24-11-2025 (Important News Clippings)

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24 Nov 2025
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Date: 24-11-25

A Reset That Wants India to Really Work

New codes to boost mobility, spur growth

ET Editorial

The four new labour codes, which were made effective last week, subsume a patchwork of legislation over the decades and address four principal concerns of workers: working conditions, wages, social security and dispute resolution. Employers are offered easier compliance and improved industrial relations. This comprehensive overhaul should, if implemented with resolve, address some of the chronic rigidities in India’s labour market that have suppressed productivity.

Implementation is, however, unlikely to be uniform because states are involved. Yet competition for investment will provide the impetus to bring uniformity in labour regulation. In that sense, a critical piece of economic reform should be able to take hold countrywide without widespread opposition. It is a welcome step by GoI to push through incremental factor market reform that should increase India’s growth potential.

The attempt is to universalise labour regulation to blur the distinction between workers employed in the organised and informal economies. This is done through the extension of social security, minimum wages and workplace condition requirements to the overwhelmingly large portion of the workforce that was denied these benefits. This created entry barriers into organised employment, which on its part discouraged labour mobility. Wages remained low with consequent effects on productivity.

Industrial growth is affected by compliance that creates a perverse incentive for employers to fly below the radar. This limits India’s ambition of becoming a global manufacturing base. Although the new framework is not a radical departure from the legacy system, it attempts to improve outcomes through inclusion, which makes it politically palatable, and raises the odds of success.

The changes have been long in the making and the approach has more cooperative federalism built into it. GoI has faced setbacks in attempts to reform other factor markets such as land. Labour reforms are informed by these experiences, and GoI deserves credit for its perseverance. A well functioning labour market not only speeds up growth but it also helps stitch together universal social security.


Date: 24-11-25

आत्मनिर्भर भारत के लिए श्रम सुधार

डॉ. मनसुख मांडविया, ( लेखक केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्यक्रम और खेल मंत्री हैं )

कई दशकों तक भारत कमजोर आर्थिक विकास, भ्रष्टाचार और रोजगार सृजन एवं श्रमिक कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता के अभाव से जूझता रहा। राजनीतिक उद्देश्यों से होने वाले घेराव और बंदी ने औद्योगिक गतिविधियों को बाधित किया, निवेश को रोका और व्यवस्था में भरोसा तोड़ा। इस जड़ता को तोड़ने के लिए देश के नेतृत्व में बड़ा बदलाव जरूरी था। तब लाल किले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘श्रमेव जयते’ का आह्वान किया और कहा कि भारत की विकास यात्रा के केंद्र में श्रम की गरिमा यानी मजदूरों का सम्मान होना चाहिए। यह एक नारा ही नहीं था, बल्कि एक नए राष्ट्रीय सोच का आरंभ था, जिसमें नीतियां बनाते समय श्रमिकों को केंद्र में रखा गया।

भारत के अधिकांश श्रम कानून 1920 से 1950 के बीच बने थे और उनमें औपनिवेशिक सोच की झलक दिखती थी। जबकि दुनिया में काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। गिग और प्लेटफार्म आर्थिकी का बढ़ना, डिजिटल कामकाज, लचीली कार्य संरचनाएं और नए प्रकार के उद्यम तेजी से उभर रहे थे, लेकिन भारत के पुराने श्रम कानून समय के साथ नहीं बदले और आधुनिक कार्यबल या प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे थे। एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पंच प्रण के माध्यम से यह संदेश दिया कि हमें औपनिवेशिक मानसिकता छोड़कर भविष्य की जरूरतों के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। पुराने कानून इसलिए नहीं बने रहे, क्योंकि वे अच्छे थे। वे इसलिए बने रहे, क्योंकि पिछली सरकारों में उन्हें बदलने का राजनीतिक साहस, इच्छा शक्ति और दूरदृष्टि की कमी थी।

