09-08-2023 (Important News Clippings)

09 Aug 2023
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It’s Basic, Really

Delhi services bill may have cleared Parliament. But it will still have to pass the basic structure test in SC.

TOI Editorials

The debate in Rajya Sabha on Monday over the Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Bill witnessed an unusual intervention. Ex-CJI Ranjan Gogoi while making a case for the bill questioned the basic structure doctrine that limits the legislature’s power to change core features of the Constitution. It’s been noted that this was at odds with his view on the subject when he was a Supreme Court judge. It’s 50 years since the Kesavanada Bharati verdict introduced the basic structure. The pushback however continues.

Basic structure is best understood as a non-negotiable aspect of the checks and balances in a parliamentary democracy. It’s a balancing instrument that works by drawing boundaries. Invocation of basic structure is never abstract. For example, a constitutional bench used it in a verdict delivered in May on the division of powers between GOI and Delhi government. The verdict said that democracy and federalism are a part of the basic structure of the Constitution. How does it work in practice? According to the constitutional bench, a triple chain of accountability is the framework that gives effect to democracy. The chain comprises bureaucracy, a government and a legislature, which emerges after a popular mandate. Consequently, the case went in Delhi government’s favour.

Political parties have not always been accepting of limits on Parliament’s powers to amend the Constitution. In the 1971 general election, two years before the Kesavananda Bharati case, quite a few parties in their manifestos wanted changes that ensured that Parliament’s powers to alter the Cons- titution wasn’t subject to judicial restraint. However, over time, all major political parties have been supportive of the basic structure doctrine. Over five decades, its essentiality has been accepted by all stakeholders.

But there are and will be sceptics. Some of it stems from judicial over- reach and the fear that the basic structure can become a cover to enable it. However, notwithstanding odd judgments that may trigger such fears the concept has stood the test of time. The basic structure constraint can also catalyse more insightful parliamentary debates and attempts at bridge building because restraints on exercise of power push parties to create a consensus. Even though Parliament passed the Delhi services bill, the last word on it hasn’t been said. In July, the apex court referred the ordinance, which preceded the Delhi services bill, to a constitutional bench. It remains to be seen if the bill clears the basic structure test.


Falling short

The data protection Bill continues to have deficiencies that need cleaning up.


The Digital Data Protection Bill, 2023, was passed in the Lok Sabha on Monday and will now have to be cleared by the Rajya Sabha. The fresh iteration, which has undergone a few drafts, seems to have incorporated suggestions made to its 2022 version, although it is not clear what the submissions were as the consultation process was not brought to light by the government. The highlight of the Bill is the provision that personal data of an individual, the data principal, may be processed by an entity or a person, the data fiduciary, for a lawful purpose only after the consent of the data principal or “for certain legitimate uses”. These “uses” are situations where such data may be processed without obtaining the data principal’s consent, such as by government agencies for providing licences, welfare benefits, permits and services. This Bill includes an obligation on the part of the data fiduciary to notify the data principal — and the Data Protection Board (DPB), to be established by the government to adjudicate on compliance or not with the Bill — if there is a personal data breach. There are other obligations defined for the data fiduciary as well, but one issue with the Bill is that it does not include the need for informing data principals about third-parties with whom the data could be shared, or duration of storage.

Too much leeway is provided to agencies of the state in the form of exemptions. The Srikrishna Committee’s Draft Bill in 2018 allowed for exemptions to be granted to state institutions from acquiring informed consent from data principals or to process their data in matters related only to the “security of the state”, and also called for a law to provide for parliamentary oversight and judicial approval of non-consensual access to personal data. In the 2023 version, the state is empowered to process data through wide-ranging exemptions and the government is allowed, in effect, to collect information which could be used for mass surveillance. In overriding consent to be obtained by the state from the data principal for purposes of providing benefits, subsidies, and licences, the Bill also does away with purpose limitation — using the data only for the specified purpose. It seeks to introduce amendments that effectively remove the public interest exception to disclosure of personal information under the Right to Information Act, thereby diluting accountability and transparency in the functioning of government officials. The Bill also continues to retain a much weaker version of the regulatory Data Protection Authority envisaged in the 2018 version in the DPB which will only have adjudicatory and not regulatory powers, and whose members will be appointed by the Union government. The Bill must be thoroughly discussed and these discrepancies ironed out in the Rajya Sabha.


