10-02-2026 (Important News Clippings)

Afeias
10 Feb 2026
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Date: 10-02-26

Stifling ideas

Sentiments cannot be allowed to trigger a criminal process against art

Editorial

Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath’s direction to file a first information report (FIR) against the makers of a film over its title, Ghooskhor Pandat, is a sign of how sections of the ruling establishment have come to treat speech that they dislike. Mr. Adityanath alleged that the title attempts to disrupt social harmony and hurts religious or caste sentiments. The producer agreed to remove promotional materials for the film. A dispute over expression quickly became a policing matter and the threat of criminal process swiftly compelled capitulation, even before any court had examined the facts. Article 19(1)(a) protects speech precisely because it can sometimes be unwelcome to powerful groups. The restrictions that the state can impose are enumerated in Article 19(2), and have to be proportionate. Courts have also separated speech that offends from speech related to violence or disorder. In the present case, the FIR is a threat, issued by a Chief Minister no less, to mobilise the coercive machinery of criminal law, a sign that the state fears public debate and wants to flatten the issue to a matter of discipline. Of late, the visual arts have often been met with restrictions. In 2023, West Bengal ordered that The Kerala Story not be screened in the State to maintain “law and order”; a few months earlier, the Centre had directed platforms to remove links to the BBC documentary, India: The Modi Question, sans a judicial finding on illegality. Other examples include Kaum De Heere (2014), India’s Daughter (2015), Padmaavat (2018), and the documentaries, Infiltrating Australia – India’s Secret War and Contract to Kill (both 2024).

In a diverse society, people can plausibly say they are hurt by many things, which is why sentiments are not useful thresholds to trigger a criminal process. Equally, when film-makers and distributors believe that the safest way out is to erase contested material rather than defend it in law, the public loses access to the work, courts lose the chance to clarify legal standards, society loses a chance to exercise the democratic response to controversial art — e.g., boycott or satire in return — and, over time, the marketplace of ideas wilts. Speech is not always free of consequences but the state bears the burden to examine it with specificity. A more sensible response, when there is a credible claim of unlawfulness, is for the aggrieved party to seek judicial relief, record the reasons, and adopt the least restrictive measure. Taking executive action flies in the face of this constitutional process. It is Mr. Adityanath’s responsibility to ensure public order while allowing people to express themselves, not to maintain it by curtailing expression altogether


Date: 10-02-26

तेज विकास के लिए खेती से जुड़े कामों को बढ़ाना होगा

संपादकीय

हमारे किसानों को अमेरिकी चारे से हानि नहीं लाभ होगा। देश की कुल 500 लाख टन पशु आहार की जरूरत का मात्र 1% ही अमेरिकी चारा आयात होगा। भारत में कृषि क्षेत्र की कुल जीडीपी का कब एक-तिहाई मत्स्य सहित पशुपालन से आता है और अधिकांश किसान पशुपालक भी हैं। अमेरिकी फीड भारत में उपलब्ध चारे से काफी सस्ता और जानवरों के लिए स्वास्थ्यप्रद होगा। इसका कारण यह है कि विभिन्न अनाजों के स्टार्च से एथेनॉल बनाने के बाद घुलनशील तत्वों के साथ बचे अंश से फीड बनाया जाता है, जो प्रोटीन – रिच होता है। और बाय-प्रोडक्ट होने के कारण सस्ता भी है। भारत में परम्परागत रूप से जानवरों को सरसों, मूंगफली, चावल की खली दी जाती है। यूएस आज लाल ज्वार का सबसे बड़ा उत्पादक है, जिससे भारत में सस्ता चारा मिलेगा। दूसरे, जहां तक सोयाबीन के तेल का सवाल है तो भारत वर्षों से तेल की कमी पूरी करने के लिए इसका आयात ब्राजील और अन्य देशों से करता रहा ही है। सरकार लगातार किसानों को तिलहन और दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती रही है । बहरहाल, भारत को अगर विकास की गति बढ़ानी है तो कृषि से लोगों को निकाल कर संलग्न उद्यमों जैसे पशु-पालन, पोल्ट्री और डेयरी के अलावा उच्च वैल्यू वाले हॉर्टिकल्चर व अर्ध-पैकेज्ड और पैकेज्ड उत्पाद जैसे उपक्रमों में लगाना होगा।


