लड़कियों के लिए पीरियड्स से जुड़ी साफ-सफाई एक मौलिक अधिकार
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हाल ही में उच्चम न्यायालय ने माहवारी (पीरियड) से जुड़ी सेहत और साफ-सफाई के अधिकार को अनुच्छेद 21 से जोड़कर मौलिक अधिकार माना है।
कुछ बिंदु –
- हमारे देश में लड़कियों के लिए अलग शौचालय, साफ पानी, माहवारी से जुड़ी जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता और उन्हें फेंकने से जुड़े साफ और सुरक्षित साधनों की कमी है।
- इसके अलावा समाज में माहवारी से जुड़ी अनेक भ्रांतियां और कुप्रथाएं हैं। इनके कारण लड़कियों को सार्वजनिक रूप से नीचा देखना पड़ता है।
- न्यायालय ने इन सब मुद्दों को ‘माहवारी गरीबी‘ बताते हुए कहा है कि यह लड़कियों के समानता के अधिकार में बाधक हैं।
- इसे ठीक करने की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर डाली गई है। आदेश दिया गया है कि हर स्कूल में अलग शौचालय बनाए जाएं। ऐसा न होने पर दंड और कार्रवाई की जाएगी। यहाँ तक कि निजी स्कूलों की मान्यता भी रद्द की जा सकती है।
- हालांकि, नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-5 के डेटा का दावा है कि 15-24 साल की महिलाओं में माहवारी के दौरान साफ-सफाई का प्रतिशत 57.6 से बढ़कर 77.3% हो गया है। फिर भी इस उम्र की एक चैथाई महिलाएं इन सुविधाओं से वंचित हैं।
- सफाई और स्वच्छ जल मंत्रालय ने माहवारी से जुड़ी साफ-सफाई पर दिशा निर्देश भी बनाए हैं। लेकिन उन्हें लागू करने का काम अधूरा रहा है।
- कुछ एनजीओ ने अच्छी कोशिश की है। लेकिन बड़े बदलाव के लिए बड़ी ताकत की जरूरत है।
न्यायालय का उद्देश्य यही है कि लड़कियों के लिए माहवारी सजा न बने और उनकी पढ़ाई न छूटे।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 3 फरवरी, 2026
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