मणिपुर संकट पर ‘सुप्रीम’ समाधान सराहनीय पहल


बिना किसी क्षति के किसी जटिल समस्या का हल खोजना रणनीतिक कौशल है। सुप्रीम कोर्ट ने चार महीने से चल रही मणिपुर हिंसा की जांच, शमन और राहत के लिए जो रास्ता निकाला है, उसमें किसी भी सरकारी एजेंसी पर न तो आरोप लगाए गए, न ही उनके हाथ से जांच या राहत कार्य वापस लिया गया। लेकिन कोर्ट ने एक ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें पुलिस, सीबीआई मनमानी नहीं कर सकेंगी। राज्य पुलिस की एसआईटी सभी 42 मामलों की जांच पूर्ववत् करती रहेगी लेकिन हर जांच एक बाहर के राज्य के इंस्पेक्टर के अधीन होगी और कोर्ट द्वारा नियुक्त बाहर से लाए गए छह डीआईजी (हर सात मामलों पर एक ऐसे मामलों की जांच को मॉनिटर करेंगे। इसी तरह सीबीआई यौन हिंसा के जो 11 मामले देख रही है, उनके लिए बाहर से एसपी / डीएसपी इस विशेष कार्य के लिए लाए जाएंगे, जो जांच कार्य पूरा होने तक रहेंगे। ये सभी जांच बगैर पूर्वाग्रह के हों, इसे सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र के एक पूर्व डीजीपी लाए जाएंगे, जो कि नगालैंड में आईबी के लिए काम कर चुके हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि बेंच किसी भी संस्था पर इस स्टेज पर कोई अंगुली नहीं उठा रही है, लेकिन व्यवस्था में कुछ अलग से करना जनता का विश्वास जीतेगा। जिन दो महिलाओं को निर्वस्त्र किया गया, दुर्व्यवहार हुआ और उनके भाई-पिता की हत्या की गई, उनका आज तक आरोप है कि पुलिस ने ही उन्हें भीड़ को सौंप दिया था। लेकिन कोर्ट ने अभी पुलिस की भूमिका पर टिप्पणी नहीं की। इसके साथ ही राहत, पुनर्वास और आगजनी के शिकार घरों की मरम्मत आदि का कार्य भी तीन महिला जजों की समिति करेगी। सरकार केवल अमल करेगी। सुप्रीम कोर्ट की यह व्यवस्था भारत ही नहीं दुनिया के लिए प्रबंधन – कौशल का अद्भुत उदाहरण है। सरकारों के लिए भी यह एक नजीर होगी।


भरोसे की निगरानी


आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने मणिपुर हिंसा को लेकर अपनी व्यवस्था दे दी है। पहले उसने केंद्र और राज्य सरकार से सख्त लहजे में कहा था कि मणिपुर में हिंसा रोकने के लिए आप कुछ कीजिए, नहीं तो हम करेंगे। मगर सरकारों ने उसके निर्देश को गंभीरता से नहीं लिया। फिर दूसरी सुनवाई में प्रधान न्यायाधीश ने और सख्त टिप्पणी की थी कि मणिपुर में कानून-व्यस्था ध्वस्त हो चुकी है। अदालत ने मणिपुर पुलिस से पूछा था कि बलात्कार और हिंसा के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने में इतना समय क्यों लगा। उसने तमाम प्राथमिकियों का ब्योरा भी मांगा था, मगर पुलिस के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं था। इस बार मणिपुर के पुलिस महानिदेशक को तलब किया गया था। उनके सामने ही अदालत की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने तीन सेवानिवृत्त महिला न्यायाधीशों की एक न्यायिक समिति की घोषणा की। इस समिति की व्यापक भूमिका होगी। वह सीबीआइ जांचों की निगरानी के साथ-साथ निदान, राहत, मुआवजे और पुनर्वास संबंधी प्रयासों का आकलन करेगी। वह राहत शिविरों की निगरानी भी करेगी। इसके अलावा महाराष्ट्र के एक पूर्व पुलिस महानिदेशक को सीबीआइ जांच पर नजर रखने के लिए नियुक्त किया गया है। राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दलों पर निगरानी के लिए बाहर के पुलिस अधीक्षक श्रेणी के अधिकारियों को नियुक्त किया गया है।