ऐसी राष्ट्रीय आवश्यकता को समझते हुए मोदी सरकार ने भारत के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक को लागू किया। पूर्व के 29 बिखरे हुए श्रम कानूनों को मिलाकर चार सरल और स्पष्ट श्रम संहिताएं बनाई गई हैं। वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता एवं व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता। 21 नवंबर से ये संहिताएं लागू भी हो गईं। ये संहिताएं एक आधुनिक श्रम ढांचा स्थापित करती हैं, जो श्रमिक-हितैषी और विकास समर्थक हैं। यह दर्शाता है कि भारत अब तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की मांगों को पूरा करने के लिए तैयार है। सभी क्षेत्रों के स्टेकहोल्डर्स ने एक पुरानी पड़ चुकी श्रम प्रणाली से आगे बढ़ने की आवश्यकता को पहचाना है। श्रमिकों और उद्योग जगत के दिग्गजों के साथ संवाद में यही सामने आया कि कार्यस्थल पर स्पष्टता, निष्पक्षता और सम्मान की आवश्यकता श्रम संहिता के मूल में होनी चाहिए। इसी मार्गदर्शक सिद्धांत ने हमारे सुधारों को आकार दिया है। इस सुधार ने पूर्व के जटिल और छितरे हुए तंत्र को ऐसे सिस्टम से बदल दिया है जो सरल, पारदर्शी और हर श्रमिक की सुरक्षा करने वाला है।

श्रम संहिताएं अपने मूल स्वरूप में नियोक्ताओं की अपेक्षाओं को संतुलित करते हुए श्रमिकों के हितों को प्राथमिकता देती हैं। वे निवारक स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देती हैं और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करती हैं। ये संहिताएं आडियो-विजुअल श्रमिकों और गिग तथा प्लेटफार्म श्रमिकों को औपचारिक मान्यता प्रदान करती हैं। ये अखिल भारतीय ईएसआइसी कवरेज को सक्षम बनाती हैं। 40 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी श्रमिकों के लिए वार्षिक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य करती हैं। इनमें वे बागान श्रमिक भी शामिल हैं, जो पहले इसके दायरे में नहीं आते थे। ये राज्यों में असमानताओं को कम करने के लिए सभी श्रमिकों के लिए वैधानिक न्यूनतम वेतन की गारंटी देती हैं। अनिवार्य नियुक्ति पत्र, पे स्लिप और सवेतन वार्षिक अवकाश जैसे प्रविधान हर श्रमिक को अधिक स्थिरता, सम्मान और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

कांट्रैक्ट आधारित रोजगार के एक प्रगतिशील विकल्प के रूप में संहिताओं में फिक्स्ड टर्म एंप्लायमेंट (एफटीई) यानी निश्चित अवधि के रोजगार की शुरुआत की गई है। एफटीई के तहत एक निश्चित अवधि के लिए नियोजित श्रमिकों को स्थायी कर्मचारियों के समान ही वेतन, लाभ और काम करने की स्थितियां प्राप्त होती हैं, जिनमें सवेतन अवकाश, काम के तय घंटे, चिकित्सा सुविधाएं, सामाजिक सुरक्षा और अन्य वैधानिक सुरक्षाएं शामिल हैं। विशेष रूप से एफटीई कर्मचारी केवल एक वर्ष की निरंतर सेवा के बाद ही ग्रेच्युटी के लिए पात्र हो जाते हैं। संहिताएं आधुनिक कार्यस्थलों की वास्तविकताओं को भी स्वीकार करती हैं। यदि कोई कर्मचारी स्वेच्छा से मानक घंटों से अधिक काम करना चुनता है तो उसे ओवरटाइम के लिए नार्मल सैलरी रेट से दोगुना पैसा मिलना चाहिए, जिससे हर परिस्थिति में निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।

