11-11-2022 (Important News Clippings)

11 Nov 2022
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Unlaundered truth

Central agencies should reflect about the way they are used for political ends.


A Special Court dealing with cases under the Prevention of Money Laundering Act (PMLA) in Mumbai has made some extraordinarily scathing observations about the way the Enforcement Directorate (ED) functions. While granting bail to Sanjay Raut, Shiv Sena (Uddhav Thackeray) MP, the court has termed his arrest not only illegal but also one recorded for “no reason” at all. The grant of bail and the observations made by Special Judge M.G. Deshpande have galvanised the ED to file an immediate appeal before the Bombay High Court, but the lengthy order contains enough material to substantiate the charge by Opposition parties that central agencies are being utilised to hound political opponents. The judge has found that the underlying criminal case of cheating concerned another set of people who had committed misdeeds, but they were not arrested. As far as Mr. Raut and his associate, Pravin Raut, who has also been given bail, were concerned, it was essentially a civil dispute, and there was nothing to show that money involved in their transactions were “proceeds of crime”. Their arrest under the PMLA was illegal, the court said, because there was no underlying scheduled offence. The ED has alleged that the proceeds of the fraudulent sale of tenements pertaining to a re-development project at Patra Chawl in Mumbai, amounted to ₹1,039 crore. It had further alleged that Mr. Pravin Raut was a proxy for Sanjay Raut, and that the latter and his wife had utilised ₹95 crore out of the proceeds to buy assets.

The misuse of agencies seems to be an unlaundered truth, going by the court’s remarks. There has indeed been a disproportionate targeting of non-BJP political leaders by investigating agencies of the Union government. While lawyers and activists have been arrested under anti-terrorism laws, mainstream political opponents often see tax raids and money-laundering cases. The latter class of cases is made possible by the PMLA that permits the ED to register a money-laundering case whenever there is an FIR by the police involving a given list of offences. In a sardonic comment, the Special judge has noted that the ED works at great speed while making an arrest, but proceeds with the trial at a snail’s pace. ED officers seem to be aware only of Section 19 (power to arrest) and Section 45 (stringent conditions for bail), but not the fact that they should also hold a trial. The judge’s remarks also drive home the fact that money-laundering prosecutions have an abysmally low rate of convictions. Instead of rushing to file appeals against adverse orders, central agencies ought to reflect on the manner in which they are being utilised for political ends.


Content slot

Public service broadcast is a good idea in a diverse country with myriad issues.


Tweaking guidelines for television channels operating in India, the Union Cabinet has laid down some norms on content as well. In the time of polarising opinions, heated debates and narrow targeting of ideas on television, it said wherever applicable, the channels would have to broadcast content on themes of national importance and socially relevant issues for at least 30 minutes every day. The ‘Guidelines for Uplinking and Downlinking of Satellite Television Channels in India, 2022’ point out that as airwaves and frequencies are public property and need to be used in the best interest of society, a company with permission to operate in India, barring foreign channels, will have to air content in the service of the public. The themes that have been picked out include education and spread of literacy, agriculture and rural development, health and family welfare, science and technology, welfare of women and weaker sections of society, protection of environment and of cultural heritage and national integration. These are subjects on which a lot more awareness is necessary. According to a FICCI-EY report, with television subscriptions estimated to add another 42 million by 2025 from 178 million in 2021, on the face of it, the public service broadcast is not a bad idea in a diverse country with myriad issues.

The good intent, however, comes with a caveat. The guidelines say “the Central Government may, from time to time, issue a general advisory to the channels for telecast of content in national interest, and the channel shall comply with the same”. Though the Government has left it to the channels to “appropriately modulate their content to fulfil the obligation”, its stated intention to step in as and when required may be another way to signal that it will keep a watchful eye on the media. In its 2008 recommendations, the Telecom Regulatory Authority of India had suggested a public service obligation, which the Information and Broadcasting (I&B) Ministry has taken on board. But there is no clarity yet on compensation norms and who is going to foot the bill for the public service component on TV. The guidelines, with effect from November 9, replace those in operation since 2011 with the Government announcing a host of measures which include making India a teleport hub. The Government has done away with the requirement to seek permission for live telecast of events; only prior registration of events will be necessary for live telecast. As for the 30-minute public service slot, I&B Secretary Apurva Chandra has said stakeholders will be consulted regarding the modalities, which will have to be sorted out.


क्या दुनिया में प्रजातंत्र असफल हो रहा है?


