23-10-2025 (Important News Clippings)
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Date: 23-10-25
Different Old Story
India’s growing numbers of elderly need a supply of rules-bound professional caregivers. That’s not happening.
TOI Editorials

The import of a Bombay HC verdict, in a case on proper care arrangement for an elderly person, will resonate in homes across the country. HC made two daughters of a 75-year-old man legal guardians as he is incapable of making informed decisions concerning himself or his treatment, given multiple chronic medical and psychiatric conditions. He was uncooperative when it came to psychological testing. Ageing is difficult. In several chronic conditions, especially neurological, and punishing disorders like schizophrenia, and as a side-effect of certain essential medicines, patients suffer perceived persecution by family. Care-giving in such situations can be challenging, affecting a family’s mental well-being too.
Per a UNFPA study, population of people aged 80+ years will grow at a rate of around 279% between 2022 and 2050. Incidence of Alzheimer’s, Parkinson’s etc is rapidly increasing. Millions of elderly may suffer from dementia well before 2050. Are we prepared? No, but not for want of programmes for elderly on paper – almost 30 central schemes alone across ministries. Implementation is poor, as is awareness among elderly. And trained support staff, as well as legal and commercial rules for this work, is almost totally missing. Elder care treatment can be prohibitively costly; demand for trained care as per patient’s and household’s needs far outstrips supply. Risk of geriatric psychiatric disorders rapidly increases with age. Coupled with trends in longevity, this means more senior citizens will suffer longer years of declining quality of life. It is a terrifying reality.
Almost a quarter of the elderly population, 23%, according to UNFPA, suffer two or more chronic conditions. Keep in mind 40-42% of people aged 45+ live with undiagnosed diabetes. A Niti Aayog paper last year noted 78% of elderly live without any pension, one in three senior citizens reported depressive symptoms, 32% had low life satisfaction. UNFPA found almost 19% have no income. There’s no dearth of data/ reports on what needs done. The problem is in doing it.
अमेरिका से मिली वीसा राहत का संदेश समझें
संपादकीय
यह दौर टेक-ब्रेन (तकनीकी ज्ञान) का है। ट्रम्प को वीसा नीति तक बदलनी पड़ी। वे समझ गए कि अमेरिका को भले ही भारतीय कोडर्स नहीं चाहिए, लेकिन एआई- इंजीनियर्स ओर डोमेन एक्सपर्ट्स को छोड़ना संभव नहीं । यह सच है कि भारत ही नहीं, अमेरिका की भी कई कंपनियां कम वेतन पर एच-1बी वीसा के सहारे टेक वर्कफोर्स में भारतीय इंजीनियर्स को अपने यहां काम देती थीं, जिससे अमेरिकी युवाओं को रोजगार की किल्लत हो गई थी। लेकिन वीसा – फी एक लाख डॉलर करने के बाद यूएस में भारतीय कंपनियों ने भी अमेरिकी युवाओं को लेना शुरू कर दिया है। नए वीसा नियम से अच्छी टेक तालीम पाए भारतीय छात्र अब बिना बढ़ी वीसा फी के वहां के वर्क- वीसा एच-1बी पर काम पा सकेंगे। अगर ट्रम्प के लिए भारतीय टेक-ब्रेन को रोकना मजबूरी है तो क्या स्वदेश में उन्हें ऐसा ऑफर देकर आकर्षित नहीं किया जा सकता? भारत सरकार ने यह करना शुरू किया है। अमेरिका में कार्यरत टेक-ज्ञान वाले शिक्षकों, शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों को भारत आने का न्योता दिया जा रहा है। यह सच है कि जिस तरह से ट्रम्प ने विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों के फंड्स रोककर उनकी अकादमिक स्वायत्तता छीनी है, इस वर्ग में गुस्सा और निराशा है। ऐसे में भारतीयों को वापस बुलाकर आईआईटी और अन्य शोध संस्थानों में वही माहौल देने का एक अभियान शुरू हुआ है। लेकिन क्या शिक्षा पद्धति पर वैचारिकता थोपने वाला सिस्टम उन्हें मुक्त वातावरण देने का भरोसा दे सकेगा ?
