डिजिटल होती न्यायपालिका
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देश की न्यायपालिका को डिजिटाइज़ करने की कोशिश लंबे समय से हो रही है। इसी प्रयास में मुख्य न्यायाधीश ने दो पहलों की घोषणा की है –
- ‘वन केस, वन डेटा’ (ओसीओडी) – यह एक एकीकृत न्यायिक डेटा मंच या यूनिफाइड ज्यूडिशियल डेटा प्लेटफार्म है।
इससे अलग-अलग कोर्ट में होने वाले किसी विवाद के लिए एक एकीकृत डिजिटल कड़ी, कोर्ट के रिकॉर्ड और वादी की अपील जैसे एक्शन के बीच कड़ी, अलग-अलग दस्तावेजों के एक ही जगह होने से आसान पहुँच, हाईकोर्ट और अन्य कोर्ट के बीच तालमेल तथा ज्यादा सटीक न्यायिक आंकड़े मिल सकते हैं। इससे डेटा प्रशासक को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि केस कहाँ रुके हुए हैं, और वह इन रुकावटों को कैसे कम कर सकता है।
- सु-सहाय – यह उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर एक ए-आई पावर्ड चैटवॉट है।
इससे यूजर्स को केस-स्टेटस, कॉज़-लिस्ट, ऑर्डर और निर्णय, ई-सर्विस और अक्सर पूछे जाने वाले सवालों को समझने में मदद मिल सकती है।
चुनौतियां यहाँ भी हैं –
- मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि साधन ‘न्याय तक पहुँच’ को बेहतर बनाएंगे। लेकिन इनसे डिजिटल डिवाइड के बढ़ने का खतरा है।
- इंटरऑपरेबिलिटी या अंतर-संचालन, पुराने रिकार्ड के एकीकरण, निजी जानकारी तक पहुंच को रोकने, और स्टाफ को कौशलपूर्ण बनाने को लेकर सवाल बने हुए हैं।
- वकीलों को डिजिटल स्कैनर, क्लाउड बैकअप विकल्प और अपडेटेड सॉफ्टवेयर बनाए रखने का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है।
- सु-सहाय’ मुख्य रूप से टैक्स्ट-वेस्ट है। इससे टाइपिंग में कमजोर लोग काम से बाहर हो सकते हैं।
- सरकार और न्यायपालिका को देखना होगा कि एआई मााडल हाशिए पर पड़े समुदायों के खिलाफ पक्षपाती न हो। इस समुदाय में अक्सर गिरफ्तार होने वाले और जमानत न मिलने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है।
फिलहाल, न्यायपालिका जिन डिजिटल प्रक्रियाओं की मदद ले रहा है, उन्हें चलते दिया जाना चाहिए। इनके साथ ही कुछ अधिक शक्तिशाली टूल्स को भी स्थान दिया जाना चाहिए।
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