करता है। शहर की पहली ईवी नीति को वर्ष 2020 में अधिसूचित किया गया था। उसमें यह महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया था कि 2024 तक सभी नए वाहन पंजीकरणों में से 25 फीसदी इलेक्ट्रिक होने चाहिए। लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।
रिपोर्टों से पता चलता है कि शहर में ईवी की संख्या 12 फीसदी से अधिक हो गई है, लेकिन इससे सर्दी में दिल्ली की वायु गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। यह नीति के डिजाइन और कार्यान्वयन में चुनौतियों को दर्शाता है। आगामी ईवी नीति में पुराने वाहनों को स्क्रैप करने के साथ वित्तीय प्रोत्साहन को जोड़कर, मोहल्ले स्तर पर चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार कर तथा रोड टैक्स और पंजीकरण शुल्क में छूट जारी रखकर इन कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया है।
पेट्रोल-डीजल वाहन और इलेक्ट्रिक वाहन के बीच कीमत का अंतर कम करने के उद्देश्य से दी जाने वाली सब्सिडी और बैटरी स्वैपिंग विकल्प का नए ढांचे का मुख्य आधार बनने की उम्मीद है। यह क्रय-सब्सिडी के संकीर्ण दृष्टिकोण से हटकर अधिक कारगर हस्तक्षेप की ओर एक बदलाव का संकेत देता है।
दिल्ली का अब तक का अनुभव बताता है कि केवल प्रोत्साहन से ही स्वच्छ हवा नहीं मिल सकती। इन्हें प्रदूषण नियंत्रण के परिणामों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का उपयोग दोपहिया और तिपहिया वाहनों में अधिक केंद्रित रहा है, जो पहले से ही अपेक्षाकृत कम उत्सर्जन करते हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के लगभग 37 फीसदी वाहन बीएस-III या उससे पुराने इंजनों पर चलते हैं। परिणामस्वरूप, परिवहन प्रणाली में ईवी को शामिल तो कर लिया गया, लेकिन सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को उसी अनुपात में हटाया नहीं गया। पुराने वाहनों को हटाने में यह विफलता विशेष रूप से चिंताजनक है।
यह मुद्दा हाल ही में तब और भी स्पष्ट हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार पर पुराने वाहनों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए लगाए गए प्रतिबंध को हटा दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल बीएस-IV और उससे ऊपर के इंजन वाले वाहनों को ही कार्रवाई से छूट दी जाएगी, जिससे 10 साल पुराने डीजल और 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों पर पहले के आदेश से उत्पन्न अस्पष्टता दूर हो गई। अदालत का स्पष्टीकरण इस बात के सबूतों के आधार पर आया है कि बीएस-II और -III श्रेणी के वाहन, जो आमतौर पर इसी आयु वर्ग में आते हैं, दिल्ली में सर्दी की धुंध में बड़े पैमाने पर योगदान करते हैं। वाहनों को नष्ट करने के लिए विश्वसनीय और निरंतर प्रवर्तन के बिना प्रदूषण के लिहाज से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने से होने वाले लाभ नगण्य ही रहेंगे।
यह समझना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि दिल्ली, एनसीआर के साझा वायु क्षेत्र का हिस्सा है। केवल दिल्ली के लिए बनाई गई नीतियां सीमित लाभ ही दे सकती हैं। इस संदर्भ में पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश ने इलेक्ट्रिक वाहनों और हाइब्रिड वाहनों पर अधिक आक्रामक नीति अपनाई है, जिसमें कर छूट, सीधी खरीद के लिए प्रोत्साहन और चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए सब्सिडी शामिल हैं। इससे इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने और चार्जिंग नेटवर्क के विस्तार दोनों में तेजी आई है, जिससे पूरे एनसीआर में सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
दिल्ली की नीति एक स्वतंत्र हस्तक्षेप के रूप में काम करने के बजाय ऐसे क्षेत्रीय प्रयासों के साथ तालमेल बिठाकर अधिक प्रभावी होगी। संशोधित इलेक्ट्रिक वाहन नीति के परिणामस्वरूप सब्सिडी का स्वरूप महत्त्वपूर्ण होगा। प्रोत्साहन लक्षित, समयबद्ध और प्रदूषण कम करने से स्पष्ट रूप से जुड़े होने चाहिए। उच्च माइलेज वाले वाणिज्यिक बेड़े, सार्वजनिक परिवहन और पुराने डीजल वाहनों के प्रतिस्थापन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जहां प्रति रुपये खर्च पर उत्सर्जन में कमी सबसे अधिक है।
इसके अलावा प्रदूषण रोकने के लिए हतोत्साहित करने के कड़े उपाय करने आवश्यक हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि साफ-सुथरे वाहन गंदे वाहनों की जगह लें, न कि उनके साथ-साथ चलाए जाएं। इन उपायों में पेट्रोल-डीजल इंजन पर चलने वाले वाहनों के लिए पंजीकरण शुल्क, कंजेशन प्राइसिंग यानी भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने के लिए शुल्क या प्रदूषण फैलाने वाली बहुत पुरानी कारों से जुड़े ‘एंड ऑफ लाइफ’ नियमों को सख्ती से लागू करना शामिल है।
Date: 27-12-25
चीन से कौन से सबक ले सकता है भारत ?
