शहरी निकायों को आत्मनिर्भर बनाने का एक और प्रयास
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आर्थिक सर्वेक्षण में शहरों की बदहाली की चर्चा की गई है। इसका मुख्य कारण बुनियादी ढांचे का खराब होना है। इसकी जड़ में नगर निगमों की खस्ता माली हालत है। इसे सुधारने के लिए बजट में प्रावधान दिए गए हैं –
- बजट में किसी नगर निमग को एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के बॉन्ड जारी करने पर 100 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव है। 200 करोड़ रुपये तक के छोटे प्रयास पर अटल मिशन फॉर रिजुविनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन सहायता जारी रहेगी।
- इससे बड़े शहरों को अनुदान या बैंक लोन लेने के बजाय बॉन्ड मार्केट का उपयोग करने के लिए बढ़ावा मिलेगा।
- साथ ही इससे रिस्क कम होगा और शहरी वित्तीय साधनों में पारदर्शिता एवं मजबूती आने की संभावना है।
पिछला अनुभव –
- पहला बॉन्ड 1997 में बेंगलुरू में जारी किया गया था।
- जून 2025 तक सेबी के फ्रेमवर्क के तहत 23 म्युनिसिपल बॉन्ड जारी किए गए हैं। इनसे लगभग 3,359 करोड़ रुपये जुटाए गए हैं।
- नासिक क्लीन गोदावरी बॉन्ड से नागरिक पर्यावरण के मार्केट और हिस्सेदारी से सीधे जुड़ सके हैं।
- इंदौर, गाजियाबाद और पिंपरी-चिंचवाड जैसे शहरों में सेबी के ग्रीन डेट फ्रेमवर्क के तहत बहुत मांग देखी जा रही है।
विदेशों के उदारहण –
ईस्ट इंडिया ट्रांजिट सिस्टम से लेकर अमेरिका के पानी और सीवर नेटवर्क तक म्युनिसिपल बॉन्ड ने शहरों में मजबूत बदलाव किए हैं।
बुनियादी चुनौतियां –
- कई निगम निवेश ग्रेड से नीचे हैं। उनकी वित्तीय स्वायत्तता सीमित है।
- इनमें अकाउंटिंग स्तर, क्रेडिट रेटिंग और कर-प्रोत्साहन की कमी है।
इन कमियों को दूर करके शहरों की आत्मनिर्भरता को बढ़ाया जा सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 5 फरवरी 2026
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