04-07-2016 (Important News Clippings)

04 Jul 2016
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Times of India

Date: 04-07-16

Digital India is dying :

Without intervention, Digital India looks to simply be a colony of US and China

Last year, Prime Minister Narendra Modi announced Digital India and Startup India, to declare India’s impending digital economy and local entrepreneurship ecosystem. Today, it looks as though India’s ability to build a local digital economy may be failing.

Companies such as Flipkart, Snapdeal and Ola which saw strong growth in the last few years, are faltering today at the hands of intense competition with deep pockets from Amazon and Uber, which are able to deploy cash and technology from the US into India. Similarly, India’s digital advertising economy is dominated by Google and Facebook, which would jointly capture more than 75% of all digital advertising revenues. Whilst many investors were excited at Digital India’s arrival, many are now walking away, viewing India simply as a digital colony of global digital businesses like Amazon and Alibaba. This is leaving India’s largest digital success stories in precarious positions. The likely outcome is that they will not be able to compete with global balance sheets.

Government has rightfully been liberalising the Indian economy across many sectors – but without a different approach for digital, the open route in the nascent digital sector may destroy local entrepreneurship just as it is starting.

Lessons can be drawn by comparing Europe and China today. Europe is effectively an extension of America’s digital economy, whereas China nurtured the development of local digital businesses by giving them time to build capabilities before global companies could enter. China’s digital economy will drive 21% of its GDP growth for the next ten years, driven by the fact that its digital economy is indigenous and has employed and developed lakhs of highly skilled digital technology talent – many from rural China. Baidu and Tencent (the Google and Facebook of China) which are two of hundreds of large internet companies in China – employ nearly 75,000 locals. Meanwhile, Europe struggles to develop real centres of innovation in technology that can compete.

Similarly, Google and Facebook’s India teams employ only a few hundred people here, primarily to promote their products built by thousands of engineers in California. If India had a local digital economy comparable to China, it could be the next driver of global growth, after the IT industry boom of the 1990s.

India is the top priority for global internet companies to extend their businesses here – but government must urgently evaluate whether this is really in the nation’s interests. Should India’s internet economy be an extension of the US and China’s large companies – or should it be a local economic driver of its own? If it prefers the latter, government must implement policies that enable and nurture local digital talent to have a level playing field with global behemoths.


Date: 04-07-16

Terror strike in Bangladesh a wake up call for both Dhaka and New Delhi

The terror strike in Bangladesh that killed 28 — 20 hostages, two policemen and six terrorists — is a wake-up call for both Dhaka and New Delhi.

The commando-style attack on a restaurant in an upscale locality of Bangladesh’s capital, holding people hostage, sorting them for allegiance to Islam, torture and murder of the infidels and release of the faithful and final fight to the finish are similar to the 2008 attack on Mumbai. Except that there were no foreign attackers. They were local youths from welloff families who had been radicalised and mobilised the material needed to mount the attack. Such attacks can happen again, in Bangladesh, India and Pakistan.

Whether the Islamic State had organisational links with the attackers is beside the point. The Islamic State and Al-Qaeda seek to brainwash people into jihadis who stage attacks on their own. Looking for evidence of the Islamic State’s tentacles snaking their way from West Asia to South Asia would be a waste of time.

In Pakistan, we have a state that believes in fomenting extremist ideologies based on religion to create terrorists it hopes will provide it with strategic depth.

Pakistan’s agencies used to have a free run in Bangladesh till Sheikh Hasina clamped down. Yet, all sorts of fanatics have been getting away with murder in Bangladesh, literally, for the last couple of years.

Dhaka cannot afford to show them any lenience. It is not enough for the Bangla prime minister to denounce the terrorists as un-Islamic. Her party and the government machinery must make it clear that there is no place for religious extremism in Bangladesh.

The same message must go out from the government of India, to both Islamic groups and Hindu vigilantes. Last Friday, Kerala witnessed a mass religious gathering of Muslims to denounce the Islamic State and take a pledge against terrorism. Such developments are welcome. But state policy cannot be built on religious self-affirmation. Politics and policy must adhere strictly to the constitutional values of liberal democracy; policing and intelligence must play their role as well.


Date: 04-07-16

विकास की विसंगतियां

वैसे भी प्रधानमंत्री कई बार कह चुके हैं कि हर रोग की एक दवा है-विकास। लेकिन यदि सब रोगों की एक दवा विकास है, तब पंजाब और कश्मीर में गड़बड़ी क्या है?