नितिन देसाई
वर्ष1978 में चीन में तंग श्याओफिंग ने एक नया विकास मॉडल प्रस्तुत किया। एक केंद्रीय नियोजित, सरकारी क्षेत्र पर बल देने वाली तथा अंतर्मुखी अर्थव्यवस्था को बदलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई जो विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित करने, स्थानीय निजी कंपनियों को प्रोत्साहित करने तथा तीव्र निर्यात वृद्धि पर आधारित थी। भारत में बड़ा नीतिगत बदलाव बाद में वर्ष 1991 में हुआ जब लाइसेंस व्यवस्था समाप्त की गई। वित्तीय क्षेत्र में बड़े सुधार किए गए और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं से रिश्तों को मजबूत किया गया।
इन बुनियादी नीतिगत बदलावों के कारण दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच में अंतर बढ़ता चला गया। 1978 तक चीन का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) भारत से कम था। उसके बाद वह तेजी से बढ़ा और 1992 तक भारत के दोगुना हो गया। प्रति व्यक्ति जीडीपी अनुपात में यह अंतर भारत के उदारीकरण के अपनाए जाने के बाद भी बढ़ता रहा और 2000 तक यह तीन गुना, 2007 में चार गुना और 2012 में पांच गुना हो गया। वर्ष 2024 तक आते-आते यह भारत के साढ़े पांच गुना हो गया।
माना जाता है कि चीन की वृद्धि के भारत से आगे निकलने का मुख्य कारण वहां विनिर्माण क्षेत्र का असाधारण रूप से तीव्र विस्तार है। वर्ष 2023 में वैश्विक विनिर्माण में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 28 से 30 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि भारत की हिस्सेदारी मात्र 3 फीसदी थी। यहां सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात है 1978 के बाद चीन में निजी क्षेत्र का विस्तार। याद रहे उस समय चीन में निजी क्षेत्र का कोई महत्त्वपूर्ण उपक्रम नहीं था। सन 1978 के बाद चीन में निजी क्षेत्र के उपक्रमों की वृद्धि नए कारोबारियों की बदौलत हुई। ये अक्सर तकनीकी कौशल वाले व्यक्ति थे जो तेज वृद्धि पर जोर देते थे।
वास्तव में, कहा जाता है कि निजी उद्यमों का तीव्र उदय प्रारंभ में केंद्रीय सरकार द्वारा न तो परिकल्पित किया गया था और न ही प्रोत्साहित। शुरुआती सरकारी फंडिंग का अधिकांश हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को गया। उदारीकरण संबंधी सुधार की शुरुआत में निजी क्षेत्र का विकास उन नए उद्यमों द्वारा संचालित था जिन्हें स्थानीय सरकारों के समर्थन से स्थापित किया गया था। अधिकांश निजी क्षेत्र की कंपनियां, जो अब न केवल चीन में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बड़ा नाम हैं, 1995 के बाद स्थापित हुईं।
भारत में उदारीरकरण के पहले के दौर में सार्वजनिक क्षेत्र पर ध्यान होने के बावजूद अच्छी खासी संख्या में निजी क्षेत्र के उपक्रम और कारोबारी समूह थे। उदारीकरण के बाद भी, स्थापित निजी कॉरपोरेट क्षेत्र, विशेष रूप से बड़े समूहों की मौजूदगी ने विनिर्माण क्षेत्र में नए खिलाड़ियों के उभार को सीमित कर दिया। जहां नए उद्यम उभरे और बड़े बने, वह मुख्यतः सेवा क्षेत्र था, विशेषकर कौशल-प्रधान सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र। संभवतः यही कारण है कि भारत की सेवाओं का निर्यात मात्रा में चीन के बराबर है, जबकि उसका विनिर्माण निर्यात चीन के केवल दसवें हिस्से के बराबर हैं।