नारी शक्ति इन सुधारों का एक केंद्रीय स्तंभ है। प्रधानमंत्री मोदी के महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास के दृष्टिकोण से निर्देशित ये संहिताएं महिलाओं के लिए विभिन्न क्षेत्रों में शामिल होने के नई राहें खोलती हैं, जिनमें अंडरग्राउंड खदानों, भारी मशीनरी और नाइट शिफ्ट में काम करना शामिल हैं। यह तभी संभव है जब इस पर उनकी सहमति हो और मजबूत सुरक्षा प्रोटोकाल लागू हों। संहिताएं सिंगल रजिस्ट्रेशन, सिंगल लाइसेंस और सिंगल रिटर्न फाइलिंग की शुरुआत करके नियोक्ताओं पर अनुपालन के बोझ को काफी कम करती हैं। यह सुगमता उद्योगों को पूरे भारत में अपनी यूनिट्स का विस्तार करने और स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करेगा, जिससे स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

ये श्रम संहिताएं भारत के आत्मनिर्भर और विकसित भारत बनने की राह में एक बड़ा बदलाव लाने वाला पड़ाव हैं। ये श्रमिक की गरिमा बनाए रखती हैं, औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करती हैं और ऐसा माडल बनाती हैं जहां श्रमिकों के अधिकार और सम्मान की रक्षा होती है। प्रधानमंत्री मोदी के विजन और सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के प्रति प्रतिबद्धता से निर्देशित ये श्रम सुधार एक आधुनिक, लचीली और समावेशी अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव रखने के साथ ही श्रमिकों और उद्यमों दोनों को भारत के विकास के केंद्र में रखते हैं।


Date: 24-11-25

श्रम संहिताओं का क्रियान्वयन

संपादकीय

केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह उन चार श्रम संहिताओं को लागू कर दिया जो देश के श्रम बाजार नियमन को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई हैं। इसी समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार संहिताएं उन विशिष्ट प्रावधानों के लिए लागू हो गई हैं जहां आगे नियम निर्माण की आवश्यकता नहीं है। चूंकि मसौदा नियम कुछ वर्ष पहले तैयार किए गए थे, इसलिए सरकार नई वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए इनमें कुछ परिवर्तन करेगी। मशविरे के लिए संशोधित मसौदा नियम प्रस्तुत किए जाने की उम्मीद है। संशोधित नियम अधिसूचित होने के बाद संहिता पूरी तरह लागू हो जाएंगी।

वेतन संहिता (2019), औद्योगिक संबंध संहिता (2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियां संहिता (2020) के रूप में इन चार संहिताओं का क्रियान्वयन हाल के वर्षों के सबसे बड़े सुधारों में से एक होगा। पुराने श्रम कानून और विनियमों को विशेषकर विनिर्माण क्षेत्र में टिकाऊ उच्च वृद्धि के सबसे बड़े अवरोधों में से एक माना जाता है।

कंपनियों के नजरिये से श्रम संहिताओं का क्रियान्वयन अनुपालन लागत को कम करने और नियुक्तियों को पहले से अधिक लचीला बनाने वाला साबित हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कर्मचारियों की छंटनी, पुनर्गठन आदि की सीमा को पहले के 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिक कर दिया गया है। इसके साथ ही राज्यों को इस सीमा को और बढ़ाने के प्रावधान भी किए गए हैं। श्रम बाजार भी अधिक औपचारिक बन जाएगा। उदाहरण के लिए सभी कामगारों को नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य होगा। लिखित अनुबंध से पारदर्शिता बढ़ेगी। वेतन संहिता 2019 के तहत सभी कामगारों को न्यूनतम वेतन का अधिकार होगा और उद्यमों से समय पर वेतन भुगतान की अपेक्षा की जाएगी।

इस संदर्भ में यह महत्त्वपूर्ण होगा कि न्यूनतम वेतन का निर्धारण कामगारों और व्यवसायों दोनों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाए। सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए है, क्योंकि पहली बार उन्हें सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत कानूनी मान्यता मिली है। इसके अतिरिक्त, कामगारों को आधार से जुड़ी सार्वभौमिक खाता संख्या मिलेगी, जिससे राज्यों के बीच आवागमन पर भी समान लाभ मिल सकेगा। यह हमारे देश में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आंतरिक प्रवासन बढ़ रहा है।