अंतिम सांसें लेता माओवाद
आरके विज, ( लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी हैं )
माओवादियों के सोच में यह बदलाव अचानक नहीं आया। अगस्त 2024 में माओवादियों के पोलित ब्यूरो ने पार्टी को बचाने के लिए सुरक्षात्मक तरीके अपनाने का निर्णय लिया था। सभी बड़े दलों और कंपनियों को छोटे टुकड़ों में बांटकर सुरक्षा बलों से बचने के प्रयास माओवादी लगातार कर रहे थे। इसके बावजूद सुरक्षा बलों के अभियानों से वे सिकुड़ते जा रहे थे। मई 2025 में पार्टी महासचिव बसवराजू अपनी मिलिट्री कंपनी के साथ नारायणपुर जिले में हुई मुठभेड़ में मारा गया। इसके बाद केंद्रीय कमेटी का सदस्य माडेम बालकृष्ण गरियाबंद में और रामचंद्र रेड्डी एवं कोसा भी मारे गए। कई माओवादियों ने विगत दिनों तेलंगाना में आत्मसमर्पण किया। इनमें पूर्व माओवादी किशन जी की पत्नी पद्मावती उर्फ सुजाता, चंदू, विकास आदि शामिल हैं। लगातार नए सुरक्षा कैंप स्थापित कर पुलिस को आगे बढ़ते हुए देखकर माओवादी सरगना समझ चुके हैं कि जो लड़ाई उन्होंने 1980 में दंडकारण्य में शुरू की थी, वह किसी भी हालत में जीत नहीं सकते। इसलिए बेहतर है कि आत्मसमर्पण कर अहिंसा का रास्ता अपनाया जाए। बावजूद इसके, सोनू और रुपेश ने कहा है कि वे आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
बदली हुई स्थिति में सरकार के दो कर्तव्य महत्वपूर्ण हैं। पहला यह कि क्षेत्र का समुचित विकास हो और दूसरे आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों का समुचित पुनर्वास। सरकार को चाहिए कि वह ऐसी समस्त सामाजिक असमानताओं को दूर करने का प्रयास करे, जिन्हें आधार बनाकर माओवादियों ने ग्रामीणों में पैठ बनाई थी। विकास की योजना ‘नियाद नेलानार’ (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाओं का विस्तार केवल सुरक्षा कैंपों की पांच किलोमीटर की परिधि तक सीमित न रखते हुए ऐसे पूरे इलाकों में कर दें, जहां माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं। शिक्षा के आश्रम बनाने, स्वास्थ्य सेवा के लिए अस्पताल या डिस्पेंसरी बनाने की योजनाओं को शीघ्र मूर्त रूप देना होगा, क्योंकि आदिवासियों के लिए वनोपज जीवन का एक महत्वपूर्ण साधन है। उनके उचित दाम एवं उनकी प्रोसेसिंग के लिए कुछ योजनाएं लागू करने पर भी विचार करना होगा। सड़कों का निर्माण और मोबाइल टावर्स भी लगाए जाएं। ऐसे विकास कार्यों को क्रियान्वित करने में यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो। सरकार यह निगरानी भी करे कि आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों को पुनर्वास नीति का लाभ शीघ्र मिले। उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण देकर रोजगार के साधन उपलब्ध कराने होंगे। यह सब करने के बाद भी उन इलाकों पर सुरक्षा बलों को नजर बनाए रखनी होगी, जहां माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार बसवराजू के मरने के बाद माओवादी अपने नए महासचिव का चुनाव नहीं कर पाए हैं। दंडकारण्य के नए सचिव का भी चुनाव नहीं हुआ है। यही कारण है कि केंद्रीय कमेटी एकजुट होकर कोई निर्णय नहीं ले पा रही है और सभी डिवीजन अपनी-अपनी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर युद्धविराम की घोषणाएं कर रही हैं। हालांकि तेलंगाना स्टेट कमेटी ने युद्ध जारी रखने की बात कही है, परंतु वह न केवल स्वयं कमजोर स्थिति में है, बल्कि उसके बड़े सदस्य भी राज्य से बाहर शरण लिए हुए हैं। पूर्व महासचिव गणपति, केंद्रीय कमेटी सदस्य संग्राम, गणेशन्ना, हेमंत बिसरा आदि की तरफ से भी कोई बयान जारी नहीं हुआ है।
अभी पूरी माओवादी पार्टी नेतृत्वविहीन है तो भारत सरकार अगले वर्ष 31 मार्च तक माओवादियों के उन्मूलन को लेकर प्रतिबद्ध है। गृह मंत्रालय के अनुसार देश में माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या घटकर 11 रह गई है, जिनमें से केवल तीन जिले ही अत्यंत प्रभावित हैं। इन 11 जिलों में से सात छत्तीसगढ़ के हैं। इनमें नारायणपुर और कांकेर में लगभग समस्त माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। गरियाबंद जिले के माओवादियों ने भी आत्मसमर्पण की बात कही है। कुछ क्षेत्रों को छोड़कर दंडकारण्य के लगभग सभी माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। अब केवल माओवादियों के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के प्रमुख देवजी के अलावा, मिलिट्री बटालियन का प्रमुख माडवी हिड़मा और दंडकारण्य कमेटी के कुछ सदस्य शेष हैं, जो शायद अभी आत्मसमर्पण करने या युद्ध जारी करने को लेकर असमंजस में हैं। संभव है कि वे भी सोनू और रूपेश की तरह परिस्थितियों को देखते हुए जल्द ही मुख्यधारा में शामिल होने का फैसला करें। अगर ऐसा नहीं होता तो भी माओवादी पार्टी केवल एक औपचारिकता ही बनकर रह जाएगी।
Date: 23-10-25
बदलती श्रम शक्ति
संपादकीय