इससे संकेत मिलता है कि हमारी वृद्धि दर बढ़ाने के लिए चीन की वृद्धि संबंधी उछाल और हमारे सूचना प्रौद्योगिकी उछाल से एक सबक यह है कि सरकार का वित्तीय और नीतिगत समर्थन नए उद्यमियों की ओर दृढ़ता से निर्देशित होना चाहिए, स्थापित समूहों के समर्थन से हटना चाहिए और प्रतिस्पर्धा के माध्यम से नए खिलाड़ियों पर भरोसा करना चाहिए ताकि उन्हें बढ़ावा दिया जा सके। इससे जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा निजी विनिर्माण विकास को समर्थन देने के लिए सरकारी व्यय है। ‘मेक इन इंडिया’ योजना में कई कार्यक्रम शामिल हैं, जिनमें प्रमुख हैं उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना और इलेक्ट्रॉनिक घटकों एवं सेमीकंडक्टरों को बढ़ावा देने की योजना। इन दोनों का संयुक्त बजट लगभग 36 अरब डॉलर है।
अगर इसकी तुलना मेक इन चाइना के तहत होने वाले सरकारी व्यय से की जाए तो उसके तहत विनिर्माण उपक्रमों की मदद के लिए 330 अरब डॉलर की फंडिंग की व्यवस्था थी। नए विनिर्माण उपक्रमों को बढ़ावा देने में करीब 10 गुना फंड का यह अंतर ही दोनों देशों के प्रदर्शन में इतने बड़े अंतर की वजह है। यानी चीन के अनुभव से एक सबक यह भी है कि हमें अधिक सावधानीपूर्वक योजना बनानी चाहिए और नई शुरुआत करने वालों को अधिक महत्त्वपूर्ण वित्तीय मदद देनी चाहिए।
चीन से तीसरा सबक यह है कि स्थानीय प्रशासन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। चीन में स्थानीय राजनीतिक कुलीन वर्ग ने नए उद्यमियों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने में बड़ी भूमिका निभाई, जिससे रोजगार और स्थानीय वित्तीय विकास के लिए स्वागत योग्य विकल्प उपलब्ध हुए, भले ही यह केंद्रीय सरकार की औपचारिक नीति का हिस्सा न रहा हो। जब निजी क्षेत्र का विकास आधिकारिक रणनीति का हिस्सा स्वीकार कर लिया गया, तब यह प्रक्रिया प्रांतीय सरकार के स्तर पर भी जारी रही। विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बिंदु शहरी सरकारों की भूमिका है, जिन्होंने चीन में उद्योग को बढ़ावा दिया। उदाहरण के लिए हाल ही में इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों के विकास में।
भारत में निजी उद्यमों की फंडिंग और औपचारिक सहयोग पर नियंत्रण मुख्यतः केंद्र सरकार के पास है, यद्यपि राज्य सरकारें भूमि अधिग्रहण और कंपनियों को आवश्यक स्थानीय बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने में प्रत्यक्ष भागीदारी के माध्यम से कुछ प्रभाव डालती हैं। लेकिन विशिष्ट निजी परियोजनाओं को चुनने और उन्हें समर्थन देने में संघ सरकार की महत्त्वपूर्ण भूमिका बड़े समूहों और राष्ट्रीय स्तर की कॉरपोरेट संस्थाओं को स्थानीय उद्यमों, विशेषकर छोटे और मध्यम स्तर के नए उद्यमियों की तुलना में लाभ देती है। चीन के अनुभव से सीखते हुए, भारत को परियोजनाओं के सहयोग की जिम्मेदारी राज्यों को सौंपनी चाहिए। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि हमारे नगर निकायों को सशक्त और सक्षम बनाया जाए ताकि वे स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने में कहीं अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकें।
एक अन्य क्षेत्र जहां चीन और भारत के बीच बड़ा अंतर है वह है शोध एवं विकास को सरकार द्वारा दिया जाने वाला प्रोत्साहन। वर्ष 1999 तक दोनों देशों के जीडीपी का लगभग समान हिस्सा शोध एवं विकास पर व्यय किया जाता था। चीन में यह 0.75 फीसदी था और भारत में 0.72 फीसदी। चीन की औद्योगिक रणनीति सौर व पवन ऊर्जा, चिप निर्माण, रोबोटिक्स तथा बाद में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रिक वाहनों पर केंद्रित हो गई। इसके साथ ही शोध एवं विकास में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जो वर्ष 2020 तक जीडीपी के 2.4 फीसदी तक पहुंच गई। इसके विपरीत, भारत में जीडीपी के अनुपात में शोध एवं विकास की हिस्सेदारी 2008 के 0.85 फीसदी से घटकर 2020 में 0.64 फीसदी रह गई। कुल मिलाकर देखें तो दोनों देशों में शोध एवं विकास निवेश में अंतर लगभग 20 अनुपात एक का है।