अभी एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने 2014 का चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा। उनके अनुसार देश की नई पीढ़ी केवल विकास में विश्वास करती है, लेकिन उनका सबसे महत्वपूर्ण कथन था, ‘मेरा विश्वास है कि विकास सारी समस्याओं का समाधान है। लोग जिस तनाव की बात करते हैं, उसका भी समाधान विकास में ही है। यदि हम लोगों को रोजगार दें, यदि हम उनकी थाली में भोजन सुनिश्चित करें, यदि हम उन्हें सुविधाएं और शिक्षा दें, तो सारे तनाव खत्म हो जाएंगे।’ आगे साक्षात्कार में जो बातें हुईं उससे स्पष्ट है कि ‘तनाव’ को सांप्रदायिक समस्या के संदर्भ में रखा गया था।

वैसे भी प्रधानमंत्री कई बार कह चुके हैं कि हर रोग की एक दवा है-विकास। लेकिन यदि सब रोगों की एक दवा विकास है, तब पंजाब और कश्मीर में गड़बड़ी क्या है? पंजाब सबसे विकसित राज्यों में एक है और कश्मीर भी सबसे सुंदर, समृद्ध प्रदेश है। भारत में खोजने पर भी कोई कश्मीरी या पंजाबी भिखारी शायद न मिले। इतने ‘विकसित’ होकर भी एक राज्य इस्लामी अलगाववाद से ग्रस्त है, तो दूसरा नशा-खोरी और कन्या भ्रूण-हत्या से, बल्कि पंजाब में अभी सिख अलगाववाद खत्म नहीं हुआ है। ऊपरी परत खुरच कर देखिए, खालिस्तान का विचार जिंदा है।

सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि खालिस्तानी आंदोलन के उग्र दौर में पंजाब का विकसित होना ही वहां अलगाववाद का एक आधार था। कई खालिस्तानी नेता मानते थे कि पंजाब तो कैलिफोर्निया बन सकता है, अगर यह पिछड़े और बदहाल शेष भारत से अलग हो जाए। अत: यदि ‘विकास’ सब रोगों की दवा मानें तो याद रहे कि निरा भौतिकवादी विकास खुद एक रोग है। इसीलिए धनी-मानी परिवारों के युवा नशाखोरी, व्यभिचार के आदी बन रहे हैं और कथित विकसित राज्य जमकर भ्रूण-हत्या कर रहे हैं। तब ‘सब रोगों की एक दवा-विकास’ कहना कैसा प्रमाद है।

यह मान्यता गलत है कि मनुष्य को रोजगार, भोजन, सड़क, बिजली आदि के सिवा कुछ नहीं चाहिए। अथवा जब तक ये सब न मिल जाए, तब तक कुछ और नहीं। लेकिन इससे बड़ा वैचारिक भ्रम नहीं हो सकता। वस्तुत: यह छिपे रूप में एक कम्युनिस्ट विचार ही है, जो ‘विकास’ नाम से चल रहा है। यह भी मनुष्य का अर्थ केवल उसका शरीर समझता है। मानो गरीब को दर्शन, कला या धर्म की जरूरत नहीं।

अत: कार्ल मार्क्स द्वारा धर्म को ‘अफीम’ कहना और ‘देवालय से शौचालय अधिक महत्वपूर्ण’ बताने में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। उसी तरह यदि ‘संविधान को धर्मग्रंथ’ बताया जा रहा है तब भगवद्गीता या उपनिषद क्या हैं? उत्तर यही हो सकता है कि ये पुस्तकें अंधविश्वास या गल्प साहित्य हैं, यानी अप्रासंगिक चीजें हैं। ठीक यही समझ सारे कम्युनिस्टों की रही है। क्या भाजपा और संघ का ‘एकात्म मानववाद’ भी यही है?

याद रहे कि सोवियत संघ भौतिक रूप से अत्यंत विकसित देश था। जहां कोई बेकारी, भुखमरी नहीं थी। इतना ही नहीं वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति, सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य, ओलंपिक खेलों में सबसे अधिक मेडल जीतने वाला और दुनिया भर के देशों को आर्थिक मदद देने वाला देश था। ऐसा देश एक दिन ढह कैसे गया?

