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क्या नैतिकता का तालमेल स्वहित के कारण बैठाया

Afeias
29 Nov 2017
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क्या नैतिकता का तालमेल स्वहित के कारण बैठाया

Date:29-11-17

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महान दार्शनिक अरस्तू ने लिखा था कि दुनिया के युवाओं को नैतिकता या नीतिशास्त्र ही पढ़ना चाहिए, क्योंकि यह कोई विज्ञान नहीं है। उनके अनुसार युवाओं को वहपढ़ना चाहिए, जो अच्छा है। भले ही वह उन्हें कम समझ में आए। वे अपने बड़ों और आदर्शों की नकल करना स्वीकारते हैं। मूल्यों का सबसे पहला कोष समाज होता है।अगर वास्तव में नैतिकता कोई विज्ञान नहीं है, तो उसे अन्य विषयों की तरह रटाकर या दोहराकर नहीं पढ़ाया जा सकता। अतः इस काम को भारत और यूनान में कवियों पर छोड़ दिया जाता था। संगीत, नृत्य और नाटकों के द्वारा प्रशंसा योग्य व्यक्ति की प्रशंसा और निंदा योग्य की निंदा की जाती थी। समाज के लोगों की नैतिकता देखी या सुनी हुई कथाओं के आसपास घूमती थी। ‘‘इथोस’’ या लोकनीति, जिससे एथिक्स शब्द बना, एक परंपरा थी।

भारत में कवियों के कार्यक्षेत्र में दार्शनिकों ने शायद ही कभी हस्तक्षेप किया होगा, क्योंकि गूढ़ दार्शनिक लेखन बुद्धिजीवी और अभिजात्य वर्ग तक सीमित था। इस वर्ग को पारस्परिक संबंधों की जटिलताओं को समझने की अपेक्षा दार्शनिक लेखन को मथना श्रेयस्कर लगता था।मानव व्यवहार दो व्यापक क्षेत्रों में संचालित होता है : ईश्वर के साथ प्रार्थना और अनुष्ठानों के माध्यम से। दूसरा, मनुष्यों, महिलाओं, पेड़-पौधों और पशुओं के साथ उसके व्यवहार से। यूं तो धर्म और नैतिकता में गहरा संबंध है। परन्तु इनकी पेचीदगियों के घालमेल को सुलझा पाना आसान नहीं है। हांलाकि दोनों ही क्षेत्र अच्छाई से जुड़े हुए हैं। ‘अच्छाई’, प्रशंसा के लिए एक सामान्य सा विशेषण है, जिसका अर्थ उससे जुड़ी वस्तु के अनुसार लगाया जा सकता है। बहुत समय तक दार्शनिक, इस शब्द से उलझते रहे हैं, फिर भी हमें इसके अर्थ का पूरा-पूरा ज्ञान नहीं है। इसे बहुवचन में देखें (गुड्स) तो यह भौतिक वस्तु के रूप में माना जा सकता है।

‘अच्छे’ का निर्धारण ‘बुरे’ को देखकर किया जा सकता है। मृत्यु एक अहितकारी है। बुढ़ापा और रूग्णता भी ऐसे ही हैं। ऐसा भगवान बुद्ध ने माना था। ऐसा मानने वाले वे अकेले नहीं थे। मानव की प्रारंभिक प्रार्थनाएं इन्हीं अहितकर विषयों से जुड़ी रहीं।परन्तु जो जीवित हैं, उन्हें जीवन पर ध्यान देना चाहिए; उस जीवन पर, जहाँ इच्छाएं और जरूरतें राज करती हैं। राजनीति के दो प्रधान अंग, कानून और नैतिकता को स्वार्थलोलुप व्यक्तियों पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया था। कविता ऐसा आकर्षण था, जो उन्हें रोमांचित करती थी और धीरे-धीरे उन्हें संयम और सादगी की ओर ले जाती थी। कवि होने के कारण उन्हें आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के साथ-साथ अप्रत्यक्ष रूप से जनता के विधायक की भूमिका भी निभानी पड़ती थी। क्योंकि उसे ही तब ऐसे अवसर मिल पाते थे, जब वह अपने आश्रयदाता के सामने सच्चाई बयां कर सके। स्वयं को बचाने के लिए वे पहेलीनुमा कथनों का सहारा लिया करते थे। इससे न केवल नैतिकता का हृास होता था, बल्कि दुश्मनी और वक्र संदर्भों के द्वार खुल जाते थे। इससे कवियों को जो धन प्राप्त होता था, वह अच्छा था। लेकिन छल द्वारा प्राप्त धन क्या वाकई अच्छा होता है? कभी-कभी आकस्मिक धन की प्राप्ति हो जाया करती थी। यह सच्चा धन होता था। परन्तु ऐसा धन जरूरतमंद को कहाँ मिलता है? जब कुछ गलत करके धन की प्राप्ति की जा सकती है, तो सही रास्ते पर क्यों चलना? कवियों ने भी ऐसी कथाएं गढ़ रखी थीं, जिसमें अंततः अच्छे व्यक्ति की बुरे पर जीत होती है। इस प्रकार उन्होंने इस पर जोर दिया कि अच्छा बनना ही आपके लिए अच्छा है।