Date: 10-02-26

साइबर ठगी पर सख्ती

संपादकीय

साइबर धोखाधड़ी और विशेष रूप से डिजिटल अरेस्ट के जरिये लोगों का पैसा हड़प करने के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह सीबीआइ, बैंकों और रिजर्व बैंक के रवैये पर नाराजगी प्रकट की, उससे यही पता चलता है कि लोगों को ठगी से बचाने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए, वह नहीं किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तो बहुत ही गंभीर है कि कई मामलों और खासकर डिजिटल अरेस्ट के मामलों में बैंक अधिकारी आरोपितों से मिले होते हैं और इसी कारण साइबर ठग लोगों की जमापूंजी आसानी से हड़प ले रहे हैं।

इस टिप्पणी को निराधार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह देखने में आया है कि ठगी के जरिये इधर-उधर हस्तांतरित की गई रकम को जब्त करने के लिए बैंक समय पर कार्रवाई नहीं करते। समझना कठिन है कि जिन खातों से रकम इधर-उधर की जाती है, उनके खिलाफ बैंक तत्परता के साथ कार्रवाई क्यों नहीं करते? तत्परता का यह अभाव ही बैंकों की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। यदि बैंक कर्मचारी सतर्क रहें तो साइबर फ्राड के मामलों पर एक बड़ी हद तक लगाम लग सकती है।

बैंकों के पास ऐसा कोई सिस्टम होना ही चाहिए कि यदि किसी खाते से निकली राशि आनन-फानन एक के बाद एक कई अन्य खातों में स्थानांतरित हो रही हो तो वे उसका संज्ञान ले सकें। आम तौर पर ऐसा साइबर धोखाधड़ी के मामले में ही होता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की ओर से रिजर्व बैंक को ऐसे निर्देश देना आवश्यक हो गया था कि वह जिन खातों से धोखे से निकाला गया पैसा इधर-उधर किया जाता है, उन पर संबंधित बैंकों की जवाबदेही तय करे। आखिर अभी तक ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा था?

चूंकि साइबर ठगी के मामलों में पुलिस एवं अन्य एजेंसियों को तत्परता से कार्रवाई करना आवश्यक होता है और प्रायः इसमें ढिलाई देखने को मिलती है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को सीबीआइ को भी निर्देश देना पड़ा कि ऐसे मामलों में तेजी से कार्रवाई की जाए। देखना है कि ऐसा हो पाता है या नहीं, क्योंकि साइबर ठगी के मामले जिस तरह बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए इसमें संदेह है कि सीबीआइ उन सबकी जांच करने में सक्षम होगी।

स्पष्ट है कि पुलिस को भी साइबर ठगी के मामलों की जांच में समर्थ होना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साइबर ठगी रोकने के लिए गृह मंत्रालय, रिजर्व बैंक और टेलीकाम अथारिटी के बीच तालमेल बढ़ाने की आवश्यकता जताई और इस संदर्भ में स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर पूरे देश में लागू करने के निर्देश दिए। अच्छा होता कि सरकार अब तक यह काम अपने स्तर पर ही कर लेती। वह इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकती कि डिजिटल धोखाधड़ी से 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि हड़पी जा चुकी है। यह राशि कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है।


Date: 10-02-26

राष्ट्रीय मिशन बने महाशक्ति बनना

दिव्य कुमार सोती, ( लेखक काउंसिल ऑफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं )

कुछ समय पहले भारी मुनाफा कमाने वाली एक भारतीय कंपनी ने एक छोटी सी चीनी कंपनी से सौर ऊर्जा से जुड़ी तकनीक खरीदनी चाही, परंतु उसने देने से मना कर दिया। यह तब हुआ, जब भारत अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस का संस्थापक है। भारत ने फ्रांस के साथ इस अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना 2015 में की थी। यह अपनी तरह का पहला बड़ा संगठन है, जिसका मुख्यालय भारत में स्थित है। इसका उद्देश्य 125 सदस्य देशों के साथ मिलकर 2030 तक सौर ऊर्जा उत्पादन में एक ट्रिलियन डॉलर का निवेश और 1000 गीगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन है। चीन को कई बार इसमें शामिल होने का न्योता दिया गया, पर उसने स्वीकार नहीं किया।

