27-01-2023 (Important News Clippings)

27 Jan 2023
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Open Sesame

BharOS makes it possible to break the stranglehold of Android. It requires support

TOI Editorials

A technology incubation ecosystem in IIT-Madras has developed a mobile phone operating system (OS) with the help of GoI funding. Named BharOS, it represents an important milestone in India’s technological evolution. An OS is a software that runs the phone. BharOS is the second big attempt by GoI-funded scientists to crack open the OS market. Last time, BOSS GNU/Linux was developed by C-DAC for desktops. Developing an OS is an impressive achievement. But commercialising it is perhaps harder because of the business model driving Big Tech.

Google’s Android OS, the dominant software among smartphones, runs more than 3 billion handsets. Most potential competitors such as BharOS are referred to as ‘Android Forks’ as they are modified versions of Android. The source code for Android is free which leads to development of forks. Though forks are a potential threat, they have not displaced Android because of the business model underpinning the rest of the OS ecosystem. An antitrust investigation by the European Commission explained why. In smartphones, application programming interfaces (APIs), which allow different software programmes to communicate, are of critical importance to app developers. Through its proprietary APIs and agreements with handset manufacturers, Google has made it very tough for fork developers to gain commercial viability.

China was a notable exception even though its ecosystem developed on forks. However, when Chinese manufacturers such as Huawei went international, they had no alternative but to be a part of the Google ecosystem. Where does that leave BharOS? There are two things going for it. One, the capture of private data by the Android OS model, which has catalysed demand for alternatives. Two, strategic security needs require a parallel system. BharOS comes as a No Default Apps system which means preloading is not possible. It also has automatic updates, which weave in the latest security patches and bug fixes.

At the moment, BharOS is targeting closed user groups and is working with government and strategic agencies. Its features suit these organisations as they require an OS which protects transmission of sensitive information. Commercialisation, however, may not achieve scale unless the regulators across the world find effective ways of prising open the OS ecosystem. That process has gathered momentum. For the moment, however, BharOS represents a milestone that can gain traction because of a large domestic market.


Make Rural Health Jobs More Alluring

ET Editorials

Rural Health Statistics 2021-22 presents a dismal picture of India’s state of healthcare. Community healthcare centres (CHC) have a staggering paucity of medical staff — 83% shortage of surgeons, 82% of paediatricians and 79% of general physicians. Operation theatres, X-ray facilities and laboratories remainnon-functional as required facilities and personnel are missing for the most part. This is truly a scandal in a country aiming first-world credentials one day. A functioning healthcare system requires infrastructure and facilities, qualified personnel — doctors, nurses, support staff — and regular medical supplies. On each count, the rural health system fails spectacularly. If India is serious about reaping the demographic dividend, it must invest in building and maintaining a robust healthcare system in the much patronised ‘Bharat’ tracts of India.

The three-tier system — health sub-centres (SC), primary healthcare centres (PHC) and CHCs — is characterised by paucity and absenteeism. Ensuring that each level of healthcare is staffed will require providing incentives, making it a condition of admission, or a requirement to access freeships and scholarships. All SCs and PHCs have a general practitioner, auxiliary nurse/midwife and healthcare worker. But even on paper, these are understaffed.

More funds, though necessary, are not sufficient alone to fix the problem. A functioning system with strong accountabilities is required to ensure appointed medical staff actually do their job. Fixing this extreme rural-urban disparity will require incentives to get doctors, nurses and technical staff to sign up. A programme that gives a 4-5-year employment contract to young medical graduates and newly retired health practitioners could get healthcare staff to serve in rural areas. Getting teaching hospitals in districts to serve the rural centres is another nudge.