इस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने पहले से चल रही जांचों को न तो रोका है और न मुकदमों को बाहर भेजा है, पर केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से चल रही गतविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी है। यह पहला मौका है जब सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार की व्यवस्था के ऊपर अपनी एक व्यवस्था लागू कर दी है। इससे स्पष्ट है कि अब भी सर्वोच्च न्यायालय को सरकार की व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। न्यायिक समिति सीधा सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। स्वाभाविक ही इससे सीबीआइ और राज्य जांच दल अपनी जांचों में कुछ संजीदा हो सकेंगे। दरअसल, मणिपुर में हिंसक टकराव चलते तीन महीने से ऊपर हो गए, मगर अब तक उसे रोकने के लिए न तो राज्य सरकार की तरफ से कोई गंभीर प्रयास दिखाई देता है और न केंद्र की तरफ से। पुलिस पर भी पक्षपातपूर्ण व्यवहार के आरोप लगते रहे हैं। इस हिंसक टकराव में करीब दो सौ लोग मारे जा चुके हैं, सैकड़ों घर और पूजा स्थल आग के हवाले किए जा चुके हैं। अनेक महिलाओं के साथ बलात्कार की शिकायतें हैं। दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके सड़क पर घुमाने की घटना ने तो पूरी दुनिया को विचलित कर दिया था।

उसके बाद भी सरकारें गंभीर नजर नहीं आईं। रोज ही हिंसक घटनाएं हो जाती हैं। उपद्रवी तत्त्व पुलिस शस्त्रागारों से हथियार लूट ले जाते हैं और वह हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। राहत शिविरों में करीब साठ हजार लोग त्रासदी झेल रहे हैं। मणिपुर के लोग लंबे समय से केंद्र सरकार से यह हिंसा रोकने की गुहार लगा रहे हैं। मगर इस दिशा में कोई भरोसेमंद पहल नहीं दिखती। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का यह सख्त कदम निश्चित रूप से मणिपुर के लोगों में संवैधानिक व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करने वाला है। इससे उन लोगों की पहचान हो सकेगी, जिन्होंने यह हिंसा भड़का कर अपना स्वार्थ साधने की कोशिश की। पीड़ितों के पुनर्वास, उचित मुआवजे और न्याय का भरोसा जगा है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम दोनों सरकारों के लिए एक कड़ा संदेश है।


टकराव नहीं सहयोग


संसद के उच्च सदन राज्य सभा में सात घंटे से अधिक समय तक चर्चा के बाद ‘दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र शासन संशोधन विधेयक-2023’ पारित हो गया। विधेयक के पक्ष में 131 जबकि विरोध में 102 मत पड़े। लोक सभा में यह विधेयक पहले ही पारित हो चुका है। अब इस विधेयक को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। विधेयक पर चर्चा करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह से दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने अधिकारियों के तबादले शुरू किए थे, उसको देखते हुए विधेयक लाना जरूरी हो गया था। दिल्ली सरकार के विरुद्ध कई मामलों की जांच कर रही विजिलेंस को अपने अधीन रखने के लिए आप सरकार बेचैन थी ताकि भ्रष्टाचार न उजागर हो। दूसरी ओर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस विधेयक को दिल्ली के लोगों को गुलाम बनाने वाला बताया। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों का मानना है कि केंद्र सरकार के पास इस विधेयक को लाने का नैतिक अधिकार नहीं है, यह संघीय संरचना पर कुठाराघात है, वगैरह-वगैरह। गृह मंत्री ने चर्चा के दौरान देश की राजधानी दिल्ली की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संविधान सभा में दिल्ली के अधिकार और कार्यों के बारे में चर्चा के साथ सीमित अधिकारों वाली विधानसभा के साथ 1993 में इसे राज्य का दर्जा दिए जाने का पूरा ब्यौरा दिया। जाहिर है दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, और केंद्र सरकार को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार दिल्ली के किसी भी विषय पर कानून बनाने का अधिकार है। निस्संदेह भारत एक संघ है। संविधान के अनुच्छेद 1 में उल्लिखित है कि इंडिया जो भारत है, राज्यों का एक संघ होगा, लेकिन इसका झुकाव एकात्मक प्रणाली की ओर है। शक्तियों का विभाजन केंद्र के पक्ष में है। दक्ष राजनीतिक नेता या किसी राज्य का मुख्यमंत्री इन बातों के आलोक में ही केंद्र के साथ रचनात्मक सहयोग करके अपना शासन चलाता है। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के समय कभी भी केंद्र के साथ टकराव नहीं हुआ और उन्हें हमेशा केंद्र सरकार का सहयोग और समर्थन मिलता रहा। केजरीवाल अपने अल्प राजनीतिक जीवन में इस बात को समझ नहीं पाए। केंद्र सरकार का आरोप है कि केजरवाल की सरकार भ्रष्टाचार के दल-दल में आकंठ डूबी हुई है। केंद्र सरकार के साथ अनावश्यक टकराव की परिणति यह हुई कि दिल्ली को अब शायद ही कभी पूर्ण राज्य का दर्जा मिल पाएगा। इससे अधिक नुकसान दिल्ली की जनता का हुआ।