विडंबना यह है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय संगठन के अगुआ भारत की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक को चीन की छोटी सी कंपनी के पास ही सौर ऊर्जा से जुड़ी तकनीक मांगने जाना पड़ा। इसका कारण यह है कि हजारों करोड़ रुपये प्रति तिमाही का मुनाफा कमा रही भारतीय कंपनियां भी नई तकनीक के अनुसंधान में भारत में निवेश नहीं करना चाहती हैं। वे खुदरा माल-सेवाओं के आपूर्तिकर्ता मात्र के रूप में अपने व्यापार का विस्तार कर रही हैं और टेक्नोलाजी के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। इसी कमजोरी के चलते हम विश्व स्तर पर नेतृत्व देने में अक्षम हैं। विश्व शक्तियां हमें अक्षम ही बने रहने देना चाहती हैं। इसका ताजा उदाहरण अमेरिका के नेतृत्व वाला पैक्स सिलिका गठजोड़ है।

पैक्स सिलिका महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में काम आने वाले दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति और प्रसंस्करण से जुड़ी आपूर्ति शृंखलाओं को पिरोकर चीन जैसे देशों के इस क्षेत्र पर नियंत्रण से निकलने के उद्देश्य से बनाया गया है। पहले भारत ने इससे जुड़ने की इच्छा जताई थी, परंतु ट्रंप प्रशासन ने उसे नकार दिया था। इस पर भारत के कुछ उद्योगपतियों ने कहा था कि यदि सरकार उनके साथ सहयोग करे तो वे दुर्लभ खनिजों का खनन और प्रसंस्करण भारत में कर सकते हैं।

भारत के पास चीन और ब्राजील के बाद दुर्लभ खनिजों का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, जबकि अमेरिका इस मामले में विश्व में सातवें नंबर पर है। ट्रंप साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग कर ग्रीनलैंड पर कब्जे के प्रयास में इसलिए जुटे, क्योंकि ग्रीनलैंड के पास विश्व का आठवां सबसे बड़ा दुर्लभ खनिजों का भंडार है। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल भी कर ले तब भी 3.4 मीट्रिक टन के साथ उसका स्थान सातवां ही रहेगा।

विचारणीय यह है कि दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में भारत को अमेरिका का पिछलग्गू बनना चाहिए या आत्मनिर्भर? जैसे ही भारतीय उद्योगपतियों ने स्वयं इन खनिजों के खनन और प्रसंस्करण करने की बात कही, अमेरिका ने तुरंत अपनी चाल बदलकर भारत को पैक्स सिलिका में जुड़ने के लिए आमंत्रित कर लिया। इसकी वकालत करने वाली एक लाबी के अनुसार इन दुर्लभ खनिजों का खनन और प्रसंस्करण बहुत जटिल प्रक्रिया है, इसलिए भारत का अमेरिका की अगुआई में काम करना आसान रहेगा, पर जब हमें यह सब आसानी से उपलब्ध होने लगेगा तो हम शिथिल पड़ जाएंगे और खनन और प्रसंस्करण तकनीकी में निवेश ही नहीं करेंगे। प्रश्न यह है कि इस जटिल काम को चीन ने कैसे कर लिया?

चीन 1986 में ही अमेरिका को पीछे छोड़ दुर्लभ खनिजों का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया था। 1985-95 के बीच चीन में इन खनिजों का उत्पादन 464 प्रतिशत बढ़ा। 2004 आते-आते चीन विश्व भर के 90 प्रतिशत दुर्लभ खनिजों का निर्यातक बन चुका था। आज चीन विश्व दुर्लभ खनिजों का 70 प्रतिशत खनन, 90 प्रतिशत शोधन और रेयर अर्थ मैग्नेट के 90 प्रतिशत उत्पादन को नियंत्रित करता है। जो काम चीन 1980-90 के दशक में कर पाया वह हम आज क्यों नहीं कर सकते? आत्मनिर्भरता क्या आत्मसंदेह से आएगी। जब विश्व ने परमाणु तकनीक भारत को देने से मना कर दिया था तो क्या हमने परमाणु बम नहीं बना लिया था? इसके उलट उदाहरण भी देख लीजिए।

