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आखिर क्या ढूँढ़ता है यू.पी.एस.सी. आपमें-2

Afeias
22 Jun 2014
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मेरे प्रिय मित्र, पिछले अंक में मैंने प्रारम्भिक परीक्षा के स्वरूप का विश्लेषण करते हुए आपको कुछ ऐसी बातें बताने की कोशिश की थी, जिनकी अपेक्षा यूपीएससी आपसे करता है। यह लेख उसी का अगला एवं अंतिम भाग है। इसमें आप मुख्य परीक्षा तथा इन्टरव्यू के संदर्भ में आयोग की जरूरतों को समझ सकेंगे। यहाँ मैं यह बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि आप ऐसा बिल्कुल भी न समझें कि मैं ये सभी बातें अपनी ओर से जबर्दस्ती खींचतान करके कह रहा हूँ। इसके बारे में आयोग ने पाठ्यक्रम बताते समय बहुत साफ तौर पर लिखा है। हाँ, यह संक्षिप्त में है, और काफी कुछ सांकेतिक तौर पर भी। आप उसकी जाँच कर सकते हैं। मैंने आयोग के उन्हीं संक्षिप्त संकेतों की यहाँ विस्तृत व्याख्या करने का प्रयास किया है, ताकि आप इन्हें साफ-साफ समझकर आई.ए.एस बनने की अपनी तैयारी को व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक रूप दे सकें। तो आइए, अब आगे चलते हैं।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं और मैं आपको भी कन्वींस करना चाहूँगा कि आय.ए.एस. बनने का जो सही परीक्षण स्तर है, वह यही है-मुख्य परीक्षा का स्तर। यह ठीक है कि प्रारम्भिक परीक्षा पास किए बिना आप इस स्तर तक नहीं पहुँच पाते, लेकिन सही मायने में जो आपके ज्ञान, समझ, बोध आदि की चैतरफा और बहुत गहराई के साथ जाँच-परख होती है, वह इसी स्तर पर होती है। यहाँ तक देखा गया है कि प्रारम्भिक परीक्षा में सफल होने वाले विद्यार्थी मुख्य परीक्षा में पच्चीस प्रतिशत तक नम्बर नहीं ला पाते। ठीक इसके विपरीत कुछ ऐसे परीक्षार्थी भी होते हैं जिन्हें प्रारम्भिक परीक्षा से डर लगता रहता है, किन्तु मुख्य परीक्षा पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ होती है। इस तथ्य की चर्चा मैं यहाँ इसलिए कर रहा हूँ, ताकि आप इन दोनों परीक्षाओं के अन्तर को समझ कर अपनी तैयारी को एक वैज्ञानिक रूप दे सकें और अपने मस्तिष्क और व्यक्तित्व को भी उसके अनुकूल ढाल सकें।

अब हम देखते हैं कि मुख्य परीक्षा में यू.पी.एस.सी. हमसे क्या-क्या अपेक्षाएँ करता है।

ऊपरी तौर पर एक बात कही जा सकती है कि प्रारम्भिक परीक्षा जहाँ मस्तिष्क की गुणवत्ता की खोज करता है, वहीं मुख्य परीक्षा विचारों की गुणवत्ता की। कई विकल्पों में से सही विकल्प ढूँढ़ना और वह भी एक निश्चित समय में ढूँढ़ना प्रारम्भिक परीक्षा की एक सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसलिए वहाँ मस्तिष्क की स्पष्टता और मजबूती चाहिए। मुख्य परीक्षा में विकल्पों के लिए कोई स्थान नहीं होता। यहाँ कॉपी पर जो कुछ भी उतरेगा, वह आपको अपने दिमाग से उतारना होगा। यहाँ बना-बनाया कुछ भी नहीं है। आपको बनाना होगा। इस बनाने की प्रक्रिया के दौरान आपके कौन-कौन से गुण अनजाने में ही अप्रत्यक्ष रूप से आपकी कॉपी में उतरकर परीक्षक के सामने आपके प्रतिनिधित्व करते हैं, यहाँ हम यही जानने की कोशिश कर रहे हैं।