न्याय की परिधि


देश भर में अदालतों पर मुकदमों के बोझ को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। अनेक सुझाव भी सामने आते रहे हैं कि न्यायाधीशों की नियुक्त से लेकर मुकदमों को निपटाने के लिए आधुनिक तकनीकी व्यवस्था जैसे उपायों के जरिए इस समस्या की जटिलता को कम किया जा सकता है। हालांकि आए दिन न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में अलग-अलग कारणों से बहस चलती रहती है। लेकिन सरकार और न्यायपालिका के बीच अब तक कोई ऐसी सहमति नहीं बन सकी है, जिससे इस गंभीर समस्या का हल निकल सके। अब एक बार फिर कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने मुकदमों के अंबार को लेकर चिंता जाहिर करते हुए इसके समाधान के लिए ठोस कदम उठाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि देश की विभिन्न अदालतों में करीब चार करोड़ नब्बे लाख मामले लंबित हैं और ऐसे में सरकार और न्यायपालिका को साथ मिल कर काम करना होगा, ताकि तेज गति से न्याय हो सके। इस संदर्भ में उन्होंने प्रौद्योगिकी की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि कानून मंत्री की फिक्र न्यायिक क्षेत्र में एक जटिल हो चुकी समस्या को संबोधित है और इसके समाधान के लिए अब केवल चिंता जाहिर करने से आगे सार्थक पहल करने की जरूरत है। सवाल है कि दशकों से यह समस्या अब तक क्यों कायम है! आखिर हमारी न्याय व्यवस्था किस पद्धति, तंत्र और सीमा के तहत काम कर रही है कि मामलों के बोझ से उपजी मुश्किल और जटिल होती गई है? यह बेवजह नहीं है कि मुकदमों पर सुनवाई साल-दर-साल खिंचती रहती है और इस तरह न्याय की उम्मीद भी अपना महत्त्व खोती जाती है। इस संदर्भ में एक मशहूर उक्ति है और खुद कानून मंत्री ने भी यह माना है कि लंबित मामलों का मतलब न्याय में देरी है; न्याय में देरी का अर्थ न्याय से इनकार है। सरकार से लेकर न्यायपालिका में सभी स्तरों पर इस हकीकत से परिचित होने के बावजूद ऐसे किसी हल तक पहुंचना जरूरी क्यों नहीं लगता जो न्यायपालिका और न्याय पर भरोसे को मजबूत करे!

न्यायालयों की कमी को दूर करने के साथ-साथ न्यायाधीशों के खाली पड़े पदों पर नियुक्ति और इसकी प्रक्रिया को लेकर एक सर्वमान्य हल तक पहुंचना एक प्राथमिक जरूरत है। लेकिन इस संबंध में अन्य विकल्पों पर विचार करना भी वक्त का तकाजा है। मसलन, क्या आधुनिक तकनीकी या प्रौद्योगिकी के सहारे कोई ऐसा तंत्र बनाया जा सकता है या इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे मुकदमों के बोझ को कम करने में मदद मिले? विधि आयोग की एक रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की गई थी प्रति दस लाख की आबादी पर कम से कम पचास न्यायाधीशों की जरूरत है। हकीकत यह है कि इतनी आबादी पर सिर्फ सत्रह न्यायाधीश हैं। यह बेवजह नहीं है कि इतनी बड़ी आबादी के बीच आए दिन अदालतों में आने वाले मुकदमे में वक्त पर इंसाफ मिलना तो दूर, सुनवाई के लिए भी लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। मुकदमों में कमी लाने के लिए लोक अदालतों का सहारा लेना एक विकल्प जरूर है, लेकिन सवाल है कि न्याय की गुणवत्ता के मद्देनजर कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती है तो इस माध्यम से कितनी मदद मिल सकती है! फिलहाल मुकदमों की प्रकृति के मुताबिक उन्हें वर्गों में बांट कर एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत उन्हें निपटाने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन दीर्घकालिक हल के लिए न केवल लंबित मामलों में कमी लाने, बल्कि अदालतों में रोज आने वाले मुकदमों को निपटाने के लिए एक सुचिंतित और व्यापक तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है।


पहाड़ों पर तबाही की सुरंगें

प्रमोद भार्गव

समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के लिए जल विद्युत संयंत्रों और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। इन योजनाओं के लिए हिमालयी क्षेत्र में रेल चलाने और छोटी नदियों को बड़ी नदियों में मिलाने के लिए सुरंगें बनाई जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं में जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। इस आधुनिक औद्योगिक विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय दरकने लगा है, जिन पर हजारों सालों से बसे लोग अपनी ज्ञान-परंपरा के बूते जीवन-यापन और वहां रहने वाले जीव-जगत की भी रक्षा करते चले आ रहे हैं। अथर्ववेद के ‘पृथ्वी-सूक्त’ में अनेक प्रार्थनाएं हैं। यह सूक्त राष्ट्रीय अवधारणा और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को विकसित, पोषित और फलित करने के लिए मनुष्य को नीति और धर्म से बांधने की कोशिश करता है। मगर हमने विकास के बहाने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट कर दिया। जोशीमठ इसी अनियोजित विकास की परिणति है।

