कॉलेजियम की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश ने न्यायिक स्वतंत्रता में अंदर से ही बाधा बताकर सबका ध्यान खींचा है। उनका इशारा न्यायाधीशों की नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप की ओर है।
आरोप का आधार –
उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम के केंद्र के एक सुझाव को मान लेने पर संदेह पैदा हुआ है। मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायाधीश को कॉलेजियम के निर्णय के अनुसार छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय न भेजकर, केंद्र की इच्छानुसार इलाहबाद भेजा गया।
इससे पहले भी कई बार केंद्र सरकार ने न्यायाधीशों के स्थानांतरण में हस्तक्षेप किया है। इतना ही नहीं, कार्यपालिका और विधायिका ने न्यायाधीशों की भर्ती और नियुक्ति की प्रक्रिया में अपने सदस्यों को शामिल करने की भरपूर कोशिश की है। इन सबका उच्चतम न्यायालय ने जोरदार विरोध किया है। इस हद तक विरोध किया कि 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को ही रद्द कर दिया गया। इस कानून को रद्द करने वाली संविधान पीठ के एक अलग निर्णय में कहा गया कि ‘यह मानना मुश्किल है कि जजों की नियुक्ति की समझदारी राजनीतिक सदस्य के साथ साझा की जा सकती है।’
संवैधानिक सिद्धांत –
न्यायपालिका को कार्यपालिका के दखल से बचाया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य एक दूसरे के प्रति चौकन्ना रहना है। दोनों के घेरे में एक दूसरे के दखल से उनकी जवाबदेही कम होती है, और इन संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा कम होता है। कॉलेजियम की पारदर्शिता और जवाबदेही अहम है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 27 जनवरी, 2026