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की मसौदा राष्ट्रीय श्रम नीति यानी श्रम शक्ति नीति सही इरादों वाली प्रतीत होती है। इसका लक्ष्य एक निष्पक्ष, समावेशी और भविष्य की दृष्टि से तैयार व्यवस्था बनाने की है जहां हर श्रमिक फिर चाहे वह औपचारिक क्षेत्र का हो, असंगठित क्षेत्र का या गिग वर्कर, उसकी गरिमा का ध्यान रखा जा सके और उसे जरूरी संरक्षण और अवसर प्रदान किए जा सकें। मंत्रालय की भूमिका को ‘रोजगार को बढ़ावा देने वाले’ के रूप में पुनर्परिभाषित किया गया है। इसके तहत डिजिटल साधन और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से श्रमिकों और नियोक्ताओं से संपर्क करना और संस्थानों को अबाध प्रशिक्षण मुहैया कराना शामिल है। इसमें इस बात को भी स्वीकार किया गया है कि भारत का श्रम बाजार ढांचागत बदलाव से गुजर रहा है और यह बदलाव डिजिटलीकरण, हरित बदलाव और गिग वर्क तथा प्लेटफॉर्म वर्क जैसे नए तरह के कामों की बदौलत आया है। इतना ही नहीं राष्ट्रीय करियर सेवा (एनसीएस) का विस्तार रोजगार के लिए एक डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना के रूप में करने की कोशिश भी यह दिखाती है कि एक डेटा आधारित और श्रमिक केंद्रित नीति बनाने का प्रयास है ताकि सूचना की विसंगति की खाई को पाटा जा सके।
श्रम बाजार में बदलावों की बात करें तो विश्व बैंक द्वारा जारी ‘साउथ एशिया डेवलपमेंट अपडेट’(अक्टूबर, 2025) इस बात की एक जटिल तस्वीर पेश करती है कि कैसे एआई देश के श्रम परिदृश्य को बदल रही है। स्वचालन के कारण रोजगारों को क्षति पहुंचने की आशंका जहां सार्वजनिक बहस के केंद्र में है वहीं रिपोर्ट कहती है कि एआई का प्रभाव असमान हो सकता है। इससे उत्पादकता वृद्धि के अवसर भी मिल सकते हैं और समावेशन में चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। दक्षिण एशिया में केवल 7 फीसदी नौकरियां ऐसी हैं जिन्हें स्वचालन के कारण बहुत अधिक जोखिम है। बहरहाल, 15 फीसदी नौकरियां ऐसी हैं जहां इंसान और तकनीक साथ मिलकर उत्पादकता में सुधार कर सकते हैं। एआई से संबंधित नौकरियों में अन्य दफ्तरी नौकरियों की तुलना में वेतन करीब 30 फीसदी अधिक है। भारतीय कंपनियां अब बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग से नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग की ओर बढ़ रही हैं। इससे उच्च कौशल वाली नौकरियों के अवसर तो बन रहे हैं लेकिन शुरुआती स्तर की नौकरियों की उपलब्धता में कमी आ रही है।
इस बदलाव का लाभ उठाने के लिए श्रम शक्ति नीति का मसौदा कई हस्तक्षेपों का सुझाव देता है ताकि कौशल और अवसरों के बीच की खाई को पाटा जा सके। इसके लिए लक्षित कौशल और पुनर्कौशल कार्यक्रमों की आवश्यकता है। खासतौर पर कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा करना जरूरी है। प्रशिक्षण की आपूर्ति को श्रम की मांग से जोड़ा जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, मसौदा नीति एआई-सक्षम नौकरी मिलान, डिजिटल प्रमाणन, और युवाओं व महिलाओं के लिए उद्यमिता सहयोग को भी बढ़ावा देती है। इस संदर्भ में, जैसा कि इस समाचार पत्र ने हाल में रिपोर्ट किया था, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) कक्षा तीन से ही स्कूल पाठ्यक्रम में एआई को शामिल करने की योजना बना रहा है। साथ ही, विभिन्न विषयों में स्नातक कार्यक्रमों में एआई और डेटा विज्ञान को एकीकृत करने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि एआई के लिए तैयार कार्यबल का सृजन किया जा सके।
मसौदा रिपोर्ट में सार्वभौमिक और पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा, सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों के लिए सरलीकृत अनुपालन तथा पर्यावरण के अनुकूल तथा तकनीक सक्षम बदलावों का समर्थन आदि शामिल है। कुल मिलाकर ये उपाय एक दूरदर्शी ढांचा पेश करते हैं। बहरहाल, चुनौतियां भी सामने हैं। पहली, अनौपचारिकता का वर्चस्व सामाजिक सुरक्षा के क्रियान्वयन और अनुपालन निगरानी को जटिल बनाता है। दूसरी, लैंगिक असमानताएं बनी हुई हैं, जहां महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी अब भी कम है। तीसरी, केंद्र, राज्य और जिलों के बीच समन्वय यह तय करेगा कि सुधार कितनी तेजी से परिणामों में बदलते हैं। ध्यान रहे यह समन्वय आसान नहीं। यदि इसे सही ढंग से लागू किया जाए, तो श्रम शक्ति नीति श्रम बाजार की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। फिर भी, भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह बनी हुई है कि वह अपने विशाल और लगातार बढ़ते कार्य बल के लिए लाभकारी रोजगार के अवसर कैसे सृजित करे, साथ ही श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और व्यवसायों के लिए लचीलापन, इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखे।
समावेशी विकास की राह की मुश्किल
रवि शंकर