जब हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र ने धरती को हिलाकर नाजुक बना दिया और घरों में दरारें पड़ने के साथ आधारतल घंस रहा है, तब लोगों को जीवन-रक्षा से जुड़ी सच्चाइयों को क्यों छिपाया जा रहा है? स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद हठपूर्वक पर्यावरण के विपरीत जिन विकास योजनाओं को चुना है, उनके चलते अगर लोग अपने गांव और आजीविका के साधनों को खो रहे हैं, तो ऐसी परियोजनाएं किसलिए और किसके लिए? अब रेल और बिजली के विकास से जुड़ी कंपनियां दावा कर रही हैं कि धरती निर्माणाधीन परियोजनाओं से नहीं धंस रही है, लेकिन किन कारणों से धंस रही है, इसका उनके पास कोई उत्तर नहीं है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन, जो इस क्षेत्र में तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है, उसकी बिजली उत्पादक कंपनी ने पत्र लिखकर दावा किया है कि इस क्षेत्र की जमीन धंसने में उसकी परियोजनाओं की कोई भूमिका नहीं है।

उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहयोगी नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ रुपए की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ काटने के बाद पहाड़ों को निर्ममता से छलनी किया जा रहा है। नदियों पर बांध निर्माण के लिए गहरे गड्ढे खोदकर खंभे और दीवारें खड़ी की जाती हैं। कई जगह सुरंगे बनाकर पानी की धार को संयंत्र के पंखों पर डालने के उपाय किए गए हैं। इन गड्ढों और सुरंगों की खुदाई में ड्रिल मशीनों से जो कंपन होता है, वह पहाड़ की परतों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन, तेज बारिश के चलते पहाड़ों के ढहने और हिमखंडों के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में बढ़ जाती हैं।

हिमालय में अनेक रेल परियोजनाएं भी निर्माणाधीन हैं। सबसे बड़ी रेल परियोजना उत्तराखंड के चार जिलों (टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली) को जोड़ेगी, जिससे तीस से ज्यादा गांवों को विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। छह हजार परिवार विस्थापन के दायरे में आ गए हैं। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल परियोजना सवा सौ किमी लंबी है। इसके लिए सबसे लंबी सुरंग देवप्रयाग से जनासू तक बनाई जा रही है, जो 14.8 किमी लंबी है। केवल इसी सुरंग का निर्माण बोरिंग मशीन से किया जा रहा है। बाकी पंद्रह सुरंगों में ड्रिल तकनीक से बारूद लगाकर विस्फोट किए जा रहे हैं। इस परियोजना का दूसरा चरण कर्णप्रयाग से जोशीमठ के बजाय अब पीपलकोठी तक होगा। हिमालय की ठोस और कठोर अंदरूनी सतहों में ये विस्फोट दरारें पैदा करके पेड़ों की जड़ें भी हिला रहे हैं। अन्य जिलों के श्रीनगर, मलेथा, गौचर ग्रामों के नीचे से सुरंगें निकाली जा रही हैं। इनमें किए जा रहे धमाकों से घरों में दरारें आ गई हैं। हिमालय की अलकनंदा नदी घाटी ज्यादा संवेदनशील है। रेल परियोजनाएं इसी नदी से सटे पहाड़ों के नीचे और ऊपर निर्माणाधीन हैं।

