एक मजबूत भारत का निर्माण पथ
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अमेरिका-इजरायल युद्ध से तेल व गैस की कीमतों में वृद्धि के कारण आपूर्ति-श्रंखला में व्यवधान उत्पन्न हुआ है। इससे लगता है कि हमें तात्कालिक रूप से आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है। पर पूरी दुनिया परस्पर इतनी आत्मनिर्भर है कि यह नीति प्रभावी नहीं हो सकती। हमने गलवान के बाद 2020 से चीन से यद्यपि अपना आयात सीमित किया, पर वह बढ़ता ही गया।
आत्मनिर्भरता का विकल्प है, परस्पर निर्भरता। जैसे कुछ वस्तुएं – ऊर्जा, मशीनरी, इलेक्ट्रानिक्स के लिए हम किसी पर निर्भर रहेंगे। पर हमें यह भी सुनिचित करना चाहिए कि हमारे विशिष्ट व बेहतर उत्पादों के लिए दूसरे देश हम पर भी निर्भर रहें। इसके लिए हमें घरेलु मजबूती और अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षा; दोनों की जरुरत है, ताकि हम ऐसी वस्तुओं का निर्माण कर सकें।
घरेलु मजबूती कैसे हासिल होगी?
हमारी अर्थव्यवस्था की मध्यम अवधि की बुनियादी स्थिति मजबूत है। इसलिए हमें व्यवधानों से निपटने का दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। घरेलु अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए वैश्विक स्तर पर हमारी प्रतिस्पर्धी और महत्वाकांक्षी कंपनियाँ होनी चाहिए।
1991 के बाद कंपनियों में बदलाव की आवश्यकता थी कि हम उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाकर विश्व में निर्यात योग्य बनायें। सूचना प्रौद्योगिकी एवं औषधि के क्षेत्र में हमने ऐसा करके भी दिखाया। प्रतिस्पर्धा की उन्हीं नीतियों की हमें फिर से अपनाने की आवश्यकता है।
हमें स्वामित्व वाली तकनीक में निवेश की आवश्यकता है। अपनी जीडीपी का 1.5% हमें रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट में निवेश करना चाहिए। साथ ही उद्योगों की शीर्ष 10-20 कंपनियों के साथ गंभीर मानक तय किये जाएं। वे व्यय का कितना प्रतिशत रिसर्च में लगाते हैं, शोध के लिए कितने लोग हैं, उनकी योग्यताएं, उत्पादन, पेटेंट, डिजाइन पंजीकरण, नए व्यवसाय और बाजारों में प्रवेश, इन सभी के लिए बेहतर लक्ष्य निर्धारित हों। नीतिगत रूप से कंपनियाँ स्वयं प्रतिस्पर्धी वातावरण उपलब्ध कराएं।
विदेश में मजबूती हासिल करना –
हमें स्वयं को अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के लिए तैयार करना चाहिए। मुक्त व्यापार समझौतों को राजनीतिक संबंधों में बदलना चाहिए। पश्चिम एशिया से गहरे संबंधों के कारण हम वहाँ के पुनिर्माण और सुधार में शामिल हो सकते हैं। भारत-यूरोप एफटीए शिक्षा, संस्कृति एवं रक्षा क्षेत्र के हमारे रिश्तों को गहरा करेगा।
एक्ट ईस्ट नीति को नारे से बदलकर व्यवहार में लाना चाहिए। हम दक्षिण-पूर्व एशियाई देश, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ मौजूदा व्यापार समझौतों को नवीनीकृत और मजबूत कर सकते हैं। हम ‘व्यापक और प्रगतिशील प्रशांत पार समझौते’ पर भी विचार कर सकते हैं। लेकिन इसमें सरकारी खरीद से लेकर निवेश तक के उच्च मानक हैं।
हमें संयुक्त राष्ट्र संबंधों में तथा विश्श्व व्यापार संगठन में ग्लोबल साउथ के लिए साझा रुख अपनाने की आवश्यकता है, हमें अफ्रीका व लैटिन अमेरिका में भी नए सिरे से रुचि लेनी चाहिए।
भारतीय उद्योग परिसंघ को श्रीलंका, इंडोनेशिया, ब्रिटेन, ओमान और मिस्र जैसे विविध देशों में गए प्रतिनिधि मंडलों से भारतीय कंपनियों की सक्रिय मांग का संदेश मिला है। हमें आगे इस दिशा में काम करना चाहिए।
पश्चिम एशिया, तुर्किये, अफ्रीका तथा लेटिन अमेरिका को मिलाकर 7 लाख करोड़ डॉलर से अधिक के जीडीपी वाले देश हैं। वहीं यूरोपीय संघ इसे दोगुना कर देता है। इससे हम चीन व अमेरिका पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
हमारी कंपनियाँ; जो अमेरिकी बाजारों पर अधिक निर्भर हैं, उनमें विविधता लाने की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल कंपनियों का अन्य कंपनियों को अनुसरण करना चाहिए।