कारोबारी सुगमता से बनी बात

डॉ. जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में 27 जुलाई को लोक सभा ने जिस जनविश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2023 को मंजूरी दी है, वह उद्योग-कारोबार बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इसमें कारोबार सुगमता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 42 अधिनियमों में 183 प्रावधानों में संशोधन कर छोटी-मोटी गड़बड़ियों को अपराध की श्रेणी से हटाने का प्रस्ताव किया गया है। ये 42 कानून जिन 19 केंद्रीय मंत्रालयों से संबद्ध हैं, उनमें वित्त, वित्तीय सेवाएं, कृषि, वाणिज्य, पर्यावरण, सड़क परिवहन और राजमार्ग, डाक, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय भी शामिल हैं। विभिन्न अधिनियमों में संशोधन के जरिए मुकदमों में वृद्धि से बचने के लिए जहां भी संभव हो कारावास के साथ जुर्माने को हटाकर नियम का उल्लंघन करने पर मौद्रिक दंड लगाए जाने तथा छोटे-मोटे अपराधों को अपराधमुक्त करने के प्रस्ताव के अलावा अपराध की गंभीरता के आधार पर मौद्रिक दंड को तर्कसंगत बनाने, भरोसे पर आधारित राजकाज को बढ़ावा देने के भी प्रस्ताव किए गए हैं।

ज्ञातव्य है कि उद्योग-कारोबार को आसान बनाने के लिए विगत 9 वर्षो में करीब 1,500 पुराने कानूनों और 40 हजार अनावश्यक अनुपालन को समाप्त कर दिया गया है। आर्थिक क्षेत्र में जीएसटी और दिवालिया कानून जैसे सुधार किए गए हैं। बैंकिंग क्षेत्र में जोरदार सुधार करके मजबूत वृहद् आर्थिक बुनियाद की मदद से अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया गया है। कॉरपोरेट टैक्स कम किया गया है। कारोबार का खुद संचालन करने की बजाय सरकार ने कारोबार करने के लिए आधार तैयार किया है। गौरतलब है कि 17 जुलाई को विश्व प्रसिद्ध ब्रोकरेज कंपनी बर्नस्टीन द्वारा भारत में आर्थिक-वित्तीय सुधार एवं डिजिटलीकरण पर प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ऐतिहासिक सुधारों, बुनियादी ढांचा विकास, वित्तीय समावेशन और डिजिटलीकरण के बल पर कारोबार सुगमता की डगर पर लंबी छलांग लगाते हुए दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। इन दिनों प्रकाशित हो रहीं कारोबार की अनुकूलताओं से संबंधित अन्य कई वैश्विक रिपोर्टों में भारत में कारोबार सुगमता के परिवेश को रेखांकित किया गया है। संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (यूएनईएससीएपी) की डिजिटल एवं टिकाऊ व्यापार सुविधा संबंधी रिपोर्ट में भारत 140 देशों को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में सबसे आगे पहुंच गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पारदर्शिता, औपचारिकताएं, संस्थागत व्यवस्था, सहयोग और कागजरहित व्यापार संबंधी मूल्यांकन में भारत ने 100 प्रतिशत की उत्कृष्ट रैंक हासिल की है। 2021 में प्रकाशित डिजिटल एवं टिकाऊ व्यापार सुविधा रिपोर्ट में भारत ने 90.32 फीसद अंक हासिल किए थे तथा 2019 में इस रिपोर्ट में भारत को 78.49 फीसद अंक मिले थे। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि पिछले चार वर्षो में भारत डिजिटल एवं टिकाऊ व्यापार सुविधाओं में छलांग लगाकर आगे बढ़ा है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि कारोबार में बढ़ती अनुकूलताओं के कारण भारत में ख्याति प्राप्त वैश्विक फाइनेंस और कॉमर्स कंपनियां अपने कदम तेजी से बढ़ा रही हैं। इतना ही नहीं, भारत से कई विकसित और विकासशील देशों के लिए कई काम बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिंग पर हो रहे हैं। अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां नई प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय आईटी प्रतिभाओं के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत में अपने ग्लोबल इनहाउस सेंटर (GIC) तेजी से बढ़ाते हुए दिखाई दे रही हैं। भारत में स्थित वैश्विक फाइनेंशियल फर्मो के दफ्तर ग्लोबल सुविधाओं से सुसज्जित हैं। इन फर्मो में बड़े पैमाने पर प्रतिभाशाली भारतीय युवाओं की नियुक्तियां हो रही हैं। भारत के युवाओं ने डिजिटल और उद्यमिता के क्षेत्र में दुनिया भर में दबदबा कायम किया है। 100 से ज्यादा यूनिकॉर्न बनाए हैं, और एक लाख से ज्यादा नये स्टार्टअप हैं। यह बात महत्वपूर्ण है कि एक अप्रैल, 2023 से लागू देश की नई विदेश व्यापार नीति (FTP) विदेश व्यापार को सरल बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। नई विदेश व्यापार नीति के तहत सरकार निर्यात का दायरा बढ़ाने के लिए जिला स्तर पर एक्सपोर्ट हब की स्थापना करने की डगर पर आगे बढ़ी है। इससे निर्यात से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी दूर हो सकेगी। सरकार वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट की पहचान का काम पहले ही पूरा कर चुकी है। जिला स्तर पर निर्यात सुविधा विकसित होने से उस जिले के उत्पाद को आसानी से निर्यात किया जा सकेगा। ई-कॉमर्स के माध्यम से होने वाले निर्यात के प्रोत्साहन के लिए अलग से ई-कॉमर्स जोन की स्थापना की ओर तत्परता से आगे बढ़ा जा रहा है। कुरियर सेवा के माध्यम से होने वाले निर्यात की वैल्यू लिमिट को 5 लाख से बढ़कर 10 लाख रुपये प्रति खेप कर दिया गया है। निश्चित रूप से डिजिटल एवं टिकाऊ व्यापार के मद्देनजर भारत लाभ की स्थिति में है। लेकिन स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अभी सीमित संख्या में ही भारत की कौशल प्रशिक्षित प्रतिभाएं डिजिटल कारोबार की जरूरतों को पूरा कर पा रही हैं। अब दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले भारत को बड़ी संख्या में युवाओं को डिजिटल कारोबार के दौर की ओर नई तकनीकी योग्यताओं के साथ एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, मशीन लर्निग एवं अन्य नये डिजिटल स्किल्स से सुसज्जित किया जाना होगा।