कितना हास्यास्पद लगता है कि उत्तरी कोरिया का नाम प्रजातान्त्रिक जन गणतंत्र (डीपीआर) है जबकि वास्तव में यह एक खतरनाक और डरावने तानाशाह के हाथ में है। शी जिनपिंग ने 20वीं कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस में अपने को लगभग आजीवन शासक बनाए रखने पर मुहर लगवा ली है। सब कुछ स्वयं चुने हुए व्यक्तियों के जरिए लेकिन प्रजातंत्र के आवरण में हुआ। चीन भी प्रजातंत्र का दम भरता है। ताकतवर माने जाने वाले रूसी राष्ट्रपति ने यूक्रेन पर हमला कर पूरी दुनिया को आर्थिक-सामरिक संकट में झोंक दिया। इस फैसले के पहले क्या उसने अपनी जनता से राय ली थी ? फ्रीडम हाउस की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में केवल 20% देशों में ही असली प्रजातंत्र है यानी लोगों को अभिव्यक्ति और अन्य तमाम तरह की स्वतंत्रता है। और वहां की सरकार की नीतियां आमतौर पर जन भावनाओं के अनुकूल होती हैं। कहने को दुनिया के 193 देशों में 55% अपने को डेमोक्रेटिक कहते हैं लेकिन हकीकत यह है कि उन देशों में मतदान केवल एक छलावा होता है। एक स्वस्थ प्रजातांत्रिक व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए न केवल चुने गए नेता और उसकी सरकार की भूमिका होती है बल्कि जनता की समझ, उसकी तर्क-शक्ति और उसकी वैज्ञानिक सोच की आदत से तय होता है कि उस देश के प्रजातंत्र की गुणवत्ता कैसे होगी।


टकराव में महामहिम


दक्षिण के तीन प्रदेशों में इन दिनों राज्यपाल और निर्वाचित सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। राज्यपाल अपने अधिकार का उपयोग करना चाहते हैं, तो राज्य सरकारें अपने निर्वाचित होने का हवाला दे रही हैं। केरल में राज्यपाल ने कुछ दिनों पहले दस विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से इस्तीफा मांग लिया। उनका कहना था कि उनकी नियुक्ति में तय नियम-कायदों का पालन नहीं किया गया। इसे लेकर राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच ठन गई। बाद में उच्च न्यायालय ने राज्यपाल के आदेश पर रोक लगा दी। अब राज्य सरकार ने राज्यपाल का विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति का दर्जा समाप्त करने का अध्यादेश पारित कर दिया है। हालांकि उस पर भी राज्यपाल की मंजूरी आवश्यक है, मगर अपने-अपने अधिकारों को लेकर जंग छिड़ी हुई है। इसके अलावा कुछ दिनों पहले राज्यपाल ने सरकार के एक मंत्री को हटाने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा, जो स्वाभाविक ही राज्य सरकार को नागवार गुजरा और उसे लेकर भी दोनों के अधिकार क्षेत्र पर बहस शुरू हो गई। इसी तरह तमिलनाडु सरकार ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर वहां के राज्यपाल को हटाने की मांग की है। उसका आरोप है कि राज्यपाल उसके कामकाज में बेजा दखल दे रहे हैं। तेलंगाना के राज्यपाल का आरोप है कि राज्य सरकार उनका फोन ‘टैप’ करा रही है।

हालांकि राज्यपाल या उपराज्यपाल और चुनी हुई सरकारों के बीच तनातनी के ये मामले नए नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में भी कुछ दिनों पहले तक राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच इसी तरह लगातार टकराव बना रहा। राज्यपाल सरकार के कामकाज और फैसलों पर अंगुली उठाते रहे, तो सरकार उन्हें चुनौती देती रही। दिल्ली में उपराज्यपाल और सरकार के बीच तनातनी का दौर बहुत लंबे समय से चलता आ रहा है। यहां आम आदमी पार्टी सरकार का लगभग सभी उपराज्यपालों से तकरार बनी रही। शुरू में दोनों के बीच अधिकारों की लड़ाई उच्च न्यायालय तक भी पहुंची थी। झारखंड और राजस्थान में भी अलग-अलग मौकों पर कुछ मसलों पर इस तरह के टकराव देखे जाते रहे हैं। इस तरह विपक्षी दलों को यह कहने का मौका मिलता है कि जहां भी विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां राज्यपाल उनके कामकाज में बेवजह दखल देने का प्रयास करते देखे जाते हैं, जबकि भाजपा सरकारों वाले प्रदेशों में ऐसी स्थिति नहीं है। ऐसे में राज्यपाल पद की गरिमा और मर्यादा को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