चीन ने शोध संस्थानों, उत्पादन उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के बीच संबंधों को भी मजबूत किया। उसके 8 से 10 विश्वविद्यालय वैश्विक शीर्ष-100 विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल हो गए हैं। भारत में ऐसा नहीं हुआ है। हमारे लिए अहम सबक यही है कि शोध एवं विकास व्यय बढ़ाया जाए और शोध संस्थानों, उत्पादन उद्यमों तथा आईआईटी एवं अन्य विश्वविद्यालयों के बीच संबंधों को सुधारा जाए। स्कूल और कॉलेज शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है।
चीन की रणनीति के कुछ पहलू ऐसे हैं जिन्हें भारत न तो अपना सकता है और न ही उसे अपनाना चाहिए। भारत एक लोकतंत्र है, और इसकी सरकारें चीन सरकार की तरह अधिनायकवादी नहीं हो सकतीं। हमारे यहां संघीय सरकार कुछ चुनिंदा क्षेत्रों का पक्ष नहीं ले सकती या श्रमिकों के क्षेत्रीय प्रवासन को नियंत्रित नहीं कर सकती, जैसा कि चीन की सरकार ने किया। लेकिन केंद्र सरकार को नए उद्यमियों को समर्थन देने, अफसरशाही की लालफीताशाही को कम करके निर्णय लेने की गति बढ़ाने, सार्वजनिक संस्थानों द्वारा शोध एवं विकास पहलों को उल्लेखनीय रूप से तेज करने और निजी उद्यमों, विशेषकर बड़े समूहों, पर भी ऐसा करने का दबाव डालने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
सद्भाव का तकाजा
संपादकीय
दुनिया भर में भारत को विविधताओं से भरी सांस्कृतिक छवियों वाले एक ऐसे देश के रूप में देखा जाना जाता है, जहां अलग- अलग धर्मों के लोग आपसी सद्भाव के साथ रहते और एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते आए हैं। मगर हाल के वर्षों में कुछ खास त्योहारों के ठीक पहले जिस तरह द्वेष का माहौल पैदा करने की कोशिश की जाने लगी है, वह न केवल देश में सौहार्द को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है, बल्कि मानवीय तकाजों के भी विरुद्ध है। क्रिसमस को ईसाई धर्म से जुड़े लोगों का त्योहार माना जाता है, लेकिन इसमें आमतौर पर देश में सभी धर्मों के लोग उत्साह के साथ शामिल होते रहे हैं। विडंबना यह है कि अब कुछ असामाजिक तत्त्व क्रिसमस के मौके पर देश के ईसाई समुदाय के लोगों को निशाना बनाने लगे हैं और इसका सीधा नुकसान देश की छवि को हो रहा है। गौरतलब है कि इस वर्ष फिर क्रिसमस के मौके पर छत्तीसगढ़ और असम सहित कुछ राज्यों में ईसाई समुदाय के प्रार्थना स्थलों और अन्य जगहों पर दक्षिणपंथी समूहों ने हमला किया और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ मचाई।
सवाल है कि वे कौन लोग हैं, जो सद्भाव के माहौल में नफरत घोलना चाहते हैं और उन्हें देश के अल्पसंख्यक या अन्य समुदायों के पर्व-त्योहार से परेशानी होने लगी है। क्या मानवीयता के मूल्यों को अपनी आस्था का सबसे अहम पक्ष मानने वाला कोई भी व्यक्ति किसी अन्य समुदाय के त्योहार से इस कदर दुश्मनी रख सकता है? सद्भाव या सौहार्द के साथ किसी धार्मिक उत्सव को मनाए जाने से किसे दिक्कत हो सकती है? केवल निराधार आरोपों का हवाला देकर किसी ऐसे त्योहार पर अराजकता फैलाने का क्या मकसद हो सकता है, जिसमें देश के सभी धर्मों के लोग या तो सहज रहते हैं या फिर उसमें शामिल होते हैं? कथित धर्म परिवर्तन के आरोप अगर लगाए भी जाते हैं, तो इस मसले पर सरकार और प्रशासन अपना काम करेंगे या कुछ अराजक और असामाजिक तत्त्वों को अपनी ओर से हिंसा करने की छूट मिल जाती है ? किसी समुदाय के भीतर डर पैदा करके किस तरह से धर्म की सेवा की जा सकती है?