दरअसल, उत्तराखंड का मानचित्र बीते डेढ़ दशक में तेजी से बदला है। चौबीस हजार करोड़ रुपए की ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना ने जहां विकास और बदलाव की ऊंची छलांग लगाई है, वहीं इन योजनाओं ने खतरों की नई सुरंगें भी खोल दी है। उत्तराखंड के सबसे बड़े पहाड़ी शहर श्रीनगर के नीचे से भी सुरंग निकल रही है। नतीजतन, धमाकों के चलते डेढ़ से ज्यादा घरों में दरारें आ गई हैं। पौड़ी जिले के मलेथा, लक्ष्मोली, स्वोत और देवली में 771 घरों में दरारें आ चुकी हैं। रेल परियोजनाओं के अलावा यहां बारह हजार करोड़ रुपए की लागत से बारहमासी मार्ग निर्माणाधीन हैं। इन मार्गों पर पुलों के निर्माण के लिए भी सुरंगें बनाई जा रही हैं, तो कहीं घाटियों के बीच पुल बनाने के लिए मजबूत आधार स्तंभ बनाए जा रहे हैं। हालांकि ये सड़कें सेना के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। सैनिकों का हिमालयी क्षेत्र में इन सड़कों के बन जाने से चीन की सीमा पर पहुंचना आसान हो गया है। लेकिन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिहाज से जो निर्माण किए जा रहे हैं, उन पर पुनर्विचार की जरूरत है।

हिमालय में हाल ही में केन-बेतवा नदी जोड़ अभियान की तर्ज पर उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया है, जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़कर बरसाती नदी में पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। अगर यह परियोजना सफल हो जाती है, तो पहली बार ऐसा होगा कि किसी बरसाती नदी में सीधे हिमालय का बर्फीला पानी बहेगा।

हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इस परियोजना की विशेषता है कि पहली बार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की एक नदी को कुमाऊं मंडल की नदी से जोड़कर बड़ी आबादी को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। यही नहीं, एक बड़े भू-भाग को सिंचाई के लिए भी पानी मिलेगा। ‘जल जीवन मिशन’ के अंतर्गत इस परियोजना पर काम किया जा रहा है।

मगर इस परियोजना में जिस सुरंग का निर्माण कर पानी नीचे लाया जाएगा, उसके निर्माण में हिमालय के शिखर-पहाड़ों को खोदकर सुरंगों और नालों का निर्माण किया जाएगा, उनके लिए ड्रिल मशीनों से पहाड़ों को छेदा और विस्फोट से पहाड़ों को शिथिल किया जाएगा। यह स्थिति हिमालयी पहाड़ों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा साबित हो सकती है। हिमालय के लिए बांधों के निर्माण पहले से ही खतरा बनकर कई मर्तबा बाढ़, भू-स्खलन और केदरनाथ जैसे प्रलय का कारण बन चुके हैं।

उत्तराखंड भूकंप के सबसे खतरनाक जोन-5 में आता है। कम तीव्रता के भूकंप यहां निरंतर आते रहते हैं। मानसून में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में भू-स्खलन, बादल फटने और बिजली गिरने की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बीते सात सालों में एक सौ तीस से ज्यादा बार छोटे भूकंप आए हैं। इन पहाड़ों पर जल विद्युत और रेल परियोजनाओं ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है। टिहरी पर बंधे बांध को रोकने के लिए तो लंबा अभियान चला था। पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक हिदायतें देते रहे हैं कि गंगा और उसकी सहायक नदियों की अविरल धारा बाधित हुई, तो गंगा तो अस्तित्व खोएगी ही, हिमालय की अन्य नदियां भी अस्तित्व के संकट से जूझेंगी। इसलिए जोशीमठ का भयावह जो मानचित्र अब दिखाई दे रहा है, वह और विस्तृत होता चला जाएगा।