यह ठीक है कि राज्य सरकारें निर्वाचित होती हैं, उन्हें जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए काम करने का अधिक अधिकार होता है और राज्यपाल को उनके कामकाज को सुगम बनाने के लिए बेहतर स्थितियां बनाने का दायित्व निभाना होता है। मगर इसका यह अर्थ नहीं कि सरकारें राज्यपाल को केंद्र का ‘आदमी’ मान कर नजरअंदाज करें या उनकी अवहेलना करें। पर राज्यपाल से भी अपेक्षा की जाती है कि वे अपने को केंद्र के सत्तारूढ़ दल का प्रतिनिधि मान कर उसकी विचारधारा के अनुरूप राज्य सरकार से काम करवाने का प्रयास करने के बजाय राज्यपाल की गरिमा के अनुरूप काम करें। हालांकि केंद्र द्वारा राज्यपालों को अपने नुमाइंदे के तौर पर नियुक्त करने की प्रवृत्ति पुरानी है, पर राज्य सरकारों के साथ इन टकरावों को देखते हुए एक बार फिर से राज्यपाल की नियुक्ति पर नए सिरे से विचार की जरूरत रेखांकित हुई है। फिर सवाल उठता है कि आखिर सक्रिय राजनीति में रह चुके लोगों को इस पद का दायित्व सौंपा ही क्यों जाना चाहिए।


जांच पर सवाल


विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि केंद्र सरकार जांच एजंसियों का दुरुपयोग कर रही है। विपक्षी नेताओं को सबक सिखाने के मकसद से इन एजंसियों का इस्तेमाल कर रही है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने उस आरोप पर जैसे मुहर लगा दी है। शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत की जमानत मंजूर करते हुए अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय को फटकार लगाई और कहा कि यह गिरफ्तारी अवैध है। हालांकि प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत के इस फैसले पर पुनर्विचार की गुहार लगाई, पर उसे खारिज कर दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि मामले के मुख्य आरोपियों को आज तक गिरफ्तार नहीं किया गया और राउत के खिलाफ पुख्ता सबूत न होने के बावजूद आनन-फानन गिरफ्तार कर लिया गया। इससे सरकार पर विपक्ष को हमला बोलने का एक और मौका मिल गया है। फिर, यह अकेला मामला नहीं है, जिसमें किसी विपक्षी नेता को प्रवर्तन निदेशालय या आयकर विभाग जैसी दूसरी एजंसियों द्वारा गिरफ्तार किया गया। राउत को तीन महीने से ऊपर जेल में बिताना पड़ा। इससे यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि एक राज्यसभा सांसद को प्रवर्तन निदेशालय जब इस तरह अवैध ढंग से गिरफ्तार कर सकता है, तो दूसरे लोगों के बारे में उसके रवैए का अंदाजा लगाया जा सकता है।

प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी जांच एजंसियां यों तो स्वतंत्र रूप से काम करती बताई जाती हैं, मगर पिछले कुछ सालों से जिस तरह लक्ष्य करके विपक्षी दलों के नेताओं पर ही शिकंजा कसने का प्रयास करती देखी जा रही हैं, उसे लेकर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। कई मामलों में आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। हालांकि कई ऐसे गंभीर मामले हैं, जिनमें सत्तापक्ष के नेता आरोपी हैं, मगर उनके खिलाफ आज तक जांच की जरूरत नहीं समझी गई। कई नेता जो पहले दूसरे दलों में थे और उन पर किसी बड़े घोटाले या भ्रष्टाचार में शामिल होने के आरोप हैं, पर वे सत्तारूढ़ दल में शामिल हो गए, तो उन पर भी चुप्पी साध ली गई। अगर जांच एजंसियां सचमुच स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर काम करतीं, तो इस तरह पक्षपातपूर्ण रवैया अख्तियार नहीं करतीं। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल जांच एजंसियों का अपने मकसद के लिए इस्तेमाल कर रहा है। पहले की सरकारों पर भी यह आरोप लगता रहा है। मगर इस आधार पर जांच एजंसियों को अपने कर्तव्य से मुंह फेर लेने का आधार नहीं मिल जाता।

