हवाई यानों में शौचालयों की समस्या
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बढ़ती अंतरिक्ष यात्राओं के साथ हाल ही में एक ऐसा कठिन प्रश्न आ खड़ा हुआ है, जो मानव की दैनिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। यह अंतरिक्ष यानों में शौचालयों की उपलब्धता से संबंद्ध है। 50 वर्षों की कोशिश के बाद नासा ने तीन करोड़ डॉलर का यूनिवर्सल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम बनाया था। यह आर्टमिस टू मिशन के शुरु होते ही खराब हो गया था।
हम आए दिन टॉयलेट जाम होने के कारण प्लेन के वापस लौट आने के समाचार सुनते रहते हैं। इतना ही नहीं, कुछ समय पहले गुड़गांव के एक गांव में 10-12 कि.ग्रा. का एक बड़ा पत्थर जैसा गिरा था। यह प्लेन के टॉयलेट का जमा हुआ कचरा था। यह जहाँ कहीं भी गिरता है, वहाँ कुछ-न-कुछ नुकसान कर देता है। एक बार तो 35,000 फीट पर एक प्लेन का इंजन तोड़ दिया था।
अंतरिक्ष यानों में इस तरह की परेशानियाँ काफी बड़ी हो जाती हैं, क्योंकि वहाँ की हर एक उड़ान कुछ महीनों या वर्षों की होती है। मंगल ग्रह तक पहुंचने में ही नौ माह का समय लग जाता है। नासा शटल डिस्कवरी का वेस्ट सिस्टम 11 मिशन में से दस बार फेल हो चुका है। इसे ठीक रखने के लिए 1.2 करोड़ डॉलर की जरूरत थी। 2021 के आखिर में, स्पेसएक्स के क्रू ड्रैगन यान में खराबी आ गई थी।
कुल-मिलाकर, शौचालयों के लिए एक और बेहतर प्रणाली विकसित करने की जरुरत है, ताकि अंतरिक्ष यात्री अपने लक्ष्य पर अधिक ध्यान केन्द्रित कर सकें।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित- 06/04/2026