भारत में थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा और ऊर्जा सुरक्षा

Afeias
12 Oct 2026
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कुछ तथ्य –

भारत के पास दुनिया के लगभग 25% थोरियम भंडार हैं, जबकि यूरेनियम के वैश्विक भंडार में भारत की हिस्सेदारी 2% से भी कम है। इसलिए भारत लंबे समय से थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित कर रहा है।

भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम इस प्रकार है :

  • पहला चरण: प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर में प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग।
  • दूसरा चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में प्लूटोनियम का उपयोग और थोरियम से उपयोगी विखंडनीय ईंधन तैयार करना।
  • तीसरा चरण: थोरियम और विखंडनीय यूरेनियम के उपयोग से अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर ईंधन चक्र बनाना।

भारत ने पहला चरण काफी हद तक हासिल कर लिया है, जबकि दूसरा चरण अभी आगे बढ़ रहा है। तीसरा चरण अभी दूर है।

समस्या यह है कि थोरियम को सीधे परमाणु ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना तकनीकी रूप से कठिन है। यूरेनियम फिलहाल अधिक व्यावहारिक ईंधन है।

दुनिया में परमाणु ऊर्जा की मांग बढ़ने से भविष्य में यूरेनियम की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

इसलिए वैज्ञानिक अनिल काकोडकर ने मौजूदा रिएक्टरों में थोरियम को अन्य ईंधन के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने की संभावना पर तेजी से काम करने का सुझाव दिया है।

भारत के लिए संभावित लाभ –

  1. ऊर्जा सुरक्षा – घरेलू थोरियम संसाधनों का उपयोग करके आयातित यूरेनियम पर निर्भरता कम की जा सकती है।
  2. रणनीतिक आत्मनिर्भरता – वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव या आपूर्ति बाधाओं का भारत की परमाणु ऊर्जा पर प्रभाव कम हो सकता है।
  3. स्वच्छ ऊर्जा – परमाणु ऊर्जा कम-कार्बन बिजली का स्रोत है और भारत के ऊर्जा संक्रमण में योगदान दे सकती है।
  4. दीर्घकालीन ऊर्जा जरूरतें – भारत 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को बड़े स्तर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। घरेलू ईंधन संसाधनों का उपयोग इसमें मदद कर सकता है।

प्रमुख चुनौतियाँ –

  • थोरियम ईंधन चक्र की तकनीकी जटिलता पर काम किया जाना है।
  • बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग के लिए शोध और अनुसंधान में अधिक निवेश की जरूरत है।
  • परमाणु सुरक्षा और अपशिष्ट प्रबंधन का मुद्दा जटिल है।
  • परमाणु परियोजनाओं में लंबा निर्माण समय और उच्च लागत लगती है।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ नियमन और सुरक्षा मानकों को मजबूत बनाए रखना चुनौती है।

भारत के लिए थोरियम केवल परमाणु ईंधन का विकल्प नहीं, बल्कि दीर्घकालीन ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की रणनीति है। हालाँकि, इसे अपनाने के लिए तकनीकी विकास, अनुसंधान, सुरक्षित रिएक्टर डिजाइन, कुशल मानव संसाधन और मजबूत नियामक व्यवस्था पर समानांतर रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22/09/26