हम हमेशा फाइटर जेट विदेश से आयात करते रहे हैं। इसके चलते हम आज तक इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं, जबकि विश्व की हर महाशक्ति अमेरिका, रूस, फ्रांस, यूरोपीय संघ, चीन अपने फाइटर जेट और उसके इंजन स्वयं बनाते हैं। खबरें हैं कि भारत को एक बार फिर लाखों करोड़ रुपये खर्च करके फ्रांस, रूस या अमेरिका में से किसी एक से फाइटर जेट आयात करने पड़ेंगे, क्योंकि भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों के बस अब मात्र 29 स्क्वाड्रन ही बाकी रह गए हैं, जबकि होने कम से कम 42 स्क्वाड्रन चाहिए। यह स्थिति इसलिए है, क्योंकि तेजस का उत्पादन समय से नहीं हो पाया और स्वदेशी जेट इंजन बनाने का कार्यक्रम भी अधूरा ही रहा।

1989 में प्रारंभ किए गए कावेरी जेट इंजन कार्यक्रम में भारत ने 2008 तक मात्र 2000 करोड़ रुपये का निवेश किया और फिर उसे असफल पाकर तेजस प्रोजेक्ट से अलग कर दिया। पिछले 40 साल में भारत ने कावेरी इंजन कार्यक्रम पर अधिकतम ₹5000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जबकि चीन तीन लाख पचास हजार करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। आज चीन के पास छठी पीढ़ी के स्वनिर्मित लड़ाकू विमान जे-20 के लिए अपना जेट इंजन तैयार है, जबकि हम चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विदेश से खरीदने के लिए तीन-चार लाख करोड़ रुपये खर्च करने वाले हैं। क्या कोई यह वादा कर सकता है कि हम अंतिम बार विदेशी लड़ाकू विमान खरीदने जा रहे हैं?

चीन छठी पीढ़ी के 100-120 लड़ाकू विमान बना रहा है और हम चौथी पीढ़ी के 6-12 जहाज बना पा रहे हैं। कारण यह है कि इसके इंजन के लिए हम अमेरिका पर निर्भर हैं। तीन-चार लाख करोड़ रुपये विदेशी लड़ाकू विमानों पर खर्च करने के बाद हमारी सरकार स्वदेशी जेट इंजन के विकास पर कितना खर्च कर पाएगी, यह भी विचारणीय है। जब तक इन सेक्टरों में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय मिशन नहीं बनाया जाएगा, तब तक भारत के एक आत्मनिर्भर विश्वशक्ति बनने पर प्रश्नचिह्न लगा रहेगा। भारत के महाशक्ति बनने का मार्ग आसान नहीं है और न ही आसान रास्ते से महाशक्ति बना जा सकता है।


Date: 10-02-26

सुशासन और जनभागीदारी में छिपा प्रदूषण का समाधान

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली, ( पर्यावरण वैज्ञानिक )

दिल्ली में 23 जनवरी को हुई बारिश और आंधी चलने के कारण प्रदूषण में भारी कमी जरूर आई, किंतु वायु गुणवत्ता सुधरकर भी बहुत खराब स्थिति’ से केवल ‘खराब स्थिति’ तक सुधर पाई। 20 जनवरी को भी वर्षा हुई थी, तब बाद के तीन दिनों में वायु प्रदूषण ने ‘गंभीर स्थिति’ से सुधरकर ‘बहुत खराब स्थिति की श्रेणी का ही सफर तय किया था। हालांकि, यह स्थिति भी सारे रिपोर्टिंग केंद्रों में एक सी नहीं थी। उस दौरान गाजीपुर, आनंद विहार व जहांगीरपुरी में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 445-449 यानी, गंभीर स्थिति में था। भारतीय मानकों में एक्यूआई यदि 401 से ऊपर हो, तो वह वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति कहलाती है।

बीती 25-27 जनवरी की भारी बरसात के बाद भी 28 तारीख को दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘खराब’ की श्रेणी में था। घने कोहरे और कम तापमान में 5 फरवरी तक 27 रिकॉर्डिंग स्टेशनों द्वारा यह सूचकांक ‘बहुत खराब’ और 10 स्टेशनों में ‘खराब’ श्रेणी में दर्ज किया गया। मानकों के अनुसार, अच्छे दिन में एक्यूआई 50 तक ही होते हैं। 51- 100 एक्यूआई संतोषजनक तथा 101 से 200 तक मध्यम श्रेणी का माना जाता है।