केंद्र सरकार से उम्मीद होगी कि वह मसौदा नियम प्रकाशित करे और उन्हें समय पर अधिसूचित करे, वहीं राज्यों ने अहम पहल कर दी हैं। एक हालिया विश्लेषण बताता है कि 16 राज्य सरकारों ने वर्ष2025 में 38 सुधारों को अंजाम दिया और इनमें से 37 फीसदी श्रम सुधार हैं। उदाहरण के लिए महिलाओं को रात की पाली में काम करने की इजाजत देना, रोजाना के काम की अवधि को 10 से 12 घंटे तक बढ़ाना, ओवरटाइम की सीमा बढ़ाना या छोटे प्रतिष्ठानों के लिए दस्तावेजीकरण की आवश्यकता कम करना। श्रम संहिताओं के लागू होने के साथ, राज्य निवेश आकर्षित करने के लिए अधिक अनुकूल नियम बना सकेंगे।

हालांकि, इस सुधार की अपनी एक लागत है, खासतौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए। सामाजिक सुरक्षा कवरेज के विस्तार और अन्य अनिवार्य आवश्यकताओं से एमएसएमई का व्यय बढ़ेगा और यह उन उद्यमों के लिए विशेष रूप से कठिन हो सकता है जो कम लाभांश पर काम कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अनुपालन लागत में तेज कमी के साथ संहिताएं एमएसएमई क्षेत्र को लाभ पहुंचाएंगी। डिलिवरी प्लेटफॉर्म्स के लिए भी लागत बढ़ सकती है, जबकि उनमें से अधिकांश पहले से ही घाटे में चल रहे हैं।

व्यापक नीतिगत स्तर पर हालिया प्रस्तावित राष्ट्रीय श्रम एवं रोजगार नीति, श्रम शक्ति नीति ने सामाजिक सुरक्षा, औपचारिकीकरण और समावेशी वृद्धि के उन्हीं लक्ष्यों को रेखांकित किया है। बहरहाल, व्यवस्था में निरंतर सुधार की आवश्यकता होगी। खासतौर पर काम की तेजी से बदलती प्रकृति को देखते हुए। इसके लिए राज्य सरकारों सहित सरकार को निरंतर कारोबारी जगत और श्रम बाजारों के साथ काम करना होगा। भारतीय श्रम बाजार मोटे तौर पर असंगठित इसलिए भी रहा है क्योंकि कठोर श्रम कानून कंपनियों को लोगों को काम पर रखने, बड़े पैमाने पर काम करने तथा वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने से रोकते हैं। नई श्रम संहिताएं आर्थिक वृद्धि पर असर कम करेंगी और रोजगार तैयार करने में मददगार होंगी।


Date: 24-11-25

हादसा और सबक

संपादकीय

भारत रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर युद्ध के जो नए आयाम उभर कर सामने आ रहे हैं, उस लिहाज से रक्षा साजो- सामान का अपने देश में निर्माण और उनका उन्नयन बेहद जरूरी हो गया है। स्वदेशी एवं बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान तेजस का निर्माण भारत की इसी सोच और इच्छाशक्ति का परिणाम है। इसे देश की रक्षा तकनीक की ताकत का प्रतीक भी माना जाता है। मगर भारतीय वायुसेना में शामिल इस विमान का दुबई में आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान शुक्रवार को हादसे का शिकार हो जाने की घटना ने रक्षा क्षेत्र में देश की आत्मनिर्भरता की राह में चिंता की लकीरें खींच दी हैं। इस हादसे को इसलिए भी चिंताजनक दृष्टि से देखा जा रहा है, क्योंकि दो वर्ष के इतिहास में यह दूसरी बार है जब तेजस दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। इससे पहले मार्च 2024 में राजस्थान के जैसलमेर में भारतीय सेनाओं के एक त्रि-सेवा अभ्यास के दौरान यह लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। तब शुरुआती जांच में विमान के इंजन में तकनीकी खराबी की ओर इशारा किया गया था।