संबंधों में नये आयाम


भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर आए मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल–सीसी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दोनों देशों के पारंपरिक द्विपक्षीय संबंधों को विस्तार देते हुए रणनीतिक साझेदार का दर्जा दिया है। इस दर्जे के बाद रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होंगे। भू–राजनैतिक दृष्टि से दोनों देशों के पारस्परिक संबंधों में यह एक नया आयाम जुड़ गया है। मोस्ट फेवर्ड़ नेशन के तहत दोनों देशों के बीच 1978 से ही द्विपक्षीय व्यापार समझौता चल रहा है। रणनीतिक साझेदारी के बाद दोनों देशों के बीच और आर्थिक और सुरक्षा संबंध और मजबूत होंगे। भारत और मिस्र के बीच द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग का पुराना इतिहास रहा है। भारत की आजादी के तीन दिन बाद ही दोनों देशों के बीच राजकीय संबंधों की शुरुआत हुई। करीब 7 दशक पहले पं. जवाहरलाल नेहरू ने एशिया की एकता को कायम करने के लिए 1955 में इंड़ोनेशिया के बांडंग में एक सम्मेलन आयोजित किया था‚ जिसमें एशिया और अफ्रीका के 24 देश शामिल हुए थे। इस सम्मेलन में मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्देल जमाल नासिर ने भी भाग लिया था। आगे चलकर पं. नेहरू ने युगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिफ टीटो और मिस्र के नेता नासिर के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी‚ पी.वी. नरसिंह राव‚ आई.के. गुजराल और मनमोहन सिंह मिस्र की यात्रा कर चुके हैं। इसी तरह मिस्र के भी कई राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आए हैं। वर्तमान राष्ट्रपति अल–सीसी को भारत सरकार ने इस बार गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था। उनकी इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच पांच समझौते हुए। दोनों देश रक्षा क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे। भारत ने स्वनिर्मित रक्षा उत्पादों के निर्यात के लिए मिस्र को एक बड़े बाजार के रूप में चिह्नित किया है‚ काहिरा भी नई दिल्ली से रक्षा उपकरण खरीदना चाहता है। आतंकवाद दोनों देशों की साझी समस्या है। इस चुनौती से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच चर्चा हुई। मिस्र वर्तमान समय में खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा है। उसे अपेक्षा है कि संकट में भारत उसका साथ देगा। भारत वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास रखता है। और मुश्किल घड़ी में सभी की मदद करता है।


अच्छी पहल


गणतंत्र दिवस इस वर्ष ऐसी खबर लेकर आया है, जिसे गणतंत्र का वास्तविक परिचायक माना जा सकता है। यह है न्याय के दरवाजे तक क्षेत्रीय भाषाओं की पहुंच | अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले क्षेत्रीय भाषाओं में भी सबको उपलब्ध होंगे। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने गणतंत्र दिवस से एक दिन पूर्व बुधवार को को उच्चतम न्यायालय की एक ऐसी सेवा शुरू करने की घोषणा की जो गणतंत्र दिवस से संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में न्यायालय फैसलों तक आम जनता की पहुंच शुरू कर देगी। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि शीर्ष अदालत बृहस्पतिवार को ई- एससीआर परियोजना के एक हिस्से का क्रियान्वयन शुरू करेगी, जिसके तहत अनुसूची में दर्ज कुछ भाषाओं में फैसलों तक निःशुल्क पहुंच उपलब्ध हो सकेगी। ई-एससीआर (परियोजना) में अभी तक करीब 34,000 निर्णय हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में 1,091 फैसले हैं, जिन्हें गणतंत्र दिवस से मुहैया कराया जाएगा। शीर्ष अदालत सभी अनुसूचित भाषाओं में निर्णय प्रदान करने ‘अभियान’ पर है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं हैं। इनमें असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली और डोगरी शामिल हैं। प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ दो जनवरी को इलेक्ट्रॉनिक सुप्रीम कोर्ट रिपोट्र्स (ई-एससीआर) परियोजना शुरू करने की घोषणा की थी, ताकि वकीलों, कानून के छात्रों और आम जनता को इसके लगभग 34,000 निर्णयों तक मुफ्त पहुंच प्रदान की जा सके। शीर्ष अदालत एनआईसी, पुणे की मदद से एक सर्च इंजन विकसित किया है, जिसमें ई- एससीआर के डेटाबेस में एक खोज तकनीक शामिल है। ई-एससीआर में खोज की सुविधा मुफ्त है । यह परियोजना एक अमूल्य संसाधन का निर्माण करेगी क्योंकि वर्ष 1950 में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना से लेकर आज तक के निर्णय ई – एससीआर और डिजिटल रिपॉजिटरी पर उपलब्ध होंगे। आम जनता अदालती कामकाज की भाषा को लेकर मुगलकाल से ही त्रस्त रही है। तब सारा कामकाज उर्दू और फारसी में ही होता था। अंग्रेजों के आने के बाद यह अंग्रेजी हो गई। सर्वोच्च न्यायालय से हो रही यह शुरूआत कालांतर में अदालती कामकाज को भी हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं तक लाने में मदद करेगी, ऐसी उम्मीद है।


