भारत में बाल विवाह खत्म करने के लिए प्रयास
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- नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचसी) के डेटा के अनुसार, बाल विवाह लगातार कम हो रहे हैं। 2005-06 में 47.4% से घटकर 2019-21 में 23.3% हो गए हैं। सांस्कृतिक विविधता वाले देश में राज्यों में इसके आंकड़े भिन्न हो सकते हैं।
- बाल विवाह की सबसे ज्यादा दर पश्चिम बंगाल, बिहार और त्रिपुरा में है। झारखंड, आंध्रप्रदेश, असम, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी इनकी संख्या काफी ज्यादा है।
- यू एन पॉपुलेशन फंड के एनएफएचएस डेटा के आकलन से पता चलता है कि बाल विवाह का गरीबी और शिक्षा से सीधा संबंध है।
- घरेलू संपत्ति के सबसे निचले पंचमक (क्विटाइल) की 40% लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से पहले हो गया। जबकि सबसे ऊंचे क्विटाइल की सिर्फ 8% लड़कियों के बाल विवाह किये गये।
- बिना पढ़ी-लिखी 48% लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से पहले हो गया। जबकि ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़कियों में सिर्फ 4% की 18 से पहले शादी हुई।
- बाल विवाह रोकथाम अधिनियम, 2006 इस प्रथा को कम करने के लिए अहम कानून है। लेकिन नेशनल क्राइम ब्यूरों रिकॉर्डस के आंकड़े बताते हैं कि कानून का कम इस्तेमाल होता है, और सजा की दर भी कम है।
- पॉक्सो जैसे सख्त कानून सहमति से संबंध बनाने वाले किशोरों को छूट नहीं देते हैं।
- यद्यपि प.बंगाल जैसे राज्य कैश योजना से लड़कियों को पढ़ाई के लिए बढ़ावा देते हैं, फिर भी वहां बाल विवाह के मामले बहुत ज्यादा क्यों हैं, यह देखा जाना चाहिए।
धारणीय विकास में 2030 तक बाल विवाह खत्म करने का लक्ष्य –
- केंद्र की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ‘ योजना को सबसे कमजोर समुदायों तक पहुंचने के लिए और भी बहुत कुछ करना है।
- स्कूल में लड़कियों के लिए साफ टॉयलेट जरूर होने चाहिए।
- सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन समेत बुनियादी ढांचे की जरूरत है।
- गरीबी, स्वास्थ्य और लैंगिक समानता पर भी तेजी से काम करने की जरूरत है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 27 दिसंबर, 2025