जहां तक रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बात है तो भारत पिछले ‘कुछ’ वर्षों से स्वदेशी रक्षा उत्पादन के मामले में एक नए केंद्र के रूप में उभर रहा है। देश में आत्मनिर्भरता एक मार्गदर्शक सिद्धांत रहा है, जिसने स्थानीय डिजाइन, विकास और विनिर्माण को प्राथमिकता देने वाली नीतियों को प्रेरित किया है। सरकारी सुधारों, रणनीतिक निवेश और औद्योगिक साझेदारियों ने नवाचार को बढ़ावा देकर घरेलू रक्षा क्षमताओं को मजबूत किया है। भारत ने स्वदेशी रक्षा प्रणाली आकाशतीर, ब्रह्मोस मिसाइल और लड़ाकू विमान तेजस जैसे रक्षा उकपरणों को तैयार कर दुनिया को अपनी तकनीक एवं उसकी शक्ति का परिचय दिया है। आपरेशन सिंदूर के दौरान देश की इस आधुनिक रक्षा प्रणाली ने अपनी क्षमता को बखूबी दर्ज किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत का रक्षा निर्यात वर्ष 2013-14 में 686 करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 23,622 करोड़ रुपए हो गया है। यह तस्वीर आत्मनिर्भर और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी रक्षा उद्योग के लिए देश के निरंतर एवं गहन प्रयासों को रेखांकित करती है।

करीब दो दशक के विकास और परीक्षण के बाद लड़ाकू विमान तेजस को बेहद सुरक्षित माना जाता रहा है। इसका निर्माण वर्ष 2007 में शुरू हुआ था और जुलाई, 2016 में भारतीय वायुसेना ने तेजस का पहला बेड़ा बनाया । हल्के किस्म के इस विमान का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड ने किया है। इसका ढांचा कार्बन फाइबर से बना हुआ है, जो इसे धातु की तुलना में बहुत हल्का और मजबूत बनाता है। इसके भीतर सेंसर तरंग रडार लगा है, जो दुश्मन के विमान से लेकर जमीन से हवा में दागी गई मिसाइल का भी पता लगा सकता है। यानी यह दुश्मन से खुद की सुरक्षा करने में भी सक्षम है। तेजस एमके-1 का उन्नत संस्करण भी जल्द तैयार होने वाला है, जो हवा से हवा में और हवा से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों तथा एंटी रेडिएशन मिसाइल रूद्रम-2 से लैस होगा। ऐसे में तेजस की उन तकनीकी कमियों का पूरी सटीकता से पता लगाना और उन्हें दुरुस्त करना बेहद जरूरी है, जो दो बार हादसों का कारण बनी हैं। तभी यह विमान पूरी तरह सुरक्षित एवं मजबूत रक्षा ढाल बन पाएगा।


Date: 24-11-25

नशे के जाल में उलझती युवा पीढ़ी

सुरेश सेठ

देश में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ऐसी समस्याएं हैं, जिनका समाधान हमें नजर नहीं आता। अब स्थिति यह है कि इसका हल निकालने के बजाय रेवड़ियां बांटी जा रही हैं। यहां सब चलता है, यह भाव तब और तीक्ष्ण हो जाता है, जब हम देखते हैं कि युवा पीढ़ी जो देश की शक्ति है, वह नशे की अंधेरी दुनिया में गुम हो रही है। ऐसे में न केवल देश, बल्कि नई पीढ़ी भी जोखिम में है। अगर इस पर गंभीरता से न सोचा गया, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। पिछले दिनों पंजाब सरकार की ओर से एक आदेश में कहा गया कि किसी भी व्यक्ति को पांच से अधिक नशा मुक्ति केंद्र खोलने की इजाजत नहीं होगी।