अरस्तू ने नैतिकता को ऐसा ही अध्ययन बताया, जिसमें मनुष्य अपने लिए अच्छे के बारे में जान सके। उनकी पुस्तक में असंभाव्य सत्य के बारे में लिखा है : ‘‘सभी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अच्छे की कामना करते हैं।’’ अपने गुरू प्लेटो से भिन्न, उन्होंने स्पष्ट किया; ‘‘सभी लोग अच्छे की कामना तो करते हैं, परन्तु उन्हें हमेशा पता नहीं होता कि क्या अच्छा है।’’ यही वह बिन्दु है, जहाँ दार्शनिक मदद कर सकता है। प्रारंभिक दर्शन में कुछ आज की तरह की ही बात लिखी हुई थी। नैतिकता से जीने का अर्थ स्मार्ट और स्वस्थ जीने से था। इसकी तुलना चिकित्साशास्त्र से की गई थी। जिस प्रकार एक चिकित्सक शरीर की चिकित्सा करता है, उसी प्रकार एक दार्शनिक आत्मा की देखभाल करता है।जीवन की अनिश्चितताओं और व्यक्ति की सीमित दृष्टि को देखते हुए लोगों को उनकी भलाई के कार्यों के बारे में समझाना आसान नहीं है। इसके लिए समाज की सहायता की आवश्यकता है। अच्छी शिक्षा का यही उद्देश्य होता था। यह लोगों में अच्छा जीवन जीने की चेतना विकसित करती थी। अच्छे लोगों का अनुकरण करने से भलाई ही होती है, भले ही यह शुरू में समझ में न आए। यही प्रेरणास्रोत का महत्व है।

एक बार फिर उन कवियों की आलोचना की ओर लौटते हैं, जिन्होंने अपने आश्रयदाताओं को खौफनाक कर्म करने के बाद भी अदंडित के रूप में ही चित्रित किया। यूनानी दार्शनिकों ने इसकी आलोचना की। वहीं भारतीय दार्शनिकों ने ऐसा न करते हुए कवियों को उनके हाल पर छोड़ दिया।अगर नैतिकता में किसी की अपनी भलाई है, तो उसे ऐसे ही रहने का यह एक महत्वपूर्ण कारण है। चाहे यह कारण संतोषजनक न हो। नहीं तो, हम भी यहाँ नैतिकता की बात नहीं कर रहे होते। यह कैसे हो सकता है कि लोग उनके लिए क्या अच्छा है, इसे जानते हुए भी उसे न करें? क्या अभिनय करना हमेशा अच्छा हो सकता है? कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं, जब थोड़ा बहुत छल लाभदायक होता है। सही और तिकड़म या प्रपंच के बीच का द्वंद्व कोई नया नहीं है। व्यावहारिक होने की सलाह अक्सर दी जाती है। हमें अपनी भलाई को देखते हुए न्यायपूर्ण कृत्य को भी दरकिनार करने की बात कही जाती है। स्व-हितों का द्वंद्व अधिकांश लोगों के साथ चलता है, जिसमें स्वयं के बजाय दूसरे को उसका देय देने की नैतिकता की मांग चलती रहती है। फिर भी, सभ्यताओं के निर्माण में व्यक्ति के आर्थिक हितों के साथ-साथ नैतिक हितों ने भी प्रेरणा-शक्ति का काम किया है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित विनय तंखा के लेख पर आधारित।

 

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