मुख्य परीक्षा का स्वरूप इस प्रकार का होता है –

  • चार प्रश्न-पत्र सामान्य ज्ञान के होते हैं। एक प्रश्न-पत्र नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरूचि का होता है। दो प्रश्न-पत्र किसी वैकल्पिक विषय के होते हैं।
  • एक प्रश्न-पत्र निबन्ध का होता है।
  • एक प्रश्न-पत्र सामान्य अंग्रेजी का होता है और एक सामान्य हिन्दी का।
  • सभी प्रश्नों के स्वरूप व्याख्यात्क होते हैं।
  • शायद ही कोई प्रश्न सीधे-सीधे पूछा जाता है।
  • अधिकांश प्रश्नों में आपको अपने विचारों को लिखने की गुंजाइश दी जाती है।
  • सामान्य अध्ययन के प्रश्नों में शब्दों की सीमा निर्धारित होती है।

अब हम प्रश्नों के इस स्वरूप के आधार पर उन गुणों को स्पष्ट करना चाहेंगे, जो यू.पी.एस.सी. हमसे चाहता है।

विश्लेषण करने की क्षमता

रटकर लिख देने की क्षमता यहाँ बिल्कुल भी काम नहीं करती। सच तो यह है कि प्रश्न ही कुछ इस तरह से पूछे जाते हैं कि उनके रटेरटाए जवाब हो ही नहीं सकते। रटे हुए तथ्यों की उपयोगिता यहाँ केवल इतनी भर होती है कि वे विश्लेषण करने में तथ्यों का काम करेंगे, कंटेंट का काम करेंगे। आपने जो कुछ भी उस टॉपिक पर पढ़ा है, वह यहाँ कच्चे माल की तरह काम आना चाहिए, जैसे कि सब्जी बनाने में आलू, गोभी, नमक मिर्च और मसाले काम आते हैं। इन चीज़ों को मिला देने भर से सब्जी नहीं बनती। इन्हें पकाना पड़ता है। ठीक यही बात सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा पर लागू होती है।

मैं एक बार फिर से आपसे अनुरोध करूँगा, इससे पहले कि आप इसे आगे पढ़ें, आपको मुख्य परीक्षा के अनसाल्ड पेपर पढ़ लेने चाहिए। प्रश्नों को देखने केे बाद आपको लगेगा कि हर प्रश्न आपसे विश्लेषण की मांग करता है। जो कुछ भी आपने पढ़ा है, वह ठीक है। लेकिन यहाँ जरूरत इस बात की है कि उस पढ़े हुए को आपने समझा कितना है और समझने के बाद आप किस प्रकार उसका विश्लेषण कर सकते हैं।

यह मस्तिष्क की गुणवत्ता की एक परख होती है कि जो मस्तिष्क जितना अधिक विश्लेषण कर सकता है, उसे उतना ही उपजाऊ मस्तिष्क माना जाता है। विश्लेषण करने की क्षमता ही अपने-आपमें मस्तिष्क की एक्सरसाइज होती है और जिस प्रकार एक्सरसाइज शरीर को स्वस्थ और मजबूत बना देता है, उसी प्रकार विश्लेषण भी मस्तिष्क को अधिक स्वस्थ और उपयागी बना देती है। हमें ऐसे ही मस्तिष्क वाले प्रशासक चाहिए।

मौलिकता

केवल विश्लेषण ही पर्याप्त नहीं है। आप एक बार फिर से मुख्य परीक्षा के प्रश्नों को पढ़िए और ध्यान से पढ़िए। आप देखेंगे कि अधिकांश प्रश्नों के साथ कुछ इस तरह का पूछल्ला जुड़ा रहता है कि ‘आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए’, ‘समालोचनात्मक विवेचन कीजिए’, ‘विवेचना कीजिए’, तथा ‘इसके लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए’ आदि-आदि।’ आपने विषय पढ़ा है। सामान्य ज्ञान के बारे में आप जानते हैं, ठीक है। आप उसका विश्लेषण भी कर सकते हैं, यह भी ठीक है। आपने जो पढ़ा है और जाना, वह आपके मस्तिष्क की सजगता और सतर्कता का प्रमाण है। आपने उनका विश्लेषण किया, यह मस्तिष्क के चमकदार और उपजाऊ होने का प्रमाण है।

