खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण की नजर उत्‍पादों के लेबल पर

Afeias
17 Jul 2026
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हाल ही में ‘फूड सेफ्टी एण्‍ड स्‍टैण्‍डर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ या एफ.एस.एस.आई. ने पैकैज्‍ड खाद्य पदार्थों पर भ्रामक पोषण एवं स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी दावों पर नियंत्रण की मुहिम चलाई है। कई खाद्य कंपनियां ऐसे दावे करती हैं, जो तकनीकी रूप से सही होते हुए भी उपभोक्‍ताओं को भ्रमित करते हैं। उदाहरण के लिए, गन्‍ने के रस में प्राकृतिक रूप से बहुत चीनी हो सकती है, लेकिन उसे ‘नो ऐडेड शूगर’ कहकर स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक बताया जाता है। भारत में मधुमेह और मोटापे के बढ़ते मामलों के कारण ऐसे दावों का प्रभाव और भी गंभीर हो जाता है।

मुख्‍य समस्‍याएं –

  1. भ्रामक विज्ञापन और लेबलिंग।
  2. अल्‍ट्रा-प्रोसेस्‍ड या अत्‍यधिक प्रसंस्‍कृत खाद्य पदार्थों का बढ़ता उपयोग।
  3. उपभोक्‍तओं में पोषण संबंधी जानकारी का अभाव।
  4. एफ.एस.एस.आई. की उत्‍पाद-विशिष्‍ट कार्रवाई की सीमा, तथा
  5. स्‍पष्‍ट एवं कठोर दिशा-निर्देशों का अभाव।

एफ.एस.एस.आई. की वर्तमान भूमिका

  • खाद्य सुरक्षा मानकों का निर्धारण।
  • खाद्य लेबलिंग और विज्ञापन का नियमन।
  • खाद्य नमूनों की जांच एवं प्रवर्तन, तथा
  • उपभोक्‍ता जानकारी अभियान।

सरकार एवं एफ.एस.एस.आई. द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम

  • 2020 में खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग एवं प्रदर्शन) विनियम जारी किए गए। इसमें सभी पैकेज्‍ड खाद्य पदार्थों पर पोषण संबंधी जानकारी देना अनिवार्य किया गया।
  • स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी एवं पोषण संबंधी दावों पर नियंत्रण।
  • ईट राइट इंडिया मूवमेंट।
  • फुड फोंर्टिफिकेशन।
  • खाद्य सुरक्षा अनुपालन तंत्र को डिजिटल बनाना।
  • खाद्य सुरक्षा मित्र योजना।
  • मोबाइल खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं शुरू करना।

आगे की राह

  • ‘हेल्‍दी’, ‘नेचुरल’, ‘नो ऐडेड शुगर’ जैसे दावों के लिए स्‍पष्‍ट वैज्ञानिक मानक बनाए जाएं।
  • अल्‍ट्रा-प्रसंस्‍कृत खाद्य पदार्थों के भ्रामक दावों पर सख्‍त कार्रवाई हो।
  • उपभोक्‍ताओं को सरल और स्‍पष्‍ट पोषण संबंधी जानकारी मिले।
  • एफ.एस.एस.आई. नागरिक संगठनों, वैज्ञानिकों और जिम्‍मेदार स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों के साथ मिलकर निगरानी बढ़ाए।
  • जागरुकता अभियान को स्‍कूल और कॉलेजों तक सक्रियता से फैलाया जाना चाहिए।

(‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-22/06/2026)