
चुनाव आयोग के महत्व को बढ़ाने वाला संशोधन
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हाल ही में संसद ने चुनाव आयुक्तों के चयन और सेवा शर्तों से संबंधित विधेयक पारित किया है। अगस्त में प्रस्तुत विधेयक में चुनाव आयोग की स्थिति और शक्ति को कमजोर कर दिया गया था। संशोधन से यह आशंका कम हो गई है। कुछ बिंदु –
- चुनाव आयुक्तों का वेतन – संशोधन में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों के वेतन को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के स्तर बहाल किया गया है। यह पहले कैबिनेट सचिव के वेतन जितना रखे जाने का प्रस्ताव था। इसे चुनाव आयोग के महत्व को कम करने वाला माना जा रहा था।
- चुनाव आयुक्तों की स्वायत्तता – संविधान का अनुच्छेद 324 मुख्य चुनाव आयुक्त को परिचालन की स्वायत्तता (ऑपरेशनल ऑटोनॉमी) देता है। वह यह भी कहता है कि चुनाव आयोग के प्रमुख को बर्खास्त करना, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को बर्खास्त करने जितना ही कठिन होना चाहिए। इस प्रावधान को संशोधन में शामिल किया गया है।
चुनाव आयोग अर्ध-न्यायिक कार्य भी करता है। इसको लेकर पहले के विधेयक में असंगतता पैदा हो गई थी, जिसे अब दूर किया गया है।
- मुकदमों से सुरक्षा – संशोधित विधेयक में चुनाव आयोग का काम के दौरान कही गई या की गई किसी भी बात से सिविल और आपराधिक मुकदमों से बचाया गया है।
- सर्च कमेटी में बदलाव – किसी राजनीतिक कार्यकारी को संभावित आयुक्तों की छोटी सूची तैयार करने का प्रभारी बनाया जाता है। संशोधन में कैबिनेट सचिव की जगह कानून मंत्री को इस समिति का प्रमुख बनाया गया है।
- एक और बदलाव की जरूरत है – आयुक्त का चयन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय चयन समिति पर निर्भर करता है। इसमें एक कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। सर्च कमेटी के लिए संचालन प्रक्रिया यही समिति तय करती है। यह प्रावधान सरकार को ही आयुक्त के चुनाव में प्रभावी बनाता है।
सरकार को एक ऐसा खंड पेश करने पर विचार करना चाहिए, जो चयन समिति के निर्णय में सर्वसम्मति को अनिवार्य बनाता हो।
चुनाव आयोग, भारत की महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक है। इसकी विश्वसनीयता ने भारत को एक जीवंत लोकतंत्र बनाए रखा है। इस संशोधन विधेयक के बदलावों से इसे सुरक्षित रखने की उम्मीद की जा सकती है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 दिसंबर, 2023