दरअसल, नशा मुक्ति केंद्र ही अन्य प्रकार का नशा फैलाने वाले स्थल बनते जा रहे हैं। नशा छुड़ाने वाली गोलियों की लत भी नौजवानों को ऐसे लग जाती है कि वे उसी पर निर्भर होने लगते हैं। जैसे वे कभी चिट्टे और हेरोइन की लत के शिकार थे। नतीजा यह कि कई नशा मुक्ति केंद्र अब संदेह के घेरे में हैं। नशा छोड़ने के इच्छुक नौजवानों में दवा की जो गोलियां मुफ्त बांटी जाती हैं, अमूमन उसी की उन्हें लत लग जाती है। बाद में यही दवा उन्हें महंगे दामों में बेची जाती है। इस पैसे से दूसरे लोग अपने लिए चिट्टा जैसा नशीला पदार्थ खरीदते हैं। इस तरह चिट्टे से लेकर नशा छुड़ाने वाली दवा का एक ऐसा कुचक्र बन गया है, जिसे तोड़ना आसान नहीं है।

सवाल है कि जब बाड़ ही खेत को खाने लगे, तो उसका रखवाला कौन होगा। जब इस नशाखोरी की तह में जाते हैं, तो पता चलता कि कई दवा विक्रेता भी इस षड्यंत्र में संलिप्त हैं। इन्हीं से सांठगांठ कर युवा दवाइयां खरीद कर लाते हैं और फिर दस गुना ज्यादा दाम पर नश से ग्रस्त लोगों को बेच देते हैं। यानी यह एक अलग तरह का गोरखधंधा शुरू हो गया है। इस धंधे में जुटे युवा आमतौर पर सरकारी अस्पताल और नशा मुक्ति केंद्रों के आसपास मंडराते रहते हैं। हैरानी की बात यह है कि नशा मुक्ति अभियान चलाने वाली पुलिस की नजर इस अवैध धंधे पर क्यों नहीं जाती है! जबकि यह उतना ही खतरनाक है जितना परंपरागत नशे की तस्करी कर बेचने का धंधा । यह काला कारोबार बड़े पैमाने पर फैल चुका है और बड़ी मछलियों पर कभी कोई हाथ नहीं डालता। दवा के नाम पर नशे का जो ये धंधा चल रहा है, इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। नशा मुक्ति के नाम पर युवाओं को नशे की गर्त में धकेला जा रहा है।

नशे के कई रूप हैं। अभी एक सबक केरल से मिला है। वहां डिजिटल तरीके से नशे के एक नए रूप का पता चला है। इसमें नौजवानों से लेकर उम्रदराज लोग तक शामिल हैं। यह एक नई ‘डिजिटल लत’ है। आनलाइन ऐसे खेल शुरू किए गए हैं, जिनमें एक रात में वारे-न्यारे करने की बात होती है। शुरू-शुरू में इन खेलों का प्रचार करने के लिए बड़ी हस्तियों को लाया गया। मगर जब बात खुली तो उन पर कानूनी शिकंजा कसा गया। बेशक आनलाइन शिक्षा के जरिए विद्यार्थियों के पास पढ़ाई का कारगर विकल्प है। अभिभावक समझते हैं कि बच्चे आनलाइन पढ़ाई में व्यस्त हैं। मगर बच्चे तो ऐसे आभासी खेलों में लगे हुए हैं कि जिसमें वारे न्यारे तो कम होते हैं, उल्टे इसमें सब गंवाने के बाद वे अवसाद में चले जाते हैं। अब तो आत्महत्या की खबरें भी आने लगी हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। केरल पूर्ण शिक्षित राज्यों में से एक है।