आजादी के कई दशक बाद भी भुखमरी खत्म नहीं हुई है। जबकि बीते करीब आठ दशक से देश इस समस्या को खत्म करने का प्रयास कर रहा है। फिर भी पूरी तरह सफलता नहीं मिली है। भले हम विकास के कितने भी दंभ भरें या यह कहें कि हमने तकनीक के मामले में कितनी सफलता हासिल कर ली है। मगर बहुत सारे लोगों के खाली पेट आज भी एक ऐसी सच्चाई है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। हालांकि भुखमरी की समस्या से केवल भारत ही नहीं जूझ रहा है, बल्कि दुनियाभर के लिए यह एक वैश्विक समस्या बन गई है। वैश्विक खाद्य संकट पर 2025 की एक रपट के मुताबिक, दुनिया में 29.5 करोड़ लोग आज भी ऐसे हालात में जी रहे हैं, जहां उनके लिए एक वक्त का खाना भी जुटा पाना मुश्किल है। यह विचारणीय है कि इक्कीसवीं सदी में भी करोड़ों लोग भूखे क्यों जीवन गुजारते हैं? जबकि हर दिन लगभग एक अरब थालियों के बराबर खाद्य सामग्री बर्बाद कर दी जाती है। यह एक सच्चाई है कि जब दुनिया तकनीक, अंतरिक्ष यात्रा और कृत्रिम मेधा (एआइ) के साथ नई ऊंचाइयों को छू रही है, तब भी करोड़ों लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा ।
वर्तमान समय में प्रत्येक देश विकास के पथ पर आगे बढ़ने का दावा करता है। अल्पविकसित देश विकासशील देश बनना चाहते हैं, तो वहीं विकासशील देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होना चाहते हैं। इसके लिए वहां की सरकारें प्रयास भी करती हैं और विकास के संदर्भ में अपनी उपलब्धियां गिनाती हैं। यहां तक कि विकास दर के आंकड़े से यह अनुमान लगाया जाता है कि कोई देश किस तरह विकास कर रहा है और कैसे आगे बढ़ रहा है। जब कोई ऐसा आंकड़ा सामने आ जाए जो यह बताए कि अभी तो देश ‘भूख’ जैसी समस्या को भी हल नहीं कर पाया है, तब विकास के आंकड़े सवालों के घेरे में लगते हैं। यह कैसा विकास है जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को भोजन भी उपलब्ध नहीं है। बड़ा सवाल है कि दुनिया में आधुनिक तकनीक एवं विज्ञान के सहारे जब भुखमरी के आंकड़े उजागर हो सकते हैं, तो ऐसी तकनीक क्यों नहीं विकसित होतीं जो भुखमरी को रोक सके। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मसले पर गहराई से नजर रखने वाली संस्थाओं, विशेषज्ञों और प्रौद्योगिकी सहित उच्च स्तर की कई व्यवस्था मौजूद हैं, तो इसके दूरगामी हल के लिए ठोस नीतियां क्यों नहीं तैयार हो पातीं ? क्यों नहीं भुखमरी पर नियंत्रण पाया जाता ? जाहिर है यह समस्या लगातार गंभीर होती गई है।
हम अब भी दुनिया को भुखमरी, खाद्य असुरक्षा और कुपोषण से छुटकारा दिलाने के लक्ष्य की दिशा में वांछित रफ्तार से काफी पीछे हैं। दुनिया में स्वस्थ आहार तक पहुंच भी एक गंभीर मुद्दा है, जो दुनिया की एक बड़ी आबादी को प्रभावित कर रहा है। साफ है, भूख की समस्या को पूरी तरह समाप्त करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। मगर गौर करने वाली बात यह है कि एक ओर घरों में रोज रात का बचा हुआ खाना बासी समझ कर सुबह फेंक दिया जाता है, तो वहीं दूसरी ओर लाखों लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है। दुनिया में पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थों में से करीब आधा हर वर्ष सड़ कर बेकार हो जाता है।
भारत में भी केंद्र और राज्य सरकारें खाद्य सुरक्षा के लिए तमाम योजनाएं चला रही हैं। मगर इनका पूरा लाभ गरीबों तक अब भी नहीं पहुंच पाता है। यही वजह है कि बड़े पैमाने पर लोगों को खाना नसीब नहीं हो रहा है। यह विडंबना ही है कि देश में अन्न का भंडार होने पर भी बड़ी संख्या में लोग भुखमरी के शिकार होते हैं। अगर इसके कारणों की पड़ताल करें, तो केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी, अकुशल नौकरशाही, भ्रष्ट तंत्र और भंडारण क्षमता के अभाव जैसे कारक सामने आते हैं। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है और सरकार इसका हल खोज पाने में असफल रही है । यह ऐसे देश की तस्वीर है जहां दुनिया के सबसे ज्यादा अमीर लोग रहते है, उनके पास इतना पैसा है कि पूरे देश में खुशहाली लाई जा सकती है, लेकिन गरीब जीने के लिए बुनियादी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर सकता है। फिर भी यहां भुखमरी और गरीबी पर गौर करना जरूरी नहीं समझा जाता। यही वजह है कि सरकार की तमाम नीतियां सवालों के घेरे में आ जाती हैं। यह सरकार के विकास के तौर- तरीकों पर भी सवाल है। यह वस्तुस्थिति आर्थिक प्रगति का दावा करने वाले अब तक के सभी सरकारी दावों पर सवाल खड़ा कर रही है। विकास के इस भयावह असंतुलन को दूर करने के लिए नीतियों और प्राथमिकता में बदलाव की जरूरत है। भारत की यह विरोधाभासी छवि सोचने पर बाध्य कर देती है।
देश में भुखमरी मिटाने पर जितना धन खर्च हुआ, वह कम नहीं है। केंद्र सरकार के प्रत्येक बजट का बड़ा हिस्सा आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए आबंटित किया जाता है, लेकिन अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं पड़ते। ऐसा लगता है कि प्रयासों में या तो प्रतिबद्धता नहीं है या उनकी दिशा ही गलत है। ऐसे में भारत जो वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने का सपना देख रहा है, उसे सबसे पहले भूख पर विजय प्राप्त करनी होगी। यह सुनिश्चित करना होगा कि देश में एक भी व्यक्ति भूखा नहीं सोए। साथ ही उससे जुड़े अन्य पहलुओं पर भी समान रूप से नजर रखी जाए। खाद्यान्न सुरक्षा तभी संभव है, जब सभी लोगों को पर्याप्त, सुरक्षित और पोषक तत्त्वों से युक्त खाद्यान्न मिले।