यह ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी भी बहाने से अन्य धार्मिक समूहों के खिलाफ हिंसा करना या तोड़फोड़ मचाना वास्तव में अपने ही देश की सांस्कृतिक छवि को नकारात्मक बनाना है। अगर इस तरह की प्रवृत्तियों को तुरंत नहीं रोका गया, तो इससे आपसी सद्भाव का माहौल बिगड़ने की आशंका पैदा होगी। इतना तय है कि देश के संविधान का सम्मान करने वाली सरकारें और ज्यादातर संवेदनशील लोग धर्म के नाम पर टकराव तथा तनाव पैदा करने की कोशिशों का समर्थन नहीं करते। यही वजह है कि कई जगहों पर क्रिसमस पर उत्पात मचाने वालों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया। यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि किसी भी पर्व-त्योहार के मौके पर सांप्रदायिकता फैलाने वाले तत्त्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो । विचित्र यह भी है कि क्रिसमस के मौके पर एक ओर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईसाई समुदाय के साथ मेलजोल, शांति और सद्भाव का संदेश दे रहे थे, तो दूसरी ओर कुछ असामाजिक तत्त्व तोड़फोड़ और अराजकता फैलाने में लगे थे। देश में सभी धर्मों के पर्व-त्योहारों के अवसर पर सौहार्द तथा सद्भाव की जो परंपरा रही है, उसे बचाने और मजबूत करने के लिए सरकार और समाज को एक बार फिर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
Date: 27-12-25
पढ़ने को प्रोत्साहन
संपादकीय
पढ़ने की संस्कृति व्यक्ति के बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाती है। इससे हमारे जेहन में शब्दों के संग्रहण का विस्तार होता है, आलोचनात्मक सोच विकसित होती है और रचनात्मकता एवं कल्पनाशीलता को बढ़ावा मिलता है, जो हमें समाज में एक जिम्मेदार और विवेकपूर्ण नागरिक बनता है। मगर आज के डिजिटल तकनीक के दौर में खासकर बच्चे और युवाओं की अंगुलियां पुस्तक के पन्नों को पलटने के बजाय मोबाइल फोन और लैपटाप पर ही चलने लगी हैं। यह वास्तव में चिंता का विषय है। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने विद्यार्थियों में पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। इसके तहत राज्य के स्कूलों में हिंदी और अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र उपलब्ध कराने तथा सुबह की प्रार्थना सभा में कम से कम दस मिनट का समय विद्यार्थियों द्वारा इन्हें पढ़ने के लिए निर्धारित करने का निर्देश दिया गया है।
इससे पहले हिमाचल प्रदेश में इस वर्ष जून में सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान विद्यार्थियों के समाचार पत्र पाठ की व्यवस्था लागू की गई थी। इस पहल को अब उत्तर प्रदेश सरकार ने आगे बढ़ाया है। इसके तहत विद्यार्थी प्रतिदिन राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय और खेल समाचारों के साथ- साथ प्रमुख संपादकीय भी पढ़ेंगे। साथ ही विद्यार्थी अखबारों से पांच कठिन शब्द चुनकर उन्हें सूचना पट्ट पर प्रमुखता से प्रदर्शित करेंगे। यह व्यवस्था कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। इससे न केवल विद्यार्थियों में सामान्य ज्ञान, शब्दावली, रचनात्मकता और संवाद कौशल विकसित होगा, बल्कि उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहतर ढंग से तैयारी करने में भी मदद मिलेगी। पढ़ने की संस्कृति अगर फिर से बच्चों की आदत में शुमार हो जाए, तो मोबाइल या लैपटाप की स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा समय बिताने की उनकी प्रवृत्ति भी धीरे-धीरे कम हो सकती है। मगर, यह पहल तभी सार्थक होगी, जब इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के सही मायने में धरातल पर उतारा जाएगा और इसकी निरंतरता को बनाए रखा जाएगा। इसके साथ-साथ सरकारी पुस्तकालयों में भी विद्यार्थियों की आसान पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए ।
Date: 27-12-25
ऊर्जा की जरूरतों का हरित विकल्प
अखिलेश आर्येदु