वहां डिजिटल साक्षरता भी स्वाभाविक रूप से ज्यादा है। मगर वहां भी स्थिति बिगड़ रही है। ऐसा नहीं कि ऐसी खबरें दिल्ली या पंजाब से नहीं आतीं, लेकिन केरल में बड़े पैमाने पर डिजिटल लत बढ़ रही है। मनोवैज्ञानिक जब इस लत के शिकार बच्चों से बात करते हैं, तो उन्हें उबारने में कोई ज्यादा सफलता नहीं मिल पाती है। क्योंकि एक सप्ताह में काफी पैसे मिलने का लोभ उन पर बुरी तरह हावी रहता है। ऐसे में इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि इस जाल को किस तरह तोड़ा जाए। यह डिजिटल खेल नशे की लत की तरह गहरा होता है। इसके लिए ‘इंटरनेट एडिक्शन टेस्ट’ जरूरी है। इस लत के स्तर का पता कर इससे ग्रस्त युवाओं को रचनात्मक विकल्प देकर उन्हें उबारने की कोशिश की जा सकती है।

किसी के लिए यह कहना कि वह डिजिटल नशे का शिकार हो गया है, बहुत कठिन है। हर व्यक्ति मोबाइल या इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है। भारत की डिजिटल ताकत पर सरकार भी गर्व करती है। अब इसी ताकत के बूते हम 5जी से 6 जी की यात्रा तय कर रहे हैं। इसके साथ ही कृत्रिम मेधा की नई दुनिया भी नौजवानों के सामने खुल रही है। इस साइबर दुनिया में वे काले कारोबार की अंतरराष्ट्रीय मंडियों से भी जुड़ जाते हैं। फिर उनके लोभ की सीमा बढ़ जाती है। देश में अब यह डिजिटल लत एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। कैसे इन युवाओं को इस नशे की लत से बाहर निकाला जाए, यह एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि आभासी मंचों का जाल इस तरह से हमारे समाज में फैल गया है कि किसी को डिजिटल नशे से ग्रस्त कहना बहुत कठिन है।

दूसरी ओर, जब नौजवान कुछ खतरनाक खेलों को डिजिटल शक्ति के साथ खेलते हैं, तो प्रायः हार जाने पर अवसादग्रस्त हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसे युवा तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। ऐसे में हमें समस्या की तह में जाना होगा। केवल परंपरागत नशे को ही देश की युवा पीढ़ी को बर्बाद करने वाला मान लेना, यथार्थ से आंखें मूंद लेने जैसा है। लिहाजा नशे के हर रूप और उसके हर स्तर से देश को निपटना होगा। चिट्टे और हेरोइन से लेकर अवैध शराब तक, जिसकी भट्ठियां पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक लगी नजर आती हैं। यह तो खतरनाक है ही, लेकिन इससे भी अधिक खतरनाक है डिजिटल नशा । इससे बड़ी संख्या में युवा प्रभावित हो रहे हैं।

माता-पिता बच्चे की आनलाइन पढ़ाई पर भरोसा कर लेते हैं और दूसरी ओर बच्चे अपनी बर्बादी की राह पर चल रहे होते हैं। उन्हें लगता है कि पढ़ने-लिखने की अब क्या जरूरत, जब वे इन डिजिटल खेलों से अपनी जेबें भर सकते हैं केरल ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से लिया है। वहां कुछ केंद्र भी बनाए गए हैं। असल में पढ़ाई और इंटरनेट के इस्तेमाल में संतुलन बहुत जरूरी है। इस संतुलन के लिए बच्चों के साथ अभिभावकों का भी मार्गदर्शन आवश्यक है। इसको लेकर केंद्र और राज्य सरकारों को एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। ऐसे नशा मुक्ति केंद्र खोलने चाहिए जहां डिजिटल खेल से सभी को आगाह किया जाए, युवाओं को असलियत समझाई जाए। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इस समस्या के बेकाबू होने से युवा पीढ़ी को बचाना और कठिन हो जाएगा।