भूख आज भी दुनिया के सामने सबसे बड़ी समस्या है। इसकी व्यापकता हर साल नए आंकड़ों के साथ हमारे सामने आती है, जिससे पता चलता है कि विश्वभर में भूख की समस्या कितनी गंभीर है। ऐसा नहीं है कि दुनिया के कई देशों में इसके लिए जरूरी संसाधनों की कोई कमी है। समस्या इच्छाशक्ति और सबसे ज्यादा आर्थिक और राजनीतिक दृष्टिकोण की है। आज हर देश विकास के पथ पर आगे बढ़ने का दावा करता है। अल्पविकसित देश विकासशील देश बनना चाहते हैं, तो वहीं विकासशील देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होना चाहते हैं। इसके लिए उनकी सरकारें प्रयास भी करती हैं और विकास के संदर्भ में अपनी उपलब्धियां गिनाती हैं। यहां तक कि विकास दर के आंकड़े से अनुमान लगाया जाता है कि कोई देश किस तरह विकास कर रहा है और कैसे आगे बढ़ रहा है? ऐसे में जब कोई आंकड़ा यह बताए कि अभी तो देश ‘भूख’ जैसी समस्या को भी हल नहीं कर पाया है, तब विकास के आंकड़े सवालों के घेरे में लगते हैं । यह कैसा विकास है जिसमें लोगों को भोजन भी उपलब्ध नहीं है ?
मतदान-महादान : सफल लोकतंत्र की बुनियाद है मतदान
डॉ. नीतू कुमारी नवगीत
बिहार को लोकतंत्र की जननी माना जाता है। वज्जि संघ से जिस व्यवस्था की शुरुआत हुई, वह सारी दुनिया में शासन की सबसे विश्वसनीय व्यवस्था साबित हुई। बिहार एक बार फिर अपने सबसे मौलिक संवैधानिक अधिकार ‘मतदान के अधिकार’ का प्रयोग करने जा रहा है, जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत देश की विशिष्ट पहचान है। हर बार जब चुनाव होते है. चाहे संसद के हो, राज्य विधानसभा के हों या स्थानीय निकायों के लोकतंत्र की भागीदारी की ऊर्जा फिर से जीवंत हो उठती है।
जैसे-जैसे बिहार 2025 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है, राज्य के लोग एक निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। यह केवल सीटों की लड़ाई नहीं हैय बल्कि शासन, विकास और जन- जवाबदेही की दिशा तय करने का अवसर है। वह भी ऐसे राज्य में जो भारत के सबसे ऊर्जावान और युवा राज्यों में से एक है।
हमारे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में हर व्यक्ति का वोट अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की कई विधानसभा क्षेत्रों में जीत का अंतर कुछ सौ मतों का ही रहा है। हर नागरिक की भागीदारी से ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया निष्पक्ष, सशक्त और विश्वसनीय बनती है।
भारत के चुनाव आयोग ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 दो चरणों में संपन्न होंगे। पहले चरण में 121 विधानसभा क्षेत्रों में 6 नवंबर 2025 को, जबकि शेष 122 सीटों पर 11 नवंबर 2025 को मतदान होगा। यह महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया 14 नवंबर 2025 को संपन्न होगी। इस दौरान 7.4 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिलेगा, जिससे न केवल राज्य का भविष्य तय होगा बल्कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता और जीवंतता भी सुनिश्चित होगी।
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की सटीकता, पारदर्शिता और समावेशिता सुनिश्चित करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण किया है। यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक योग्य नागरिक, चाहे वह किसी भी लिंग, क्षेत्र या सामाजिक पृष्ठभूमि से हो, अपने मताधिकार का निष्पक्ष रूप से प्रयोग कर सकें। निर्वाचन आयोग की स्वीप आइकॉन के रूप में सभी मतदाताओं से मेरी अपील है कि वे मतदान दिवस से पहले वोटर हेल्पलाइन ऐप या नेशनल वोटर्स पोर्टल पर अपनी जानकारी अवश्य जांच लें।
मतदान में भागीदारी है भारतीय लोकतंत्र की धड़कन
भारत के लोकतंत्र की मजबूती केवल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या से नहीं, बल्कि उन लोगों की संख्या से मापी जाती है जो वास्तव में मतदान करने आते है। 2019 के आम चुनाव ऐतिहासिक रहे, क्योंकि उस समय भारत ने 67.4 प्रतिशत की दर से रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया था। वहीं 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में लगभग 57 प्रतिशत मतदान हुआ, जो उत्साहजनक और भविष्य में अधिक भागीदारी के संकेत देने वाला रहा।
मतदान केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक कर्तव्य भी है। यह केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। जब भी कोई नागरिक मतदान करने का निर्णय लेता है, वह लोकतांत्रिक भावना को दोहराता है और निर्णय प्रक्रिया में अपनी हिस्सेदारी निभाता है। इसके विपरीत, न डाला गया हर वोट एक गंवाया हुआ अवसर है। ऐसी आवाज जो उस व्यवस्था में कभी नहीं सुनी जाती, जो हर आवाज को सुनने के लिए बनी है!
