शीर्ष न्यायालय का एक और बढ़िया आदेश
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने दोहराया है कि ‘न्याय प्रशासन की निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता में जनता का विश्वास बनाने का एक शक्तिशाली साधन है।‘ उक्त वक्तव्य दिल्ली उच्च न्यायालय के एक निर्णय को पलटते हुए शीर्ष न्यायालय ने दिया है।
कुछ बिंदु –
- न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि न्यायालयीन आदेशों की सार्वजनिक जाँच उचित है। यह ‘न्यायिक सनक या अनियमितताओं के खिलाफ जाँच के लिए‘ भी जरूरी है।
- किसी भी प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए पारदर्शिता बहुत जरूरी है। पूर्व न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने न्यायालयीन कार्यवाही में ऐसा किए जाने के उद्देश्य से कार्यवाही को लाइव-स्ट्रीम करने की पहल की थी।
- न्यायालय की अवमानना से जुड़े इस मामले में शीर्ष न्यायालय ने अवमानना अधिनियम 1971 की व्यापक परिभाषा भी की है। इसके तहत न्यायालय को ‘कलंकित‘ करने वाले कृत्यों को ही अपराध माना है।
- इस मामले में न्यायलय ने कहा है कि आवश्यकता और आनुपातिकता न्यायपालिका सहित किसी भी तंत्र में सुधार के लिए आत्मनिरीक्षण किया जाना चाहिए। इस हेतु खुली बहस की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। न्यायलय का यह विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी मजबूत करता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 मई 2025
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