गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सही मांग

Afeias
30 Oct 2026
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हाल ही में फ्रांस में हुए विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शन ने सिद्ध कर दिया है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रत्येक बच्चे का अधिकार है, न कि सरकार की आर्थिक सुविधा पर निर्भर कोई कल्याणकारी विकल्प। फ्रांस में विद्यार्थियों के विरोध-प्रदर्शन और भारत की स्कूली शिक्षा की चुनौतियों के माध्यम से यह बताया गया है कि शिक्षकों की कमी, जर्जर विद्यालय, भीड़भाड़ वाली कक्षाएँ और सीखने के कमजोर परिणाम शिक्षा व्यवस्था में अपर्याप्त निवेश को दर्शाते हैं।

भारत में स्कूली शिक्षा की समस्याओं पर कुछ बिंदु –

  • विद्यार्थी अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने, लिखने और गणना करने में सक्षम नहीं हैं। हाल ही में आई नीति आयोग की एक रिपोर्ट बताती है कि कम फीस वाले निजी स्कूलों के क्लास 5 के 35% बच्चे कक्षा 2 की किताबें भी नहीं पढ़ पाते हैं।
  • शिक्षकों की कमी है; विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षकों। अकेले बिहार राज्य में दो लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है।
  • आधारभूत संरचना की समस्या है। विद्यालय भवन, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, बिजली, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और इंटरनेट जैसी आवश्यक सुविधाएँ पूरी नहीं मिल पाती हैं।
  • पूरे देश के मात्र 5% स्कूलों में एक साथ पहली से बारहवीं तक की कक्षाएँ हैं।
  • क्या बजटीय बाधाएँ शिक्षा में निवेश कम कर सकती हैं? नहीं। लेकिन इसका अर्थ असीमित व्यय भी नहीं है। सरकारों को राजकोषीय स्थिरता और सामाजिक क्षेत्र के निवेश के बीच संतुलन बनाना चाहिए।
  • कम प्राथमिकता वाले और अप्रभावी व्यय की समीक्षा की जा सकती है।
  • शिक्षा बजट में आवंटन के साथ वास्तविक खर्च और परिणामों की निगरानी आवश्यक है।
  • शिक्षक भर्ती एवं तैनाती को छात्र संख्या और स्थानीय आवश्यकताओं से जोड़ा जाना चाहिए।
  • विद्यालयों की मरम्मत, स्वच्छता और सुरक्षित भवनों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण या नकद हस्तांतरण को स्वतः अपव्यय नहीं मानना चाहिए। गरीब परिवारों के लिए लक्षित सहायता शिक्षा में नामांकन एवं निरंतरता को बढ़ा सकती है।

कुल मिलाकर, शिक्षा को खर्च के बजाय दीर्घकालीन सामाजिक निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 09/10/26