अत: विकास को सब रोगों की दवा मानना मूलत: कम्युनिस्ट विचार ही नहीं, बल्कि बहुत बड़ी आत्म-प्रवंचना भी है। हमारे ऋषि-मनीषियों और दुनिया भर के ज्ञानियों ने बार-बार चेताया है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है। उसकी आत्मा और मन अधिक महत्वपूर्ण है। इस महत्ता में विकसित-अविकसित या गरीब-अमीर का भेद नहीं उठता। सद्भाव, न्याय, सत्यनिष्ठा, सेवा आदि भाव किसी गरीब में भी मिलते हैं, किसी अमीर में भी। उसी तरह, छल, स्वार्थ, भ्रष्टाचार, अनाचार, हिंसा आदि से ग्रस्त लोग गरीब-अमीर दोनों प्रकार के होते हैं।

इसके उदाहरण रोज मिलने पर भी हमारे नेता, नीति-नियंता इस पर कभी नहीं सोचते। सच यह है कि हर मनुष्य को धर्म-दर्शन और नीति विचार की आवश्यकता होती है। अबोधावस्था से निकलते ही होती है। उसे यह समुचित रूप से देना ही भारत में शिक्षा कहलाता था, पर स्वतंत्र भारत में सत्ताधारियों ने समाजवाद, आधुनिकता, उन्नति और विकास के अंधविश्वास में स्वयं शिक्षा का ही अर्थ बिगाड़ दिया। अब रोजगार तैयारी और ट्रेनिंग यानी मात्र भौतिक विकास का इंतजाम ही पूरी ‘शिक्षा’ बन गई है।

आज संपूर्ण विकास-धुन इसी अज्ञान राग पर बज रही है। मानो हर किसी को रोटी, कपड़े, जूते, मोबाइल और इंटरनेट पाने के सिवा कुछ जरूरी न हो। या तब बाकी जरूरतें खुद-ब-खुद पूरी हो जाएंगी। यदि वैसा है तब पंजाब नशे में क्यों डूबा? वहां खालिस्तान का विचार कैसे उभरा और जमकर बैठ गया? कश्मीर में इस्लामी अलगाववाद इतना गहरा क्यों है? मुस्लिम राजनीति स्थाई रूप से संकीर्ण और हिन्दू-विरोधी क्यों है? हर रोग की एक दवा विकास कहने वाले आत्म-छलना के शिकार हैं। वे श्रीनगर, मालदा से लेकर माराड, गोधरा, कैराना आदि सब मर्जो का इलाज विकास से करना चाहते हैं। हम इस नारे पर हंसें या रोएं?

देश और दुनिया, दोनों का अनुभव ठीक विपरीत है। स्वतंत्रता-पूर्व भारत में सबसे विकसित राज्य थे बंगाल और पंजाब। दोनों टूटे, विभाजित हुए, लाखों को मारा, अन्य लाखों को बेघर किया गया। यह अंग्रेजों ने नहीं किया। पंजाबियों ने पंजाबियों को और बंगालियों ने बंगालियों को मारा। चाहे मारने और मरने वाले दो अलग-अलग मत विश्वासों वाले थे। यदि ‘विकास’ उन्हें संतुष्ट, सुरक्षित रख सकता तो लाहौर और ढाका बर्बाद नहीं हुए होते। वही आज भी मुंबई से लेकर किश्तवाड़ तक बार-बार टुकड़े-टुकड़े होता रहता है।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य भी वही है। अभी ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होना क्यों तय किया? यूनियन में रहने से विकास अधिक सुनिश्चित रहा, यह सर्वविदित था। यूरोप और अमेरिका सबसे विकसित, सबसे उन्नत हैं। तब वहां दो पीढ़ियों से रहने वाले संपन्न और साधनवान मुसलमानों में अनेकानेक युवा क्यों दुनिया भर में जिहाद करने जाते रहे हैं?

वे क्यों अपने ही देश को बम-बंदूकों से आतंकित कर ‘निजामे-मुस्तफा’ कायम करना चाहते हैं? यदि हर रोग की दवा विकास है तो यह सांप्रदायिकता, जातिवाद, रंगभेद और जिहाद के रोगों पर क्यों काम नहीं करती, कहीं काम नहीं करती-क्या इस पर कभी सोचा गया? यदि इन सभी सवालों के उत्तर नकारात्मक हैं तो हमें अपनी विकास-बुद्धि पर कुछ तरस खाना चाहिए।

(लेखक राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक हैं)

विकास यानी रोजगार, सड़क, बिजली आदि को सभी समस्याओं का समाधान मानने के विचार से असहमति व्यक्त कर रहे हैं एस. शंकर

