देश की नियामकीय व्यवस्था में खामियाँ
To Download Click Here.

भारतीय संविधान में शक्तियों के पृथक्करण की बात विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच कही गई है। किन्तु नियामकीय संस्थायें एक साथ अर्द्ध-विधायी, कार्यकारी और अर्द्ध-न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करती हैं।
नियामकीय संस्थाओं से संबंधित कुछ समस्याएँ –
- कलैरिएंट इंटरनैशनल लिमिटेड एंड एएनआर बनाम सेबी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि नियामक न केवल नियमन करता है, बल्कि वह उन्हें लागू भी करता है और उल्लंघन पर निर्णय भी देता है। न्यायालय ने चेतावनी दी थी कि इन शक्तियों को एक ही संस्था में शामिल करना भविष्य में सार्वजनिक विधि से संबंधित कई चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है।
- विशाल तिवारी बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनियमन बोर्ड को निर्देश दिया था अर्द्धन्यायिक और कार्यकारी शाखाओं में अंतर किया जाए।
- प्रतिस्पर्धा कानून में महानिदेशक कार्यालय, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से अलग स्वतंत्र रूप से काम करता है। कई नियामक किसी पूर्णकालिक सदस्य के अधिकार क्षेत्र से उत्पन्न मामलों को अन्य सदस्यों से हल कराते है। फिर भी यह पृथक्करण हमेशा सफल नहीं होता।
- भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड ने नियम बनाया था कि कोई पूर्णकालिक सदस्य को उससे जुड़े निर्णय में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी। बाद इसे केवल ‘संलिप्तता‘ तक सीमित कर दिया गया। इससे जिन जाँच या पर्यवेक्षण से संबंध रहा है, वही निर्णय भी देते है। इससे पक्षपात की आशंका रहती है।
- 1990 के दशक तक यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि सरकार के बाहर कोई संस्था जुर्माना लगा सकती है। पर आज सेबी में कानून उल्लंघन के संबंध में स्पष्ट कानून है, जिसके द्वारा वह दंड या जुर्माना लगाने का अधिकार रखती है। ये नियम केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए थे। जुर्माने की राशि को भारत की संचित निधि में जमा करना होता है। पर सभी संस्थाएँ ऐसा नहीं कर पातीं।
- हालिया स्टॉक एक्सचेंज परिपत्र ने ब्रोकर्स के लिए दंड ढाँचे को तर्कसंगत बनाते हुए 12 नए जुर्माना प्रावधान जोड़े। इसका प्रभाव यह है कि नियामक स्वयं ही उल्लंघन की परिभाषा तय करता है और प्रतिनिधियों को दंड लगाने का अधिकार भी देता है। इससे विधायी व न्यायिक कार्यों को एक ही संस्था द्वारा निर्धारित करने के खतरे का पता चलता है।
कुछ उपाय –
- अमेरिका में जांच स्टाफ व निर्णय लेने वाले आयुक्तों के मध्य कठोर विभाजन है। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि प्रतिभूति एवं विनियमन आयोग अपने आंतरिक प्रशासनिक कानून न्यायधीशों का उपयोग धोखाधड़ी के मामलों में दीवानी दंड लगाने के लिए नहीं कर सकता। इसका निर्णय न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए।
- भारत का नियामकीय परिदृश्य नए मोर्चों पर विस्तारित हुआ है; जैसे फिनटेक, डेटा संरक्षण, जलवायु प्रशासन आदि। आधुनिक नियामकीय संस्थाएँ प्रतिक्रियाशील संस्थानों की मांग करती हैं। लेकिन शक्ति के साथ प्रतिरोध भी आना चाहिए। नियामकों को भी हितों के टकराव के मामलें में सावधानी बरतनी चाहिए।
*****
Related Articles
×