अब भारत द्वारा यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कनाडा, खाड़ी सहयोग परिषद (JCC) के छह देशों, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और इस्रइल के साथ एफटीए के लिए प्रगतिपूर्ण वार्ताएं तेजी से पूरी करनी होंगी। रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयास तेज करने होंगे। देश की नई विदेश व्यापार नीति, नई लॉजिस्टिक नीति और गति शक्ति योजना की अभूतपूर्व रणनीतियों से भारत को आर्थिक प्रतिस्पर्धी देश के रूप में तेजी बढ़ना होगा। हमें 2023 में जी-20 की अध्यक्षता के दौरान इस सम्मेलन की विभिन्न बैठकों में पहुंचने वाले विशिष्ट विदेशी प्रतिनिधियों को भारत के डिजिटल विकास और कारोबारी सुगमता के परिदृश्य से अच्छी से परिचित कराना होगा। निश्चित रूप से कारोबारी सुगमता के लिए ऐसे और अधिक प्रयासों से देश में उद्योग, कारोबार, निर्यात, निवेश तथा रोजगार के मौके बढ़ेंगे।


इजरायल में लोकतंत्र बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोग

हीरक ज्योति दास, ( सीनियर रिसर्च एसोशिएट, वीआईएफ )

मध्य एशियाई देश इजरायल इन दिनों एक बड़े राजनीतिक संकट से जूझ रहा है। बीती जनवरी से ही वहां के लोग प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ मुखर हैं। हालांकि, पहले छिटपुट आवाजें आती थीं, मगर अब प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरकर अपनी मांग बुलंद करने लगे हैं। उनकी मुख्य मांग है, उन कानूनों की वापसी, जिसे नेतन्याहू सरकार न्यायिक सुधार कहकर प्रचारित कर रही है। यह कथित सुधार असल में सत्ता-संतुलन की एक कवायद है, जिसका मकसद कानून बनाने और लोक-नीति तय करने में न्यायपालिका के प्रभाव को कम करना है। इसे जनवरी में ही प्रस्तावित किया गया था और जुलाई में संसद से पारित भी कर दिया गया।