नये भारत की दस्तक

हर्ष वर्धन श्रृंगला, ( लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं )

देशक्कीसवीं सदी के शुरु आती सालों में दुनिया में जो कुछ बड़ी हलचलें हुई हैं‚ नये घटनाक्रम सामने आए हैं‚ उनसे अंतरराष्ट्रीय संबंध और हैसियत का नया वर्ल्ड ऑर्डर तय हो रहा है। इस दौरान वैश्विक मंदी‚ उच्च महंगाई दर और ऊर्जा व खाद्य संकट का खतरा नया विस्तार पा रहा है। वैश्विक हालात ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के कदमों और क्लाइमेट एक्शन को खासा धीमा कर दिया है। दुनिया आज पहले से कहीं ज्यादा ध्रुवीकृत है। इसलिए इस बात की आश्वस्ति और मूल्यांकन महत्तवपूर्ण है कि भारत को अब समस्या–समाधानकर्ता और एजेंडा तय करने वाले राष्ट्र के तौर पर देखा जा रहा है। दुनिया के सामने भारत की यह छवि नई और तारीखी तौर पर खासी अहम है।

बात करें राष्ट्रों की बड़ी गोलबंदी और नई साझी सहमति की तो इस लिहाज से जी–20 का मंच बहुत बड़ा है। भारत को जी–20 अध्यक्षता संयोगवश ऐसे समय मिली है‚ जब वह दिसम्बर‚ 2022 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के अध्यक्ष और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के अध्यक्ष की जिम्मेवारी भी संभाल रहा है। गौरतलब है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति ने इसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भागीदारों‚ क्षेत्रीय वार्ताकारों और विकासशील दुनिया के साथ सार्थक जुड़ाव सुरक्षित करने का माहौल प्रदान किया है। भारत जी–7 में नियमित आमंत्रित सदस्य है‚ जिसमें प्रमुख विकसित राष्ट्र शामिल हैं। हम ब्रिक्स (ब्राजील‚ रूस‚ भारत‚ चीन‚ दक्षिण अफ्रीका) के भी सदस्य हैं‚ जिसमें प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत अमेरिका‚ जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड का भी हिस्सा है।

एससीओ से भी जुड़ा हुआ है‚ जिसमें रूस‚ चीन और मध्य एशियाई देश शामिल हैं। भारत ने क्षेत्रीय साझेदारों को प्रभावी ढंग से एक साथ जोड़ने का काम भी किया है‚ जैसा कि हाल में यूरोपीय संघ‚ अफ्रीकी संघ‚ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ और मध्य एशियाई राज्यों के साथ हुईं शिखरस्तरीय बैठकों में स्पष्ट हुआ है। बात करें जी–20 की तो उत्तर–दक्षिण से लेकर पूर्व–पश्चिम तक विस्तारित विभाजन एवं मजबूत भू–राजनीतिक ध्रुवीकरण को देखते हुए भारत की अध्यक्षता में कठिन चुनौतियों के साथ ही असाधारण अपेक्षाएं भी शामिल हैं। इन चुनौतियों के बावजूद जो इस क्षण को अद्वितीय बनाता है‚ वह है कि दुनिया इन विभाजनों को पाटने की भारत की क्षमता और कौशल के बारे में पहले से कहीं अधिक आश्वस्त है। इसे प्रधानमंत्री मोदी ने ‘आरोग्यकर‚ आशा और सद्भाव की अध्यक्षता’ कहा है। जी–20 के मंच और इसकी सदारत पर दुनिया की निगाहें टिकी हैं। दिसम्बर के पहले हफ्ते में उदयपुर में भारत की अध्यक्षता में आयोजित पहली शेरपा बैठक में भारत की भूमिका धारणा स्पष्ट देखने को मिली। सदस्य देशों के शेरपाओं ने न केवल भारत की समृद्ध संस्कृति‚ बल्कि देश के डिजिटल और तकनीकी कौशल को भी महसूस किया। स्वाभाविक तौर पर यह मंच अंतरराष्ट्रीय समुदाय भू–राजनीतिक और व्यापक आर्थिक स्तरों पर अनिश्चितताओं को दूर करने के लिए विश्वसनीय उपायों की तलाश करेगा। जी–20 विशिष्ट रूप से ऐसा मंच है‚ जो विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की प्राथमिकताओं को सामने रखने में सहायक है।