लेकिन जब आप उस विषय के बारे में अपने विचार देते हैं, तो वह सही मायने में इस बात का प्रमाण होता है कि उस उपजाऊ दिमाग से अंततः उपजा क्या है। यहीं आपके मस्तिष्क की मौलिकता की परख होती है। यही इस बात को प्रमाणित करता है कि आपका मस्तिष्क किसी भी विषय पर नए रूप में क्या सोचता है, कैसे सोचता है। और इस बात को कतई न भूलें कि जब हम मौलिक रूप में सोचते हैं, अपने विचार रखते हैं, तो उसमें हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रतिपादित होता है।

बहुत से विद्यार्थी इस ‘आप’ वाले उत्तर को हल्के-फुल्के ढ़ंग से लेते हुए इसे यूँ ही चलताऊ कर देते हैं। एक तो उन्हें यह लगता है कि यह बहुत उपयोगी नहीं है। पूरे प्रश्न का छोटा-सा हिस्सा ही तो है। साथ ही वे यह भी पाते हैं कि इसका उत्तर देना आसान काम नहीं है। कौन इसके साथ सिर खपाएं। चूँकि उन्होंने इससे पहले उस टॉपिक पर अपनी कोई सोच बनाई ही नहीं थी, इसलिए यहाँ उसके बारे में कुछ भी लिख पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है और यहीं वे चूक जाते हैं। फलस्वरुप यू.पी.एस.सी. मस्तिष्क की जिस मौलिकता की खोज कर रहा था, वह उन्हें वहाँ नहीं मिल पाता।

समाज अपने तरीके से चलता रहता है। अधिकांश चीज़ें रिपीट ही होती हैं। लेकिन समाज के विकास में मोड़ और उछाल तब ही आता है जब कोई मौलिक विचारों से प्रेरित होकर कुछ नया करता है। सही मायने में यह नया करना ही किसी भी प्रशासक का समाज और देश को अपनी ओर से दिया गया सच्चा योगदान होता है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसकी भूमिका महज एक ऐसे मैनेजर की तरह की रह जाती है, जो चीज़ों की केवल व्यवस्था करता रहता है। मौलिकता बहुत बड़ी चीज़ होती है, फिर चाहें तो वह जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो।

भाषा पर पकड़

सन् 1979 से पहले निबन्ध का पेपर होता था। बीच में इसे बंद कर दिया गया। लगभग एक दशक बाद इसे फिर से लागू किया गया। लागू करने के पीछे कारण बहुत स्पष्ट थे। पहला कारण था-किसी भी विषय पर परीक्षार्थी के विचारों की क्षमता को जाँचना, परखना और दूसरा था-उसकी भाषा तथा कहने की शैली को जानना। निबन्ध एक ऐसा प्रश्न-पत्र होता है, जिसकी विशेष तैयार नहीं की जा सकती। यह एक स्व-लेखन की तरह होता है और कोई भी ऐसा परीक्षार्थी नहीं होता, जो निबन्ध लिखकर नहीं आता हो। यह बात अलग है कि वह कौन-सा निबन्ध लिखता है और किस प्रकार लिखता है।