हम सबको लोकतंत्र की मजबूती के लिए अपनी आवाज बुलंद करनी है।
एक वोट का महत्व बहुत अधिक है। भारत में कई बार ऐसे उदाहरण देखे गए है, जब कुछ ही वोटों ने पूरे निर्वाचन क्षेत्र का नतीजा बदल दिया और कई बार तो सरकार के गठन को भी प्रभावित किया।
कल्पना कीजिए, किसी निर्वाचन क्षेत्र में दो उम्मीदवारों के बीच केवल 200 वोटों का अंतर है। यही छोटा सा अंतर तय कर सकता है कि कौन उम्मीदवार जीतेगा, कौन-सी नीतियां लागू होंगी, और किस प्रकार की सरकार बनेगी। लोकतंत्र की असली ताकत उस एक परिवार या व्यक्ति में निहित है जो मतदान करने का निर्णय लेता है।
बिहार, अन्य भारतीय राज्यों की तरह, हाल के वर्षों में कड़े चुनावी मुकाबलों का साक्षी रहा है। यहां मतदाताओं की भागीदारी का सीधा प्रभाव विकास की प्राथमिकताओं, बजट आवंटन और स्थानीय विकास पर पड़ता है। यदि नागरिक बड़ी संख्या में मतदान करेंगे, तो यह सुनिश्चित होगा कि बनने वाली सरकार वास्तव में जनता की इच्छा को प्रतिबिंबित करे।
आपके लिए आपके मतदान का महत्व
मतदान केवल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर बटन दबा नहीं है, यह आपकी आवाज, चयन, और लोकतंत्र के प्रति आपकी प्रतिबद्धता की घोषणा है। हर वोट में यह ताकत होती है कि वह सरकार की दिशा और राष्ट्र के भविष्य को प्रभावित कर सके। यह सशक्तिकरण का प्रतीक है, क्योंकि हर वोट यह संदेश देता है कि हर नागरिक महत्वपूर्ण है। उसकी राय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कल्याण जैसी नीतियों को दिशा देती है । मतदान करके नागरिक महसूस करते है कि वे न केवल इस देश के मालिक है, बल्कि उसके निर्णयों में भागीदार भी है।
उत्तरदायित्व भी मतदान का स्वाभाविक परिणाम है, क्योंकि जब अधिक संख्या में नागरिक मतदान करते है, तो जनप्रतिनिधियों को यह अहसास रहता है कि उनके कार्यों और प्रदर्शन पर सजग और सक्रिय मतदाताओं की नजर है।
लोकतंत्र के मूल में मतदान एक समानता का कार्य है। मतदान लोकतंत्र की धड़कन है। यह हर नागरिक को चाहे वह किसी भी वर्ग, जाति या पृष्ठभूमि से हो, समान अधिकार देता है कि वह भविष्य की दिशा तय करने में समान रूप से भाग ले सके। उच्च मतदान की प्रतिशतता विकास की निरंतरता को बढ़ावा देता है, इसका मतलब यह है कि सरकार की नीतियाँ नागरिकों की चिंताओं और आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करती है, विशेषकर उन मुद्दों में जो उच्च प्राथमिकता के है, जैसे बुनियादी ढांचा, महिला सुरक्षा, शिक्षा, और रोजगार |
अंततः, मतदान की प्रक्रिया एक प्रभावी राष्ट्र-निर्माण का साधन है, जो लोकतंत्र को सुद्ध करती है, पारदर्शिता को बढ़ाती है और ऐसी शासन व्यवस्था निर्मित करती है जो वास्तव में भारतीय नागरिकों की सामूहिक इच्छा को दर्शाती है।
पीछे न छूटे कोई मतदाता
चुनाव आयोग के सतत प्रयासों के माध्यम से मतदान सभी नागरिकों के लिए सुलभ और समावेशी बन गया है। आयोग अपने प्रमुख कार्यक्रम सिस्टमेटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन (एसवीईईपी) के जरिए जागरूकता पैदा करता है कि लोकतंत्र में सभी मतदाताओं द्वारा मतदान और भागीदारी करना कितना कार्यस्थल और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचता है। आवश्यक है। यह अभियान स्कूल, कॉलेज, पहली बार वोट करने वाले मतदाताओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया जाता है और युवा पीढ़ी को यह समझने में मदद की जाती है कि देश के भविष्य में किस प्रकार योगदान दे सकते है। इसी तरह, महिला मतदाताओं को सुरक्षित, आत्मविश्वासी और सशक्त महसूस कराने पर जोर दिया जाता है, ताकि वे बिना किसी रोक-टोक के मतदान कर सकें।
आयोग विकलांग नागरिकों के लिए भी समावेशिता सुनिश्चित करता है, जैसे कि मतदान केंद्रों पर रैप की व्यवस्था, ब्रेल से सुसज्जित ईवीएम, और डाक मतपत्र उपलब्ध कराना । वरिष्ठ नागरिकों के लिए कुछ विशेष परिस्थितियों में घर पर मतदान की सुविधा भी प्रदान की जा रही है, ताकि प्रक्रिया आसान हो सके। इन सभी पहलों का मूल लक्ष्य सरल लेकिन शक्तिशाली है. कोई मतदाता पीछे न छूटे।