अच्छी बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने ताजा मामले में प्रवर्तन निदेशालय को फटकार लगाते हुए उसका कर्तव्य याद दिलाया। हालांकि निदेशालय इसे कब तक याद रख पाएगा, दावा नहीं किया जा सकता। पर कम से कम उससे यह उम्मीद तो की जा सकती है कि किसी भी मामले में जांच करते हुए पुख्ता सबूतों के बिना किसी की गिरफ्तारी न करे। इस तरह किसी को महज इस मकसद से गिरफ्तार कर लेना कि उसका मनोबल तोड़ा और सत्तापक्ष की तरफ झुकाया तथा दूसरों का भयादोहन किया जा सकता है, जांच एजंसियों के लिए नैतिक रूप से उचित नहीं कहा जा सकता। सरकार तो शायद ही इस मामले से कोई सबक ले, पर जांच एजंसियों को जरूर अपनी मर्यादा का ध्यान रखने की जरूरत है। बिना किसी आधार के किसी को गिरफ्तार करने से जो उसका समय बर्बाद होता, उसके मन पर प्रतिकूल असर पड़ता और समाज में छवि खराब होती है, उसकी भरपाई भला कौन करेगा। इसकी जवाबदेही किस पर होनी चाहिए।


अकादमिक श्रेष्ठता हो उद्देश्य

प्रो. नीलिमा गुप्ता

भारत की मौजूदा उच्च शिक्षा प्रणाली से प्रति वर्ष लगभग 3.7 करोड़ विद्यार्थी डिग्री लेकर देश के सामाजिक–आर्थिक विकास के सोपानक्रम से स्वयं को जोड़ने का संकल्प लेते हैं‚ लेकिन सवाल है कि क्या हमारे उपाधिधारक अकादमिक रूप से समृद्ध होने के साथ–साथ समाज के योग्य नागरिक बनने और समकालीन युग की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैंॽ

निश्चित रूप से हमारी शिक्षा–प्रणाली उस स्तर की होनी चाहिए‚ जिससे राष्ट्र के साथ–साथ समाज का भी चौतरफा व समुचित विकास हो सके। शिक्षा का लक्ष्य अंततः एक ऐसे उन्मुक्त और आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति का निर्माण करना होता है जो सभी विपरीत परिस्थितियों व चुनौतियों का सामना सफलतापूर्वक कर सकें। ऐसे में निःसंदेह किसी राष्ट्र की शिक्षा की गुणवत्ता ही उसके राष्ट्रीय विकास के स्तर का आईना है। भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में उच्च–शिक्षा के क्षेत्र के विकास–विस्तार में हमारे विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका है। भारत की उच्च शिक्षा–प्रणाली के पास वर्तमान में विकास‚ गुणवत्ता और समान पहुंच जैसे कई उद्देश्यों को प्राप्त करने का दबाव है।

भारतवर्ष एक युवा राष्ट्र है जहां की युवा आबादी उत्कृष्टता की ओर सदा उन्मुख रही है। अर्थशा्त्रिरयों का कहना है कि भारत सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में‚ पश्चिम के अधिकांश और जापान व चीन जैसे देशों की तुलना में‚ अतिरिक्त 2 प्रतिशत अधिक है। यह महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय क्षमता निश्चित ही भारत को एक अभूतपूर्व बढ़त प्रदान करती है। 2030 तक भारत के दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र होने की संभावना है‚ जिसमें लगभग 14 करोड़ लोग उच्च शिक्षा संस्थान के पोर्टल में प्रवेश करने के लिए तैयार हैं। गौरतलब है कि दुनिया में हर चार स्नातकों में से एक भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली का उत्पाद होगा। नवीनतम ज्ञानात्मक कौशल के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस उच्च जनसांख्यिकीय लाभांश क्षमता का दोहन करने की तत्काल आवश्यकता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हालिया रिपोर्ट के अनुसार कम–से–कम 54 प्रतिशत कर्मचारियों को अपने कौशलों को परिवर्धित करने और नये सिरे से सीखने की जरूरत पड़ेगी। कॉरपोरेट क्षेत्र में ‘उद्यमिता’ पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है। अधिकांश छात्र ‘बेहतर नौकरियां और उच्च वेतनमान’ चाहते जरूर हैं‚ परंतु ‘उद्यमिता’ में शामिल अनिश्चितताओं के साथ संघर्ष करने के लिए वे तैयार नहीं हैं। शैक्षिक संस्थान उद्यमिता अनुकूल तंत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आज शैक्षिक संस्थान उद्यमियों के विकास में मुख्य कारक की भूमिका निभाते हुए पूरे देश के लिए अधिक रोजगार व धन का उत्पादन कराने में सक्षम हैं। अब हमारे पास बड़ी संख्या में कुशल शिक्षक और टेक्नोक्रेट उपलब्ध हैं। नोबल पुरस्कार के विजेता पॉल क्रुगमैन ने भारत में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘जापान अब एक महाशक्ति नहीं रह गया है‚ क्योंकि इसकी कामकाजी उम्र ढल गई है‚ और चीन का भी यही हाल है। ऐसी स्थिति में‚ पूरे एशिया में भारत नेतृत्व कर सकता है‚ लेकिन तब जब वह सेवाप्रदाता क्षेत्रों के साथ–साथ अपने विनिर्माण क्षेत्र को भी विकसित करे।’

