हमारे शहरों का खाका कुछ, असलियत कुछ
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इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में एक लाइन है, जिसने हमारे शहरों के बारे में सटीक बात कही है। वह यह कि हमारे शहर ‘आकांक्षाओं वाले हैं।’ शहरों से जुडी अनेक चुनौतियां हैं। इन्हें ठीक किए बिना विकास कैसे हो सकता है। अब सवाल शहरों से जुड़ी उम्मीदों को असलियत में बदलने का है –
- सर्वेक्षण में साफ है कि भारत बुनियादी ढांचे और समन्वय की कमी से जूझ रहा है।
- विश्व स्तरीय कारों को भारत में बनाने के बाद उन्हें चलाने के लिए उसी स्तर की सड़कें जब तक नहीं बनतीं, तब तक उनका सही लाभ नहीं मिल सकता है।
- हाल ही में मीडिया में इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई थी कि आम जनता का व्यवहार स्थान के अनुसार अलग क्यों हो जाता है? जैसे – दिल्ली की स्थानीय बसों में जो अफरा-तफरी, गंदगी और बदतमीजी दिखाई देती है, वह मेट्रो रेल में काफी कम है। सार यही है कि सार्वजनिक स्थानों का रख-रखाव लोगों के व्यवहार को भी बदलता है।
- प्रशासन, सामाजिक नियम और डिजाइन के तालमेल जब तक ठीक नहीं बैठते, तब तक स्मार्ट शहरों का खाका कागजों पर ही बनता रहेगा। इसे वास्तविक बनाना आज ही जरूरत है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 31 जनवरी, 2026
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