Date: 24-11-25

कॉप-30 का संदेश

संपादकीय

ब्राजील के बेलेम में जब शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन ( कॉप-30) का परदा गिरा, तो यही उम्मीद जताई गई कि बेहतर भविष्य के लिए सभी देश मिलकर काम करेंगे, मगर इस सम्मेलन का हासिल बता रहा है कि यह इतना आसान भी नहीं है। विशेषकर सम्मेलन के आखिरी दिन जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने को लेकर जिस तरह की खींचतान होती रही, वह दुनिया को बहुत आश्वस्त करने वाली नहीं थी। हालात यहां तक बिगड़े कि इससे जुड़ी जिस वैश्विक योजना का जिक्र पहले ड्राफ्ट में किया गया था, उसे संशोधित ड्राफ्ट से हटा लिया गया। साफ है, जीवाश्म ईंधन का पेच आगे भी फंसा रहने वाला है। इस सम्मेलन की शुरुआत 11 नवंबर को हुई थी और माना जा रहा था कि तमाम देश ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के विरुद्ध किसी ठोस नतीजे पर पहुंच जाएंगे। मगर यह सम्मेलन जिस गति से अपने आखिरी मुकाम तक पहुंचा, उसके लिए नौ दिन में अढ़ाई कोस चलने से बेहतर विशेषण नहीं दिया जा सकता।

कॉप-30 से इसलिए अधिक उम्मीदें बांधी जा रही थीं, क्योंकि पेरिस समझौते को इस साल दस वर्ष हो गए। दुनिया आज कितनी गंभीर जलवायु चुनौतियों से जूझ रही है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। फिर भी ज्यादातर देश वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और 1.5 डिग्री के लक्ष्य को लेकर उदासीन दिख रहे हैं। नतीजतन, बढ़ता कार्बन उत्सर्जन और असह्य तापमान मानव अस्तित्व की परीक्षा लेने लगे हैं। निस्संदेह, इसके पीछे एक बड़ी वजह विकसित देशों का अपनी प्रतिबद्धता पर खरा न उतरना है, जिसकी ओर हमारे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी इशारा किया है। सम्मेलन में भारत का पक्ष रखते हुए उन्होंने साफ कहा कि विकसित देशों को तय अवधि से पहले ‘नेट-जीरो’ लक्ष्य तक पहुंचना चाहिए। यह बिल्कुल जायज मांग है, क्योंकि विकसित देशों ने ज्यादा कार्बन उत्सर्जन किया है, अतिरिक्त जिम्मेदारी भी उनको लेनी चाहिए। यहां वे भारत से सबक ले सकते हैं, जो अपने विकास कार्यक्रमों और पर्यावरण संरक्षण पहल को साथ-साथ आगे बढ़ा रहा है। इसी का नतीजा है कि साल 2005 से भारत के कार्बन उत्सर्जन में 36 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है और कुल विद्युत उत्पादन क्षमता में गैर- जीवाश्म स्रोतों का योगदान 50 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है। माना यह भी जा रहा है कि 2070 की समय सीमा से पहले ही यह नेट- जीरो का लक्ष्य हासिल कर लेगा। हां, एनडीसी बेशक इस सम्मेलन में एक मुद्दा रहा, लेकिन भारत की तरफ से यह आश्वस्त किया गया है कि संशोधित एनडीसी 2035 तक समय पर घोषित कर दी जाएगी, साथ ही पहली द्विवार्षिक पारदर्शिता रिपोर्ट भी जारी कर दी जाएगी।

कॉप-30 सम्मेलन मूलतः तीन सवालों के इर्द-गिर्द घूमता रहा- देश क्लाइमेट एक्शन को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं; तकनीक व पैसे उन देशों व लोगों तक कैसे पहुंच सकते हैं, जिनको इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है, और तीसरा, किस तरह जलवायु कार्रवाई समग्रता में की जा सकती है? यह जानते हुए भी कि वक्त अब काफी कम है और पेरिस समझौते को जमीन पर उतारना निहायत जरूरी है, विकासशील देशों के हितों को महत्व देना अनिवार्य हो गया है। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि इस संकट में उनका सबसे कम योगदान है, पर सबसे अधिक खामियाजा वही भुगत रहे हैं। लिहाजा, नजरें अब कॉप-31 पर टिक गई हैं। उम्मीद यही है कि वहां से शायद अच्छी खबर मिले।