प्रासंगिक बने रहने के लिए तथा भविष्य में कदम रखने के लिए निरन्तर सीखते रहने की भावना छात्रों के लिए बहुत ही आवश्यक है‚ क्योंकि इससे उनका कॅरियर भी परिभाषित होता है। सशक्त नेतृत्व–कौशल से हर मौजूदा स्थिति का सामना किया जा सकता है‚ इससे नवाचार को भी बढ़ावा मिलेगा। यहां यह भी जान लेना आवश्यक है कि नेतृत्व किसी धारित पद में नहीं‚ बल्कि उस व्यक्ति के चरित्र व व्यवहार के सम्पादन में ही अंतनिहित होता है। अब हम अपने इतिहास के उस निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं जब हमारी शिक्षा व्यवस्था के क्रियान्वयन के साथ खुद को एक नये सांचे में ढाल रही है। यह समय सचमुच बहुत ही महत्वपूर्ण है। चुनौतियां बड़ी हैं और दांव ऊँचे हैं। दुनिया के अनेकानेक हिस्से संघर्ष और उथल–पुथल की एक अजीब स्थिति में हैं। छात्र–छात्राएं भी परिवर्तन के बहुमुखी दौर से गुजर रहे हैं; उन्हें अच्छे मूल्यों और गुणों को आत्मसात करके हर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उपाधिधारक छात्रों को शिक्षा जगत की सबसे मूल्यवान डिग्रियों में से एक विशिष्ट डिग्री लेकर दुनिया के सामने आना चाहिए।

यह बात ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि केवल एक शिक्षित देश ही एक विकसित देश बनने की आकांक्षा रख सकता है। ऐसे में हमें उच्च शिक्षा संस्थान के मामले में विश्वस्तरीय संस्थान तैयार करने के साथ–साथ उनकी संख्या में वृद्धि करने की भी आवश्यकता है। नवोन्मेषी मानिसकतायुक्त उच्च शिक्षा ही हमारे समाज व समुदाय दोनों को आगे ले जाने वाली कुंजी है। इसके लिए व्यापक सार्वजनिक और निजी भागीदारी की आवश्यकता है। वैश्वीकरण‚ प्रतिस्पर्धा और ज्ञान–संचालित अर्थव्यवस्था के चलते उच्च शिक्षा संस्थानों की वास्तविक संख्या निर्धारित करना कठिन हो गया है। जिस प्रकार भारत सरकार हमारे देश में विदेशी विश्वविद्यालयों की स्थापना करने की योजना बना रही है‚ उसी प्रकार हमें शिक्षा के भारतीयकरण के संदेश को दूर दूर तक पहुंचाने के लिए विदेशों में अपनी भी शाखा की स्थापना की पहल भी करनी चाहिए। जैसे–जैसे उपाधि धारक छात्र व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन के एक नये मोड़ में प्रवेश करते हैं‚ उन्हें अपने सभी निर्णय स्वयं लेने होते हैं।