यह सबसे सरल पेपर होता है, लेकिन सबसे अधिक चुनौतियों से भी भरा हुआ। चुनौती इस मायने में कि यह विज्ञान कम है और कला ज्यादा। बहुत साफ है कि जब कोई विषय कला के दायरे में आ जाता है, तो उसकी सीमाएं खत्म हो जाती हैं और वह पूरी तरह से व्यक्ति पर आधारित हो जाता है। सामान्य ज्ञान के उत्तर लिखने के लिए तथ्य निश्चित होते हैं। आप्शनल सब्जेक्ट के प्रश्नों के जवाब देने के लिए किताबें हैं। लेकिन निबन्ध लिखने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं होता। यहाँ तो निबन्धकार की भूमिका एक ऐसी मधुमक्खी जैसी हो जाती है, जो पता नहीं कितने फूलों पर बैठकर थोड़ा-थोड़ा रस चूसती है और फिर उनसे शहद बनाती है। यानी निबन्ध लिखते समय न जाने कहाँ-कहाँ का ज्ञान सिमटकर उस एक निबन्ध में आता जाता है और इसी से पता लगता है कि जिसने निबन्ध लिखा है, उसके अध्ययन का दायरा कितना विशाल है और तथ्यों के बारे में उसकी समझ कितनी गहरी है और किस प्रकार वह अपने तथ्यों का इस्तेमाल कर पाता है।

इससे भी बड़ी बात है, इन सबकी अभिव्यक्ति, इन सबकी बुनावट की। ध्यान रहे कि निबन्ध ज्ञानियों के लिए नहीं लिखे जाते। यह सामान्य पाठकों के लिए लिखे जाते हैं। इसलिए निबन्ध लिखते समय एक अनकही चुनौती यह होती है कि आप कैसे इस प्रकार का निबन्ध लिखते हैं, जिसे सामान्य पढ़ा-लिखा आदमी भी समझ सके, भले ही निबन्ध का विषय कितना भी कठिन और यहाँ तक कि विज्ञान के ही विषय से जुड़ा हुआ क्यों न हो। यदि निबन्ध की बुनावट बहुत अधिक बौद्धिक हुई, तो वह निबन्ध न रहकर लेख बन जाएगा। यदि उसकी बुनावट एकदम ही ढ़ीली-ढ़ाली हुई, तो वह यूँ ही एक प्रकार की बातचीत बन जाएगी। यहाँ सवाल यही उठता है कि किस प्रकार इसकी सही बुनावट को साधा जाए, ठीक वैसे ही, जैसे कि सितार के तार को यदि अधिक कस दिया जाएगा, तो वह टूट जाएगा और यदि थोड़ा भी ढ़ीला छोड़ दिया गया, तो उससे मधुर संगीत नहीं निकलेगा।
फिर बात आती है-भाषा की। एक प्रशासक के रूप में आपका सरोकार देश के आम लोगों तक से होगा। इसमें ऐसे लोग भी होंगे, जो बिल्कुल भी पढ़े-लिखे नहीं हैं। हर तरह की पृष्ठभूमि के लोग होंगे। आप जहाँ भी, जिस विभाग में भी हों, आपकी भूमिका एक लीड़र की भूमिका होगी। आपको दूसरों का नेतृत्व करना होगा। जब तक आपके पास सरल और सहज भाषा नहीं होगी, भाषा में लय नहीं होगी, उसमें तारतम्यता नहीं होगी, तब तक उस भाषा का प्रभाव ऐसा नहीं होगा कि आप लोगों का सहज रूप में नेतृत्व कर सकें। आपमें यह गुण है या नहीं, आपके द्वारा लिखा गया निबन्ध इस बात की तस्दीक कर देता है।

गागर में सागर

‘मुझे लगता है कि सामान्य ज्ञान के पेपर में जो प्रश्न पूछे जाते हैं, यदि उनमें शब्दों की सीमा को हटा दिया जाए, तो अधिकतर के उत्तर लिख पाना परीक्षार्थियों के लिए काफी आसान हो जाएंगे। लेकिन जो चीज़ एक के लिए आसान होगी, वह सबके लिए आसान होगी और जो चीज़ सबके लिए आसान हो जाएगी, तो उसमें से बेहतर को छाँटना असम्भव हो जाएगा। इस प्रकार प्रश्नों के साथ शब्दों की सीमा निर्धारित कर एक ऐसी कसौटी पेश की गई है, जिस पर यह जाँच-परख की जा सके कि किस मस्तिष्क के पास स्वयं पर ऐसा नियंत्रण है कि वह अपने विचारों को उसी दायरे में व्यक्त कर सकता है, जिस दायरे में उसे व्यक्त करने को कहा गया है। यह क्षमता एक प्रकार से इस बात को प्रमाणित करने वाली अद्भूत क्षमता है कि हमारा हमारे विचारों पर कितना अधिक नियंत्रण है।