केंद्र सरकार ऊर्जा की कमी को पूरा करने के लिए हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा दे रही है। सरकार का लक्ष्य है, हर वर्ष 50 लाख टन हरित हाइड्रोजन के जरिए ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करना । गौरतलब है हरित हाइड्रोजन उद्योग जिस तरह बड़े पैमाने पर स्थापित हो रहे हैं, ऐसे में उच्च क्षमता वाला बिजली उत्पादन और विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा की आपूर्ति हासिल करना मुश्किल नहीं होगा। वर्तमान में वैश्विक हाइड्रोजन आपूर्ति के लिए जो विधि उपयोग में लाई जा रही है, वह सुगम और सस्ती है। मगर वहीं पर हाइड्रोजन ऊर्जा की आपूर्ति के आंकड़े वर्तमान में सीमित हैं, क्योंकि दुनिया में करीबन 96 फीसद हाइड्रोजन हाईड्रोकार्बन से पैदा होती है। इसमें महज तकरीबन चार फीसद बिजली के इलेक्ट्रोलिसिस (विद्युत अपघटन ) द्वारा तैयार की जाती है। भारत सरकार चाहती है कि जब तक हर गांव और बाजार मुहल्ले की ऊर्जा जरूरतें इसके जरिए न पूरी होने लगें, तब तक इसके लिए लगातार कोशिश करते रहना चाहिए। इससे जागरूकता आएगी और लोग हाइड्रोजन ईंधन की महत्ता को भी समझने लगेंगे।
हाइड्रोजन आने वाले वक्त का ऊर्जा आपूर्ति का आधार बनेगा। हरित हाइड्रोजन में कार्बन उत्सर्जन कम करने और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की अपार क्षमता है। यह परिवहन और उद्योग में पारंपारिक जीवाश्म ईंधन की जगह ले सकता है, जो ऊर्जा का एक निरंतर और विश्वसनीय स्रोत होगा। कह सकते हैं कि जीवाश्म ईंधन में कमी लाने वाला ऊर्जा विकल्प का सबसे बेहतर स्रोत हरित हाइड्रोजन बनने जा रहा है। आने वाले समय में शायद हर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल होगा। जिंदगी को अधिक सुगम बनाने के लिए इसका उपयोग समाज के प्रत्येक वर्ग की जिंदगी को प्रभावित करेगा।
उत्तर प्रदेश जैसे कुछ बड़े राज्य स्वच्छ किफायती और टिकाऊ ऊर्जा के लिए बड़े सोलर पार्क, हरित हाइड्रोजन, विकेंद्रीकृत ऊर्जा, और माइक्रो ग्रिड के जरिए ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने पर खास जोर दे रहे हैं। राज्य सरकार ने 2047 तक इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए विशेषज्ञों के साथ मिल कर आगे की कार्ययोजना तैयार की है। इसी तरह की योजना देश के सभी राज्यों को तैयार करनी होगी, क्योंकि कार्बन मुक्त ऊर्जा पैदा करने के लिए जैव ऊर्जा सबसे किफायती है। इससे बेहतर दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हरित हाइड्रोजन में कई संभावनाएं छिपी हैं।
दरअसल, ऊर्जा क्षेत्र में कमी को पूरा करने के लिए सरकार हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा दे रही है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार वैश्विक क्षमताओं के बीच भारत को अपने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन के मिशन के माध्यम से 2030 तक 50 लाख टन (एमएमटी) वार्षिक हरित हरित हाइड्रोजन क्षमता हासिल करने के लिए मेहनत करनी होगी। इसके लिए केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2030 तक राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन लागू करने के लिए 19.744 करोड़ का परिव्यय मंजूर कर चुकी है। इससे देशभर में हाइड्रोजन ईंधन को बढ़ावा दिया जाएगा। यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की जगह ले सकता है, जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
हरित हाइड्रोजन पर तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बताया गया कि भारत निर्धारित लक्ष्य हासिल कर लेगा यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि 2023 में शुरू किए गए राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत भारत ने 2030 तक हरित हाइड्रोजन की वार्षिक उत्पादन क्षमता जोड़ने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 50 लाख टन रखी है। इससे यह अनुमान लगाया गया है कि ऊर्जा की कमी जिन क्षेत्रों में दिखाई दे रही है, उन सभी क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल करके इस कमी को पूरा किया जा सकता है।
