अरावली पर विवाद
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कुछ समय से केंद्र सरकार अरावली में खनन के सवाल पर बड़े विवाद से जूझ रही है। दरअसल 20 नवंबर को उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया था कि जब तक केंद्र की निगरानी में सतत् खनन के लिए एक मैनेजमेंट योजना नहीं बन जाती है, तब तक इस इलाके में नई माइनिंग लीज पर रोक लगा दी जाएगी। इसी के साथ अरावली की व्याख्या पर भी विवाद चल रहा है।
कुछ बिंदु –
खनन से जुड़ा विवाद –
बड़े पैमाने पर होने वाले खनन से पूरे अरावली क्षेत्र का भू-जल कम हुआ है। क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। दिल्ली और हरियाणा में वायु गुणवत्ता प्रभावित हुई है। फिर भी न्यायालय खनन पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाना चाहता है। उसका मानना है कि भारत के विकास के लिए पत्थर और खनिजों की लगातार आवश्यकता है। दूसरे, रोक लगाने से गैर कानूनी खनन के मामले बढ़ेंगे। अतः उसने सरकारी मंजूरी के साथ जरूरी खनिजों के खनन की बात स्वीकार कर ली है।
अरावली की व्याख्या पर विवाद –
न्यायालय ने एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को मान लिया है। इसमें प्रस्ताव दिया गया था कि अरावली रेंज में ‘लोकल रिलीफ’ से 100 मीटर या उससे ऊँचे पहाड़ों को ही लिया जाना चाहिए। फार्वेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के 2010 के अनुमान के अनुसार इस व्याख्या से 92% पहाड़ियां अरावली से बाहर मानी जाएंगी। न्यायालय ने यह नहीं बताया कि उसने पहली व्याख्या के बजाय इस व्याख्या को क्यों मान लिया है।
उच्चतम न्यायालय का यह रवैया पर्यावरण नीति के विरूद्ध है। अरावली क्या है, यह एक ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक सवाल है। ऐसा लगता है कि यह व्याख्या खनन को स्वीकृती देने के उद्देश्य से की गई है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 दिसंबर, 2025