द्वीपों का सामरिक महत्व और पारिस्थितिकी संरक्षण के बीच संतुलन
To Download Click Here.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा ने एक बार फिर हिंद महासागर क्षेत्र में द्वीपों के बढ़ते सामरिक महत्व को रेखांकित किया है। लेकिन यह संपादकीय बताता है कि द्वीप केवल सैन्य या भू-राजनीतिक संपत्ति नहीं हैं, बल्कि वे मानव सभ्यता, जैव विविधता और जलवायु संतुलन के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं।
कुछ प्रमुख बिंदु –
1). द्वीप केवल सामरिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पारिस्थितिक धरोहर हैं –
- पृथ्वी के कुल भू-भाग का केवल 5% हिस्सा द्वीप हैं। लेकिन यहाँ दुनिया की लगभग 20% पक्षी, सरीसृप और पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- ताइवान के ऑर्किड द्वीप से फिलीपींस के बाटानेस द्वीप तक की 4,000 वर्ष पुरानी समुद्री यात्रा का पुनर्निर्माण दर्शाता है कि द्वीप मानव सभ्यता और प्रवासन के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं।
- द्वीप जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्राकृतिक संकेतक भी हैं।
2). द्वीपों के साथ ऐतिहासिक अन्याय –
- ऑर्किड द्वीप (ताइवान): यहाँ 1980 के दशक में निम्न-स्तरीय परमाणु कचरे का भंडारण किया गया।
- बिकिनी एटोल (मार्शल द्वीप): अमेरिकी परमाणु परीक्षणों से यहाँ के पर्यावरण और स्थानीय आबादी को भारी नुकसान हुआ।
- चागोस द्वीपसमूह: यहाँ के स्थानीय निवासियों को जबरन हटाकर डिएगो गार्सिया में सैन्य अड्डा बनाया गया।
3). वर्तमान भू-राजनीति में द्वीपों का बढ़ता महत्व –
- आज हिंद-प्रशांत, फारस की खाड़ी और काला सागर जैसे क्षेत्रों में द्वीप सामरिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गए हैं।
- दक्षिण चीन सागर में चीन कृत्रिम द्वीप बनाकर अपने दावे मजबूत कर रहा है।
- इससे द्वीपों को केवल सैन्य परिसंपत्ति के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
4). भारत और ग्रेट निकोबार परियोजना –
भारत के लिए ग्रेट निकोबार द्वीप सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
लेकिन प्रस्तावित विकास परियोजना के लिए लगभग 1.5 करोड़ (15 मिलियन) पेड़ों की कटाई और वर्षावनों पर प्रभाव की आशंका जताई गई है।
सरकारी पहल –
- आइलैंड डेवलपमेंट एजेंसी (2017) की स्थापना द्वीपों के सतत विकास के लिए।
- ग्रेट निकोबार समग्र विकास परियोजना के तहत ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, ऊर्जा संयंत्र और टाउनशिप का विकास।
- सागर (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) नीति के माध्यम से हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा।
- ब्लू इकोनॉमी पर भारत का बढ़ता फोकस, तथा
- कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (CRZ) अधिसूचना के माध्यम से तटीय एवं द्वीपीय पारिस्थितिकी का संरक्षण।
चुनौतियाँ
- जलवायु परिवर्तन और समुद्र-स्तर में वृद्धि।
- जैव विविधता का नुकसान।
- आदिवासी समुदायों के अधिकारों की उपेक्षा।
- सैन्यीकरण एवं अवसंरचना विकास से पारिस्थितिक क्षति, तथा
- पर्यटन और प्रदूषण का बढ़ता दबाव।
आगे की राह
- सतत विकास को प्राथमिकता।
- स्थानीय समुदायों एवं जनजातियों की पूर्व सहमति (Free, Prior and Informed Consent – FPIC) सुनिश्चित करना।
- कठोर पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)।
- विकास परियोजनाओं में “नेचर बेस्ड सॉल्यूशंस” को अपनाना, तथा
- द्वीपों को केवल सुरक्षा की ही दृष्टि से नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी देखना।
निष्कर्ष
द्वीप भारत और विश्व की सामरिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उनकी वास्तविक शक्ति उनकी जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत और पारिस्थितिकी में निहित है। यदि विकास स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण के साथ किया जाए, तो राष्ट्रीय सुरक्षा और सतत विकास दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। भारत इस संतुलित विकास मॉडल का वैश्विक उदाहरण बन सकता है।
नोट –
UPSC – जीएस-2: भारत की पड़ोसी नीति, हिंद-प्रशांत रणनीति, समुद्री सुरक्षा।
जीएस-3: पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, ब्लू इकोनॉमी।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30/06/26