भारत ने वर्ष 2047 तक ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लक्ष्य की घोषणा की है। इन लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में हरित हाइड्रोजन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसका उत्पादन कई नजरिए से खास है। पर्यावरणीय मानकों पर यह सबसे खरा उतरता है, क्योंकि हरित हाइड्रोजन का उत्पादन, इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा किया जाता है। इस प्रक्रिया में सौर, पवन या जलविद्युत जैसे अक्षय स्रोतों से उत्पन्न बिजली का इस्तेमाल कर पानी को आक्सीजन और हाइड्रोजन में विभाजित किया जाता है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप स्वच्छ और उत्सर्जन मुक्त ईंधन प्राप्त होता है इसमें जीवाश्म ईंधन को प्रतिस्थापित करने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने की अपार क्षमता है।
दुनियाभर में परिवहन, पचन और स्टील सहित कई क्षेत्रों को कार्बन- मुक्त करने के लिए हाइड्रोजन की मांग तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में हाइड्रोजन का अकूत भंडार है, जिससे दो सौ वर्ष से ज्यादा समय के लिए जरूरी ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि हाइड्रोजन का इस्तेमाल नए आविष्कारों के जरिए घरेलू उपयोग के लिए जल्द ही सुलभ हो सकता है नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ने की वार्षिक आवश्यकता के बारे में बताया गया है कि भारत बिजली खरीद या बिक्री समझौतों पर हस्ताक्षर के लिए पहले से ही लंबित 40 गीगावाट क्षमता पर ध्यान केंद्रित करेगा। यह भी बताया गया है कि वर्तमान में कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में 160 गीगावाट की नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं प्रक्रियाधीन हैं। भारत को वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल करने के लिए हर साल कम से कम 50 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़नी होगी।
अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों की शुरुआती परियोजनाओं के लिए नए प्रस्ताव आमंत्रित किए जा चुके हैं। इसमें सौ करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए जैविक पदार्थ का उपयोग शामिल है। हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए जैविक पदार्थों के उपयोग सहित अत्याधुनिक तकनीक को जोड़ा जाएगा। इन परियोजनाओं के लिए कुल सौ करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है जो एनजीएचएम के तहत नवउद्यम योजनाओं के लिए पहले से आबंटित सौ करोड़ रुपए के अतिरिक्त है। गौरतलब है एनजीएचएम का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग एवं निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है। इसका परिव्यय 19,744 करोड़ रुपए है। साथ ही इसका लक्ष्य 125 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, आठ लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश और छह लाख से अधिक हरित रोजगार उत्पन्न करना भी है। रोजगारपरक होने की वजह से इस क्षेत्र में रोजगार की बेहतर संभावनाएं हैं। इसलिए सरकार इस क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है।
ऊर्जा जरूरतों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार हाइड्रोजन सहित सौर ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा या पवन ऊर्जा को बढ़ावा देने में जुटी है, इनसे आने वाले वक्त में कई क्षेत्र में ऊर्जा की कमी से कार्यों में आने वाली रुकावटों से निजात मिलेगी। इससे सबसे बड़ा फायदा पर्यावरणीय समस्याओं से निजात पाने में दिखाई देगा। देश के बड़े शहरों, नगरों और कस्बों में कार्बन और धूल प्रदूषण से बीमारियों सहित होने वाली तमाम परेशानियों से लोग बचेंगे। इससे अरबों रुपए बचेंगे। साथ ही साथ हड्डी, मस्तिष्क, रक्त, आंत, आंख और सांस आदि से ताल्लुक रखने वाली बीमारियों में कमी आएगी और औसत उम्र में वृद्धि भी होगी।