आलोचकों का तर्क है कि इसके द्वारा सरकार ने न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास किया है, बल्कि न्यायिक समीक्षा करने, न्यायिक नियुक्तियों का अधिकार अपने हाथ में लेने और कानूनी सलाहकारों की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश भी की गई है। लिखित संविधान के अभाव में अब तक इजरायल में न्यायपालिका ने ही ‘चेक ऐंड बैलेंस’, यानी नियंत्रण को संतुलित करने का काम किया है। ऐसे में, न्यायिक सुधार का यह दांव लोकतंत्र के रूप में इजरायल की हैसियत को कमजोर कर सकता है। साथ ही, नए प्रावधानों के इस्तेमाल से वहां के समाज की धार्मिक पहचान बदल सकती है व लोगों की अस्मिता प्रभावित हो सकती है।

देखा जाए, तो अपनी ताकत बढ़ाने के लिए नेतन्याहू ने यह पूरी कवायद की है। यह आशंका इसलिए ज्यादा है, क्योंकि पिछले साल दिसंबर में सत्ता संभालने के बाद उन्होंने यह एलान किया था कि वह प्रधानमंत्री की अपनी भूमिका को विस्तार देंगे। धारणा यह भी है कि नेतन्याहू यह सब इसलिए कर रहे हैं, ताकि भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के जिन आरोपों का वह सामना कर रहे हैं, उनसे पार पा सकें। उल्लेखनीय है कि इजरायल में संसदीय लोकतंत्र होने के बावजूद प्रधानमंत्री के पास कई तरह की शक्तियां होती हैं। चूंकि यहां कोई लिखित संविधान नहीं है, इसलिए 11 बुनियादी कानूनों के आधार पर ही शासन-व्यवस्था चलाई जा रही है। चुनाव भी यहां चार साल में होते हैं, मतदाता किसी उम्मीदवार को नहीं चुनते, बल्कि 120 संसदीय सीटों के लिए पार्टियों का चयन किया जाता है।

यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि मजबूत लोकतंत्र की हैसियत रखने वाला यहूदी बहुल इजरायल किस तरह बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इसका स्वाभाविक असर दुनिया के बाकी हिस्सों, खासकर पड़ोसी देशों पर पडे़गा। अमेरिका में अब इजरायल के लिए समर्थन घटने लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर इस बात की गहरी नाराजगी है कि फलस्तीनियों के खिलाफ इजरायल की धुर दक्षिणपंथी सरकार लगातार दमनकारी कदम उठा रही है। ऐसे में, वाशिंगटन की यह सोच बन सकती है कि करीब 80 फीसदी यहूदी आबादी वाला यह देश अब लोकतंत्र से पीछे हट रहा है। हालांकि, भारत वहां की उथल-पुथल से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं होगा, लेकिन चूंकि कई मामलों में दोनों देश एक-दूसरे की जरूरत हैं, इसलिए नई दिल्ली की वहां की स्थिति पर नजर बनी हुई है। पश्चिम एशिया में भारतीय हितों की पूर्ति के लिए स्थिर इजरायल की हमें काफी ज्यादा जरूरत है। विरोध-प्रदर्शनों से तो द्विपक्षीय रिश्ता प्रभावित नहीं होगा, मगर यदि यह आग बढ़ती कई और पड़ोसी मुल्क भी इसकी चपेट में आते हैं, तो हमारी चिंता बढ़ सकती है। यह आशंका जताई जा रही है कि यहां का प्रदर्शन ईरान, सीरिया या लेबनान जैसे देशों की अंदरूनी स्थिति पर गंभीर असर डाल सकता है, जिस कारण हमारे हित भी प्रभावित हो सकते हैं।

मगर दिक्कत यह है कि वहां का विरोध-प्रदर्शन फिलहाल थमने वाला नहीं है। लोगों को आशंका है कि अब चूंकि नेतन्याहू के खिलाफ आरोपों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, इसलिए वह कहीं अधिक दमनकारी उपायों का सहारा लेंगे, और रूढ़िवादी ताकतें उनके इशारेपर उनकी धार्मिक अस्मिता को चोट पहुंचाएंगी। इसीलिए, न्यायिक सुधार की इस कवायद को वे हर हाल में रोकना चाहते हैं।

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