दिल्ली में सालों से, खासकर धुंध के दिनों की खराब स्थिति में सुधार हवा की गति – दिशा, बरसात और सूरज की स्थिति पर निर्भर करता है। हवा की गति कम होने से प्रदूषण कम फैलता है, जबकि हवा तेज होने से उसका विस्तार हो जाता है। तेज हवा में प्रदूषण अधिक ऊंचाई तक जाता है, जिससे हवा ‘ बेहद खराब’ और ‘खराब’ श्रेणी से सुधरने लगती है। बरसात का मौसम हो, तो सूचकांक घटने और शुष्क होने पर बढ़ने लगता है। बारिश यदि पराली जलाने के दिनों में हो, तो वर्षा के थमने पर भी गीली जमीन व नम हवा के कारण पराली कम जलती है। इससे पीएम 10 के कण हवा में कम रहते हैं । हवा के साथ दिल्ली के भीतर ही ज्यादा प्रदूषण वाली जगहों से कम प्रदूषित जगहों पर प्रदूषण पहुंच सकता है। कुछ साल पहले तो यह भी दलील दी गई थी कि दिल्ली के वायु प्रदूषण में पाकिस्तान से आए धूलकणों का भी योगदान रहता है।

भारत में 10 वर्ष पूर्व हुए वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला था कि करीब 800 मीटर की ऊंचाई पर वायु प्रदूषण कम हो जाता है। बहुत ऊंचाई तक पहुंचा प्रदूषण मौसम को भी प्रभावित कर सकता है। प्रदूषण के जो कण ऊपर पहुंचते हैं, वे रासायनिक या प्रदूषके सघनता में अंतर ले आते हैं। हवा मंद रही, तो प्रदूषण कम फैलेगा और हवा की गति तेज हुई, तो फैलाव अधिक होगा। गति के साथ हवा की दिशा भी महत्वपूर्ण होती है।

24 नवंबर, 2021 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एन वी रमन्ना की अगुवाई वाली पीठ ने कहा था कि वायु प्रदूषण की ‘खराब’ स्थिति आ जाने पर ‘ग्रेडेड रिस्पांस’ के अंतर्गत कोई कदम उठाने के बजाय मौसमी पूर्वानुमानों के आधार पर अग्रिम कार्रवाई की जानी चाहिए। ज्ञात हो कि ‘ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान’ यानी ग्रैप दिल्ली-एनसीआर में चायु गुणवत्ता के खराब होने पर प्रदूषण रोकने के चरणवद्ध आपात उपाय हैं। दिल्ली को प्रदूषण से बचाने के लिए बहुत कुछ न भी किया जा सके, तब भी कुछ प्रदूषण सुशासन व जन- सहभागिता से कम किए जा सकते हैं।

भारी वाहनों के आवागमन वाले औद्योगिक क्षेत्रों में यदि सड़कें टूटी-फूटी नहीं, तो वातावरण में गैसीय व कणीय, दोनों प्रकार के प्रदूषक कम उड़ेंगे। कचरा वाले गड्ढों (लैंड फिल) को बीच-बीच में खाली किया जाए, बिजली की सही आपूर्ति हो, जेनरेटर पर प्रतिबंध रहे सड़कों पर साइकिल पथ, पैदल पथ व अंडरपास इतने सुरक्षित हों कि लोग इनका बेहिचक उपयोग कर सकें।

इतना ही नहीं, कूड़े खुले में न जलें, धुआं छोड़ते वाहन सड़कों पर न हों, वाहन ईंधनों में मिलावट न हो, तब हवाओं में प्रदूषकों का भार कम होगा। ऐसे में, बारिश और तेज हवा के बिना भी प्रदूषकों में कुछ कमी अवश्य आएगी। गौरतलब यह भी है कि दिल्ली में जगह-जगह वायु गुणवत्ता सूचकांक में भारी अंतर होता है। इन अंतरों और भौगोलिक कारणों का पता लगाकर वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है।