युवा मतदाता, बड़ी ताकत – बिहार का भविष्य
भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी युवा आबादी है। भारत की कुल आबादी में से 65 प्रतिशत से अधिक लोग 35 वर्ष से कम आयु के है, और बिहार भारत के सबसे युवा राज्यों में से एक है। युवा मतदाता परिवर्तन, नवाचार और जीवंतता के प्रेरक होते है। युवा नीति निर्धारण की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाते है, जो उनके जीवन को प्रभावित करती है. चाहे वह शिक्षा सुधार हो, रोजगार के अवसर, जलवायु परिवर्तन, या डिजिटलीकरण प्रत्येक छात्र मतदाता भी लोकतंत्र को अधिक जिम्मेदार और बेहतर बनाने योगदान देता है।
जागरूक और नैतिक मतदान की शक्ति
लोकतंत्र केवल भागीदारी से नहीं, बल्कि सूचित भागीदारी से फलता-फूलता है। मतदाताओं को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि वे मतदान से पहले उम्मीदवारों, उनकी योग्यताओं और घोषणापत्रों की जानकारी प्राप्त करें।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है मतदान की नैतिकता. मतदान बिना किसी पक्षपात, प्रलोभन या दबाव के किया जाना चाहिए। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हर नागरिक की ईमानदारी पर निर्भर करता है। जब मतदाता सचेत और जागरूक होकर अपने अधिकारों नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मूल्य बन जाता है। का प्रयोग करते है, तब लोकतंत्र केवल एक प्रक्रिया नहीं , बल्कि राष्ट्रीय मूल्य बन जाता है।
मतदान दिवस : लोकतंत्र का उत्सव
भारत में सभी चुनावों को लोकतंत्र का उत्सव कहा क्योंकि नागरिक अपने भविष्य के बारे में निर्णय ले रहे गया है। यह जनता की सामूहिक इच्छा का उत्सव है, क्योंकि नागरिक अपने भविष्य के बारे में निर्णय ले रहे होते है।
मतदान दिवस पर करोड़ों मतदाता, मतदान अधिकारी, सुरक्षा कर्मचारी और स्वयंसेवक मिलकर सुचारू, पारदर्शी और सुरक्षित चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। राजस्थान के रेगिस्तान से लेकर बिहार के गाँवों तक, हर मतदान केंद्र लोकतांत्रिक भारत की एक मिसाल बन जाता है।
चुनाव आयोग निष्पक्ष, समावेशी और पारदर्शी मतदान प्रक्रिया का उपयोग करता है, जो भारत में चुनावी प्रक्रियाओं में वैश्विक विश्वास को भी पुनः पुष्टि करता है।
मतदान राष्ट्र के प्रति कर्तव्य
मतदान केवल एक अधिकार नहीं है, बल्कि अपने समुदाय और अपने राष्ट्र के प्रति एक कर्तव्य भी है। हर नागरिक के मतदान करने से लोकतंत्र की नींव और मजबूत होती है।
इतनी बड़ी संख्या में आपकी भागीदारी यह मजबूत संदेश देती है कि भारत में लोकतंत्र मृत, कमजोर या निष्क्रिय नहीं है। अपने मित्रों, परिवार और सहकर्मियों को मतदान के लिए प्रेरित करके, आप उस आंदोलन में शामिल हो रहे है जो लोकतंत्र को सजीव औरसमावेशी बनाए रखता है।
एक राष्ट्र, एक आवाज, एक वोट
भारत का लोकतंत्र अपनी विशालता, पारदर्शिता और समावेशिता के कारण पूरी दुनिया में सराहा गया है। इसकी असली ताकत इसके नागरिकों की भागीदारी में निहित है।
जैसे-जैसे बिहार अपने 2025 विधानसभा चुनावों के लिए तैयार हो रहा है, प्रत्येक नागरिक का वोट भारतीय लोकतंत्र की व्यापक कहानी में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय निभाएगा। यह कहानी है विविधता में एकता, निर्णयों में समानता, और भागीदारी में शक्ति की ।
हर बार जब आप मतदान करते है, आप केवल एक प्रतिनिधि का चुनाव नहीं कर रहे होते, बल्कि राज्य और देश के भविष्य को आकार दे रहे होते है। एक वोट शायद छोटा लगे, लेकिन जब यह करोड़ों वोटों में बदल जाता है, तो यह पूरे राष्ट्र का आंदोलन बन जाता है।
जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में फिर से मतदान और रंगे हुए अंगुलियों के साथ उत्साह देखने को आवाज है। आपकी आवाज आपकी ताकत है। इसे मिलता है, तो याद रखेंरू आपका वोट आपकी समझदारी से इस्तेमाल करें। गौरव के साथ भाग लें और लोकतंत्र को मजबूत बनाएं!