गौरतलब है कि जी–7 और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद‚ दोनों ही उस विश्व व्यवस्था की याद दिलाते हैं‚ जो दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद दिखी थी। दूसरी ओर‚ जी–20 अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ जी–7 को समान भागीदार के तौर पर एक मंच पर लेकर आया है। यह अन्य प्रमुख देशों के साथ पी–5 को भी साथ लाया है। इसके अलावा‚ जी–20 प्रक्रिया में आमंत्रितों के रूप में अफ्रीकी संघ‚ नेपैड और आसियान जैसे अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संगठनों की नियमित भागीदारी इसे समावेशी और प्रतिनिधि दोनों बनाती है। बड़ी बात यह है कि अतीत में इस समूह ने वैश्विक महत्व के मुद्दों पर बेहतर परिणाम दिए हैं। कोविड–19 से पैदा हुए संकट के बाद विकासशील देशों के लिए ऋण–निलंबन पहल और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए समान कर व्यवस्था पर सहमत होने के इसके हालिया निर्णयों को अच्छी तरह से अपनाया गया है। हालांकि‚ इसकी सफलताओं के बीच कुछ मतभेदों की संभावना भी बनती है‚ और रूस–यूक्रेन संघर्ष के दौरान हमने यह देखा है। यहां जो बात अलग से समझने की है‚ वह यह कि दुनिया जिन तनावों और अनिश्चितताओं का सामना कर रही है‚ उनके लिए दूरदर्शी नेतृत्व और राजकीय कौशल जैसे गुणों की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री मोदी के न्यू इंडिया ने हमारे देश को कोविड–19 महामारी से उबारा है‚ और भारत को वैश्विक परिदृश्य पर उज्ज्वल स्थान में बदल दिया है। यह एक लचीला भारत है‚ जिसने बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के लिए वापसी की है। यह ऐसा भारत भी है‚ जिसने सबसे कठिन समय में वैश्विक भलाई के लिए अपने संसाधनों और क्षमताओं को साझा करने में संकोच नहीं किया। पीएम मोदी के दृष्टि कोण के तहत भारत की विदेश नीति वसुधैव कुटुम्बकम के हमारे प्राचीन दर्शन ‘विश्व एक साझा भविष्य वाला एक परिवार है’‚ को ध्यान में रखते हुए वैश्विक भलाई के लिए काम करने को लेकर प्रेरित है। महामारी से निपटने के लिए मार्च‚ 2020 में सऊदी अरब द्वारा बुलाई गई जी 20 शिखर बैठक में पीएम मोदी ने ‘जन–केंद्रित वैश्वीकरण’ का आह्वान किया था। इस व्यापक दृष्टि को ध्यान में रखते हुए भारत का प्रयास विश्व स्तर पर योगदान करने के लिए अपनी घरेलू ताकत और उपलब्धियों का लाभ उठाने का रहा है।

स्वाभाविक तौर पर नई चुनौतियों और उम्मीदों के बीच ध्रुवीकरण और तकनीकी संतुलन से बंटी दुनिया में भारत सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा कि आने वाले वर्षों में विश्व में समृद्ध एवं समावेशी समाज के साथ एक न्यायसंगत प्रणाली हो। भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है‚ जिसके पास मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स‚ मजबूत सार्वजनिक वित्त और मजबूत विनिर्माण और निर्यात वृद्धि है। यह शीर्ष एफडीआई गंतव्य है। नवाचार के स्रोत के रूप में डिजिटल स्पेस में अपनी ताकत का प्रदर्शन करने वाला सबसे बड़ा स्मार्टफोन डेटा कंज्यूमर और वैश्विक फिनटेक को अपनाने वाला देश है।

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