प्लास्टिक मुद्रा की आवश्यकता क्यों?
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भारतीय रिजर्व बैंक पॉलिमर बैंक नोट को फिर से शुरू करने जा रहा है। रिजर्व बैंक की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि वर्ष 2025-26 में प्रचलित मुद्रा 11% से अधिक बढ़ी, जो पिछले वर्ष की 5.8% वृद्धि से लगभग दोगुनी है। जबकि इसी दौरान डिजिटल भुगतान भी तेजी से विस्तार करता रहा है। इससे हमें यह पता चलता है कि डिजिटल क्रांति के साथ-साथ मुद्रा के उपयोग में भी वृद्धि हुई है।
कागजी मुद्रा की घटती प्रासंगिकता के कारण –
- केन्द्रीय बैंक के समक्ष मुद्रा को अधिक कुशल, सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की चुनौती है। वर्ष 2024-25 में बैंक नोट छापने पर 6300 करोड़ की राशि खर्च हुई। इसी समय 6.24 अरब घिसे-पिटे नोटों को प्रचलन से वापस लिया गया, जो मुद्रा बदलने के परिचालन बोझ को उजागर करता है। छोटे मूल्य वर्ग के नोट जल्दी बेकार होते हैं। इसीलिए 10 एवं 20 रुपये के पालिमर नोटों के लिए प्रायोगिक योजना पर विचार किया जा रहा है।
पालिमर नोट की विशेषताऍं –
- पालिमर नोट नमी, गंदगी और फटने के मामले में सुरक्षित रहेंगे। इसकी प्रारंभिक लागत अधिक होती है, पर अंतरराष्ट्रीय अनुभव के अनुसार ये बाद में किफायती सिद्ध होते हैं।
- आस्ट्रेलिया का अनुभव बताता है कि पालिमर मुद्रा के कारण प्रतिस्थापन और हैंडलिंग लागत में दीर्घकालिक बचत हुई है। पहले जो नोट सिर्फ 6-12 माह चलते थे, वे अब कई वर्षों तक टिकने लगे। कनाडा, ब्रिटेन न्यूजीलैंड और सिंगापुर ने भी पालिमर नोट अपनाए हैं।
- पारदर्शी विंडो और माइक्रो-आप्टिक तत्व जैसी उन्नत सुरक्षा विशेषताऍं पालिमर नोटों को नकल के लिहाज से भी अधिक सुरक्षित बनाती है। ये अपने जीवनकाल में कम संसाधनों का प्रयोग करते हैं तथा चलन से हटाए गए नोटों को अन्य प्लास्टिक उत्पादों में पुर्नचक्रित भी किया जा सकता है।
पहले हमें अग्रिम लागत, एटीएम के अनुकूल बनाए जाने, नकदी प्रबंधन अधोसंरचना और जनस्वीकृति का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना होगा, जिससे 2012 में पॉलिमर नोट पेश करने के बाद की असफलताऍं फिर से न देखनी पड़ें।