अर्थव्यवस्था को गति देने के क्या हों उपाय?

Afeias
25 Jul 2026
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आज भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था चिंताजनक स्थिति में है। इस स्थिति के पीछे बहुत से कारण हैं। वर्ष 2018-19 में हमारी अर्थव्‍यवस्‍था बुरी हालत में थी। उसके बाद हम कोविड, यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी शुल्‍क वृद्धि, ईरान युद्ध और तेल की कमी का सामना कर रहे हैं। वैश्विक समृद्धि की राजनीतिक बुनियाद लोकतंत्र व उदारीकरण है। पर हम आज 1980 के दशक की जैसी स्थिति में हैं।

घरेलु नजी क्षेत्र ने आखिरी बार शुद्ध स्थिर परिसंपत्तियों में एक वर्ष में 20% से अधिक नामिनल वृद्धि 2009-10 में हासिल की थी। आखिरी बार यह आंकड़ा 2019-20 में 10% से ज्‍यादा गया था। कार्पोरेट क्षेत्र जोखिम से बचना चाहता है। इसलिए एक सतत निजी-निवेश चक्र कैसे उत्‍पन्‍न हो, यह वर्तमान में एक महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है।

अर्थव्‍यवस्‍था को गति देने के 10 उपाय निम्‍न हैं –

  • तेल के झटकों का भार उपभोक्‍ताओं पर डालना चाहिए। मूल्‍य संकेत वह प्रणाली है, जिसकी मदद से मांग और आपूर्ति में संतुलन बनता है। कीमतों के नियंत्रण से वित्तीय संतुलन पर दबाव पड़ता है।
  • विनिमय दर को लचीला बनाना चाहिए। इसके नियंत्रण से आर्थिक वृद्धि प्रभावित होती है।
  • हमें उच्‍च उत्‍पादकता के लिए निर्यातकों और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की आवश्‍यकता है। इस अराजकता के युग में संचालन के लिए उन्‍हें वैश्विक वित्तीय प्रणाली तक पूर्ण पहुँच चाहिए। हमें प्रत्‍यक्ष कर संबंधी समस्‍या को हल करना चाहिए। हमें एक पूँजी खाता उदारीकरण का व्‍यापक पैकेज चाहिए। साथ ही कानूनी साधनों का मसौदा भी।
  • ऊंचे ईंधन मूल्‍य और मुद्रा अवमूल्‍यन, मुद्रास्‍फीति का दबाव उत्‍पन्‍न करेंगे। आर्थिक ढांचा विफल होने से नीति की विश्‍वसनीयता प्रभावित होगी। इसीलिए वित्त मंत्रालय को भारतीय रिजर्व बैंक की दी गई सहनशीलता सीमा को 2-6% से घटाकर 3-5% कर देना चाहिए। इसके लिए आरबीआई के अधिनियमों में भी संशोधन करना होगा।
  • बढ़ते राजकोषीय घाटे के समेकन के लिए एक विशेषज्ञ समिति बननी चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि 2027 और उसके बाद के वर्षों के बजट में सकल घरेलु उत्‍पाद का 0.5% का सतत प्राथमिक अधिशेष सुनिश्चित हो सके।
  • कंपनियों के अंतरराष्‍ट्रीयकरण के लिए आर्थिक सहयोग और विकास देशों के साथ गहरे व्‍यापार समझौते करने होंगे तथा इनमें अधिक उदारीकरण भी करना होगा। द्विपक्षीय संधियों के साथ ही निजी विदेशी कारोबारियों को आश्‍वस्‍त करने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय मध्‍यस्‍थता और अंतरराष्‍ट्रीय कर मध्‍यस्‍थता की आवश्‍यकता है।
  • अप्रत्‍यक्ष कर प्रणाली भारत में निवेश करने वालों को रोकती है। इनपुट टैक्‍स क्रेडिट में बाधाओं ने वस्‍तु एवं सेवा कर सुधार से प्राप्‍त लाभों को कई मायनों में उलट दिया है। जीएसटी को 10% की एकल दर में परिवर्तित करना चाहिए।
  • वैश्विक प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश और पोर्टफोलियो निवेशक भारत की गैर-मानक कार्य प्रणालियों से आशंकित है। अधिकांश मुद्दों पर हमें 10 मजबूत उभरते बाजारों के औसत दृष्टिकोण का शांतिपूर्वक अनुसरण करना चाहिए।
  • परियोजना प्रबंधन और तकनीकि क्षमता के लिए मुद्रास्‍फीति लक्ष्‍यीकरण, जीएसटी और दिवालियापन तथा ऋणशोधन अक्षमता संहिता के जैसी ही सफलता पाने वाली नीतियों को उपरोक्‍त नीतियों पर लागू करना चाहिए।
  • आर्थिक एजेंट ऐसा भारत चाहते हैं, जो कानून के शासन और वैश्‍वीकरण के प्रति समर्पित हो तथा विकेंद्रीकृत हो। असामान्‍य बयान महत्‍वपूर्ण लोगों के विश्‍वास को बाधित करते हैं।

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