छात्रों को एक गंभीर और प्रतिबद्ध टीम के खिलाड़ी की भांति अपनी टीम के साथ सकारात्मक भावना प्रदर्शित करनी चाहिए। उन्हें कार्य–परिवर्त्य सपनों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए‚ उनमें जोखिम लेने का साहस होना चाहिए और असफलता की स्थिति में हताश नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति जिसका मुख्य उद्देश्य मानव की सभी क्षमताओं (अकादमिक उत्कृष्टता‚ बुद्धिमत्ता‚ आध्यात्मिक‚ सामाजिक‚ भावनात्मक‚ नैतिक‚ पेशेवर‚ तकनीकी) को एक एकीकृत तरीके से विकसित करना है। एक छात्र जो शिक्षित एवं उपाधि धारक है‚ उसे एक सभ्य समाज का सच्चा नागरिक होना भी आवश्यक है। छात्रों को दीक्षित होकर वास्तविक दुनिया में कदम रखने का अर्थ है अकादमिक श्रेष्ठताओं से परिपूर्ण एक सभ्य भारतीय सामाजिक नागरिक बनना‚ जो जीवन में हर प्रकार से सफल हो सके।


पारदर्शिता की कोशिश में भी परदादारी

विजय विद्रोही, ( वरिष्ठ पत्रकार )

एक तरफ, सुप्रीम कोर्ट में चुनावी बांड को लेकर सुनवाई हो रही है, तो दूसरी तरफ, चुनावी बांड की बिक्री के दिन 70 से बढ़ाकर 85 कर दिए गए हैं। अभी अक्तूबर महीने में ही 545 करोड़ रुपये के चुनावी बांड अनजान लोगों या संस्थाओं ने खरीद कर विभिन्न दलों के खजाने भरे थे। सवाल उठता है, आखिर चुनावी बांड की बिक्री के दिन बढ़ाने की ऐसी क्या जरूरत पड़ गई? क्या गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों को देखते हुए ऐसा किया गया? विपक्षी दलों का आरोप है कि यह सब भाजपा को फायदा दिलाने के लिए किया गया है, क्योंकि चुनावी बांड का 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा उसके ही खाते में जाता रहा है। 2018 में चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाने और काले धन पर रोक लगाने के इरादे से केंद्र सरकार चुनावी बांड की स्कीम लेकर आई थी। तब से अब तक 10,791 करोड़ रुपये मूल्य के चुनावी बांड स्टेट बैंक बेच चुका है। 22 बार ऐसी बिक्री हो चुकी है। सबसे ज्यादा पांच हजार करोड़ रुपये मूल्य के चुनावी बांड 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले जारी किए गए थे। सवाल उठता है, क्या वास्तव में इससे काले धन पर रोक लगती है? हैरत की बात है कि 2018 में यह स्कीम सिर्फ लोकसभा चुनाव को लेकर जारी की गई थी, लेकिन बाद में इसे विधानसभा चुनावों पर भी लागू कर दिया गया।

चुनावी बांड स्टेट बैंक जारी करता है। बैंक एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपये मूल्य के बांड जारी करता है। इसे खरीदने वालों के नाम गुप्त रखे जाते हैं। किस पार्टी को किसने कितना चंदा दिया, यह भी गुप्त रखा जाता है। किसने कितनी कीमत के बांड खरीदे, इसकी जानकारी सिर्फ स्टेट बैंक को ही होती है। अगर किसी जांच एजेंसी को अपनी जांच के सिलसिले में चुनावी बांड की जानकारी चाहिए, तो स्टेट बैंक कड़ी शर्तों के साथ जानकारी साझा कर सकता है। सरकार ने इसी साल 1 अगस्त और 29 अक्तूबर के बीच दस हजार चुनावी बांड छापे हैं, जिनकी कीमत एक करोड़ रुपये प्रति बांड है। यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत सामने आई है।

वैसे सरकार सर्वोच्च न्यायालय में कह चुकी है कि चुनावी बांड पूरी तरह से पारदर्शी हैं, काले धन पर रोक लगाते हैं और चुनावी भ्रष्टाचार को रोकते हैं। उधर न्यायालय में बांड के खिलाफ याचिका लगाने वालों का कहना है कि चुनावी बांड स्कीम में कई मूलभूत खामियां हैं, जिनको दूर किए जाने तक इस स्कीम पर रोक लगा देनी चाहिए। चुनावी बांड पारदर्शिता को किस तरह बढ़ावा दे सकते हैं, जब बांड खरीदने वालों के नाम लोगों से छिपाकर रखे जाते हैं? एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) के अनुसार, 90 फीसदी से ज्यादा बांड एक करोड़ रुपये मूल्य के खरीदे गए, यानी साफ है कि चुनावी बांड या तो करोड़पति-अरबपति लोग या बड़े उपक्रम ही खरीद रहे हैं। चूंकि सब कुछ छिपाकर रखा जाता है, इसलिए आम वोटर कभी अंदाज नहीं लगा पाता है कि चुनावी बांड खरीदने वाले किसी स्वार्थ के कारण या सेवा के बदले मेवा के रूप में यह काम करते हैं।