Date: 04-07-16

करीबी संबंधों का कड़वा सच

न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत-अमेरिका के मजबूत होते रिश्ते को राष्ट्रपति बराक ओबामा की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर वर्णन किया है।

दो साल के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चौथी अमेरिका यात्र दर्शाती है कि पहले की तुलना में आज भारत-अमेरिका संबंध न सिर्फ बेहतर हुए हैं, बल्कि दोनों देश करीब आए हैं। मोदी ने अमेरिका को भारत का अपरिहार्य सहयोगी बताया है और टिप्पणी की है कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार सागर की गहराई से लेकर अंतरिक्ष की विशालता तक हो गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत-अमेरिका के मजबूत होते रिश्ते को राष्ट्रपति बराक ओबामा की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर वर्णन किया है।

दरअसल लोकतंत्र के अतिरिक्त अन्य तीन तत्व पैसा, सैन्य साजोसामान और एशिया की भूराजनीति भी भारत-अमेरिका के रणनीतिक संबंधों को गति प्रदान कर रहे हैं। दोनों की साङोदारी भारत और प्रशांत महासागर के आसपास के क्षेत्र के बीच संबंधों में स्थिरता और सुरक्षा का दावा करती है। बहरहाल दोनों देशों के संबंधों में यह नई गर्मजोशी अमेरिकी की पाकिस्तान, अफगानिस्तान और आतंकवाद सहित क्षेत्रीय नीतियों पर भारत की चिंताओं या भारतीय सूचना तकनीक और फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री पर उसके रुख से जुड़ी शिकायतों को दूर करने में असफल साबित हुई है।

हालांकि अमेरिका द्वारा रूस को भारत के सबसे बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता की सूची से हटाना एक तरह से कूटनीतिक तख्तापलट है। यह घटनाक्रम कुछ उसी तरह का है जब 1970 के दशक के आरंभ में शीत युद्ध के दौरान मिस्न सोवियत संघ से पाला बदलकर अमेरिका के पक्ष में चला गया था। अर्थात वह सोवियत के बजाय अमेरिका से हथियार खरीदने लगा। हालांकि तब मिस्न को अमेरिका की तरफ से भारी मदद मिल रही थी, जिसके बल पर वह हथियार खरीद रहा था, जबकि भारत अपने पैसे से अमेरिकी हथियारों की खरीद कर रहा है।

आज वाशिंगटन अपने कारोबार के लिए भारतीय बाजार को और खोलने की मांग कर रहा है। अमेरिकी कॉरपोरेट जगत के हितों की पूर्ति के लिए वह नई दिल्ली पर नियमों तथा कानूनों में बदलाव लाने, बौद्धिक संपत्ति अधिकार के प्रावधानों को मजबूत करने और व्यापक आर्थिक सुधार आरंभ करने के लिए दबाव बना रहा है। हथियारों की बिक्री में बड़ी हिस्सेदारी ही नहीं, बल्कि अमेरिका भारतीय रक्षा बाजार में भी बड़ी हिस्सेदारी कब्जाना चाह रहा है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने भारत को प्रमुख रक्षा सहयोगी बताया है। अमेरिका भारत को कई अरब डॉलर की लागत वाले रिएक्टर बेचने के करीब है, जो कि उसके घरेलू परमाणु ऊर्जा उद्योग को पुनर्जीवित करेगा।

भारत अपने आकार, स्थिति और क्षमताओं के आधार पर चीन और पश्चिम में स्थित इस्लामिक अतिवादियों का तोड़ बन सकता है। हालांकि ओबामा अपने दूसरे कार्यकाल के अंत की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन उनकी भारतीय नीति अब तक कोई अलग छाप नहीं छोड़ पाई है। भारत के प्रति उनके प्रशासन का दृष्टिकोण विश्वासघात से परिपूर्ण नजर आता है। विभिन्न क्षेत्रीय मुद्दों पर भारत के हितों के प्रति अमेरिका की अनिच्छा इस साङोदारी की लगातार परीक्षा लेता रहेगी।