बीते बीस सालों में कमजोर ही हुआ आरटीआई कानून
अंजलि भारद्वाज, ( वरिष्ठ सदस्य, एनसीपीआरआई )
सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून स्वतंत्र भारत में लागू किए गए सबसे परिवर्तनकारी व सशक्त कानूनों में से एक रहा है। यह कानून 2005 में व्यापक जनांदोलनों के बलबूते अस्तित्व में आया और लोकतांत्रिक ढांचे के दायरे में सत्ता का नए सिरे से पुनर्गठन करने लगा। एक अनुमान के अनुसार, हर साल आरटीआई कानून के तहत लगभग 60 लाख आवेदन दायर किए जाते हैं, जिससे यह दुनिया में सबसे व्यापक इस्तेमाल वाला पारदर्शी जन-कानून बन गया है। इन्हीं सब कारणों से आरटीआई कानून 2011 में वैश्विक पारदर्शिता रैंकिंग में शीर्ष पर चला गया था।
भारत के इस जन-हितकारी कानून ने नागरिकों को सक्षम बनाया है कि वे सरकारों को जवाबदेह ठहरा सकें। शायद यही कारण है कि इस अधिकार का इस्तेमाल करने वालों को लगातार कटु प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ रहा है। पिछले छह वर्षों में इस कानून में दो बार नकारात्मक संशोधन हो चुके हैं- साल 2019 में और फिर 2023 में। पहले संशोधन में सूचना आयोगों की स्वायत्तता पर गहरा आघात किया गया। मूल कानून में सूचना आयोगों को अधिकार था कि वह संबंधित सरकारों को सूचना सार्वजनिक करने और कानून का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को दंडित करने के निर्देश दे सकता था। आरटीआई के कामकाज के लिए आयोगों की स्वतंत्रता को बनाए रखना जरूरी है।
मगर 2019 के संशोधन में सभी सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन और सेवानिवृत्ति के बाद के उनके लाभों के बारे में नियंत्रण केंद्र सरकार को सौंप दिया गया, जिससे उनकी स्वायत्तता बुरी तरह कमजोर हो गई। सरकारें लंबे समय से आयोगों की सूचना सार्वजनिक करने के आदेश देने संबंधी अधिकार पर नजर गड़ाए हुए थीं। उसका यह अधिकार सरकारों के लिए तब और खतरनाक साबित होने लगा, जब सरकारी विभाग और उसके अधिकारी गोपनीयता के नाम पर सूचना छिपना चाहते थे। इसलिए, बीते करीब एक दशक से एक भी आयुक्त की नियुक्ति अदालतों का दरवाजा खटखटाए बिना नहीं की गई है। इसी का नतीजा है कि आज बड़े पैमाने पर मामले लंबित हैं।
अगस्त 2023 में डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण (डीपीडीपी) कानून के पारित होने से लोगों के जानने के अधिकार को एक और झटका लगा। इस कानून ने आरटीआई कानून की धारा 8(1)(जे) में संशोधन करके सभी व्यक्तिगत सूचनाओं को सार्वजनिक करने की बाध्यता से मुक्त कर दिया। मूल प्रावधान के तहत, व्यक्तिगत जानकारी को केवल तभी रोका जा सकता था, जब उसका सार्वजनिक गतिविधि या सार्वजनिक हित पर कोई दुष्प्रभाव पड़ता हो, या उससे निजता का अनुचित उल्लंघन होता हो। डीपीडीपी संशोधन ने कानून के एक महत्वपूर्ण प्रावधान को भी कि, ‘जो जानकारी संसद या विधानमंडलों को देने से इनकार नहीं किया जा सकता, उसे किसी भी व्यक्ति को देने से इनकार नहीं किया जाएगा’, हटा दिया।
डीपीडीपी कानून ने लोगों की सूचना पाने की क्षमता को कम किया। संशोधित प्रावधानों का इस्तेमाल कर ‘व्यक्तिगत जानकारी’ की सुरक्षा के बहाने ऋण न चुकाने वालों के नाम, मतदाता सूची, महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल अधिकारियों की पहचान और यहां तक कि सार्वजनिक कार्यों को अंजाम देने वाले ठेकेदारों के नाम जैसे विवरणों को रोका जा सकता है। इसी क्रम में कानून के उपयोगकर्ताओं को भी नहीं बख्शा गया है। पिछले 20 वर्षों में भ्रष्टाचार और गलत कामों को उजागर करने वाले 100 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है। हजारों पर हमले हुए, उन्हें धमकाया गया और झूठे मामलों में फंसाया गया।देश में इस अनोखे पारदर्शिता कानून के दो दशक पूरे हो रहे हैं। इसे फिर से सशक्त बनाने की आवश्यकता आज जितनी महसूस की जा रही है, पहले कभी नहीं थी। सूचना का अधिकार केवल कानूनी अधिकार नहीं है, यह लोकतांत्रिक जवाबदेही की नींव है। इसे कमजोर करने का प्रयास, शासन और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल करने के नागरिकों के मौलिक अधिकार पर आघात है। आगे का रास्ता यही है कि इस जनोपयोगी कानून को सामूहिक रूप से मजबूत करने के प्रयास किए जाएं।