शायद यही वजह है कि चुनाव आयोग भी चुनावी बांड स्कीम के पक्ष में नहीं था। उसका भी कहना था कि स्कीम से काले धन पर रोक लगने को लेकर वह पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। यह बात चुनाव आयोग सरकार और अदालत, दोनों से कह चुका है।

पहले सोचा गया था कि चुनावी बांड से नकदी चंदा लेन-देन से मुक्ति मिलेगी। चूंकि चंदा बैंक के जरिये आएगा, इसलिए उसका हिसाब रखना आसान होगा। दूसरी ओर, चंदा देने वालों का नाम चूंकि गोपनीय रहेगा, इसलिए लोग आजादी के साथ चंदा दे सकेंगे। नकदी लेन-देन कम हुआ होगा और लोग ज्यादा आजादी से चंदा दे रहे हैं, पर पारदर्शिता सवालों के घेरे में है। इसमें कोई शक नहीं है कि पारदर्शिता कम होने का नुकसान राजनीतिक दलों को ही होता है, उनकी विश्वसनीयता कम होती है। चुनावी बांड की व्यवस्था से लाभ-हानि पर भी राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए। हमें अमेरिका इत्यादि लोकतांत्रिक देशों से भी सीखना चाहिए।

सरकार किसी की भी रही हो, हम जानते हैं कि चंदा सत्तारूढ़ को ज्यादा मिलता है। चुनावी बांड का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड हमारे पास नहीं है, लेकिन आमतौर पर यही माना जाता है कि सत्तारूढ़ दल को 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा मिलता रहा है। एक आंकड़ा पांच चुनावी ट्रस्ट का है, जिन्होंने 2021-22 में 72 प्रतिशत चंदा भाजपा को दिया। कांग्रेस के हिस्से में सिर्फ 3.8 फीसदी चंदा आया। भाजपा को 336 करोड़ रुपये मिले, कांग्रेस को 18 करोड़ रुपये। इससे पहले के वर्ष में भाजपा को 212 करोड़ रुपये और कांग्रेस को साढ़े पांच करोड़ रुपये मिले थे। अब कांग्रेस से ज्यादा चंदा तो आम आदमी पार्टी को मिल रहा है, करीब 21 करोड़ रुपये। सभी दलों का हिसाब-किताब यह भी बताता है कि 80 फीसद से ज्यादा चंदा बीस हजार रुपये से कम का मिलता है, जहां चंदा देने वाले के नाम की रसीद नहीं काटनी पड़ती है। कुछ दलों में तो सौ फीसदी चंदा इसी तरह से आया है। मजेदार बात है कि राजनीतिक दलों को तो 20,000 से कम का चंदा मिल रहा है, लेकिन चुनावी बांड एक करोड़ रुपये मूल्य से ज्यादा के मिल रहे हैं। यह अपने में विरोधाभासी भी है और चुनावी चंदे की तमाम गड़बड़ियों की पोल भी खोल देता है। बीस हजार रुपये से कम का चंदा देने वाले का नाम-पता रखना सियासी दल के लिए जरूरी नहीं होता है, यानी अनाम लोगों से चंदा मिला, यही बात चुनावी बांड खरीदने वालों पर भी लागू होती है।

फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है, जिस पर अगली सुनवाई 6 दिसंबर को होनी है। वैसे, कोर्ट राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के तहत लाने की एक याचिका पर भी चुनावी बांड की याचिका के साथ-साथ सुनवाई कर रहा है। खुद मुख्य सूचना आयोग ने नौ साल पहले छह राष्ट्रीय दलों को नोटिस जारी करके पूछा था कि क्यों न उन्हें सूचना के अधिकार के तहत लाया जाए? इस पर भाजपा, कांग्रेस, एनसीपी, बसपा, माकपा, भाकपा यानी किसी भी दल ने सहमति नहीं दी है। ऐसे में, चुनावी चंदे की पारदर्शिता पर सवाल उठते ही रहेंगे। मिर्जा गालिब का शेर है- बेखुदी बेसबब नहीं गालिब, कुछ तो है, जिसकी परदादारी है।


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