उदाहरण के लिए दोनों देशों के बीच आतंकवाद के खिलाफ खुफिया सहयोग अमेरिका के रवैये के कारण लड़खड़ा गया है, क्योंकि वह पाकिस्तानी सेना और उसकी कपटी इंटर सर्विस इंटेलिजेंस एजेंसी के प्रति नरम रुख अपनाए हुए है। इसमें संदेह है कि पाकिस्तान की धरती से होने वाले आतंकी हमलों की खुफिया सूचनाएं अमेरिका भारत को देगा। जाहिर है वाशिंगटन यह नहीं चाहेगा कि भारत संभवित खतरों का स्वयं जवाब दे या अमेरिका से गुहार लगाए। अपने अमेरिका दौरे के दौरान मोदी ने स्पष्ट रूप से भारत के पड़ोस को आतंकवाद का गढ़ बताया और जो देश अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस आतंकवाद का प्रचार-प्रसार और उपयोग कर रहे हैं उन्हें अमेरिकी कांग्रेस से कड़ा संदेश देने का आह्वान किया।

भारत का एक दूसरा विरोधी चीन भी इन दिनों अमेरिका के लिए एक भूराजनीतिक चुनौती बन गया है। अमेरिका और भारत, दोनों आक्रामक चीन के उभार से पैदा होने वाले खतरों को नियंत्रित करने के लिए साथ मिलकर काम करने को उत्सुक हैं। हालांकि अमेरिका चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए भी भारत को अपने पाले में खींचना चाहता है, जबकि वह चीन-भारत के विवादों पर उदासीन रहता है। यहां तक कि वह अरुणाचल प्रदेश में साझा सैन्य अभ्यास करने से भी परहेज कर रहा है।

वाशिंगटन ने अभी तक चीन के पाकिस्तान में कोरिडोर निर्माण के लिए 46 अरब डॉलर के निवेश की आलोचना नहीं की है, जबकि इसके जरिये उसकी मंशा अरब सागर और हिन्दू महासागर तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ढांचा खड़ा करना है। दरअसल अमेरिका चीन का सामना वहीं करना चाहता है जहां वह उसकी सत्ता को सीधे चुनौती देता हो। हाल ही में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ड्रोन हमले के जरिये अफगान तालिबान प्रमुख अख्तर मंसूर को मारने के बावजूद अमेरिका ने पाकिस्तान समर्थित तालिबान को आतंकवादी संगठन नहीं माना है।

शांति समझौते के हिस्से के रूप में वह अफगानिस्तान में सत्ता के बंटवारे में तालिबान को भी स्थान दिलाना चाह रहा है। उसने मंसूर को इसलिए मारा, क्योंकि उसने शांति समझौते में शामिल होने से इंकार कर दिया था। अब फिर से उस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करते हैं जहां अमेरिका-भारत संबंध फल-फूल रहे हैं। इसमें दो क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं-रक्षा सौदे और द्विपक्षीय कारोबार। दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। भारत का अमेरिका के साथ एकतरफा रक्षा कारोबार देखकर लगता है कि नई दिल्ली ने पूर्व में दीर्घकाल तक हथियारों के लिए रूस पर निर्भरता से कुछ भी सबक नहीं लिया है।

यहां विरोधाभास यह है कि एक तरफ भारत अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बनकर उभरा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान अमेरिका से सबसे ज्यादा मदद पाने वाले देशों में शुमार है। इससे प्रतीत होता है कि अमेरिका भारत को हथियार बेचकर जो लाभ कमाता है उससे वह पाकिस्तान को मदद मुहैया कराता है। यह अमेरिकी मदद भारत को एक हद में रखने की चीनी रणनीति को आधार देती है।

यह भारतीय कूटनीतिज्ञों की जिम्मेदारी है कि वे द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती प्रदान करते हुए यह सुनिश्चित करें कि इससे एशिया या इसके बाहर देश के सुरक्षा हितों की पूर्ति हो। भारतीय कूटनीतिज्ञ भारी भरकम हथियार खरीद सौदों, अमेरिकी कारोबारियों के लिए भारत जैसे बड़े बाजार की सुविधा उपलब्ध कराने और विस्तृत भूराजनीतिक सहयोग जैसे मुद्दों का उपयोग कर अमेरिका को दक्षिण एशिया में अपनी नीति में बदलाव करने के लिए मनाने में विफल रहे हैं।

मोदी ने मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों की तुलना ऑर्केस्ट्रा से करते हुए कहा कि दोनों में बेहतर तालमेल है। बहरहाल किसी भी ऑर्केस्ट्रा का सिर्फ एक ही संचालक होता है। भारत-अमेरिकी संबंधों के संदर्भ में इस ऑर्केस्ट्रा का नेतृत्व हमेशा अमेरिका करेगा।

(लेखक सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च में प्रोफेसर हैं)

भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों से एकतरफा तरीके से वाशिंगटन के हित पूरे होते देख रहे हैं ब्रम्हा चेलानी।


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