शब्दों के निर्धारित सीमा में ही अपने उत्तर को प्रस्तुत कर पाना किसी के लिए तब तक सम्भव नहीं होता, जब तक उसने उस विषय को बहुत अच्छी तरह पचा न लिया हो। रट्टू तोते तो इससे बाहर हो ही जाते हैं। इस प्रकार यह इस बात को भी सिद्ध करता है कि आप जिस विषय पर लिख रहे हैं, उसे आपने अच्छी तरह अपने दिमाग में रचा-बसा लिया है।

निश्चित रूप से शब्दों की सीमा में ही अपनी बात को कह देना अभिव्यक्ति की एक अनूठी शैली को भी व्यक्त करता है। यह एक प्रकार से पहाड़ों पर पतली से सड़क पर अपनी कार को चलाने के एक ऐसे कौशल की तरह है, जिसका अपने स्टेयरिंग पर पूरा-पूरा और मजबूत नियंत्रण है और यदि कंसर्नटेशन थोड़ा भी गड़बड़ाया, तो कार सीधे खाई में जाकर गिरेगी।

व्यावहारिक रूप में भी जब आप सिविल सेवा में आएंगे, तो यह लगभग रोजाना की ही बात होगी कि आपको अपने सीनियर्स को न जाने कितनी बातों की मौखिक जानकारी देनी होगी और फाइल पर भी न जाने कितनी टिप्पणियाँ लिखनी होंगी। लम्बी-चैड़ी बातें और बड़ी-बड़ी टिप्पणियाँ कमजोर एवं भ्रमित मस्तिष्क की देन होती है। जो व्यक्ति अपनी बात को जितने संक्षिप्त रूप में कह या लिख पाएगा, वह उतना ही सफल प्रशासक माना जाता है, क्योंकि वह वही बातें कहता और लिखता है, जो कही जानी चाहिए और लिखी जानी चाहिए। शब्दों की सीमा इस तथ्य की जाँच करती है।

सत्यनिष्ठा की परख

सच पूछिए, तो चाहे किसी प्रशासक की बात हो, राजनेता की बात हो, आदमी की बात हो, किसान और मजदूर की बात हो, या कि किसी सामान्य नागरिक की बात हो, वह जो कुछ भी करता है, उसके होने और उसके प्रभाव का मूल आधार होता है-उसकी सत्यनिष्ठा जिसे हम अंग्रेजी में ‘इंटीग्रीटी’ कहते हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर सन् 2013 की मुख्य परीक्षा में नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि का एक स्वतंत्र प्रश्न-पत्र रखा गया। यदि आपने इसके अनसाल्ड पेपर देखे होंगें, तो आपको लगा होगा कि यह प्रश्न-पत्र मुख्यतः ‘केस स्टडीज’ पर आधारित है। इसके अंतर्गत एक स्थिति दे दी जाती है और उस स्थिति के प्रति आपके दृष्टिकोण को जाना जाता है। एक स्थिति पर कई-कई दृष्टिकोण होते हैं, जो उस व्यक्ति के उत्तर में अपने-आप ही उभरकर आ जाते हैं और परीक्षक उसी आधार पर आपको अंक दे देगा। फलस्वरूप कम से कम इतना तो हो ही सकेगा कि अधिकारियों के चयन के स्तर पर अपेक्षाकृत अधिक सत्यनिष्ठ एवं सकारात्मक सोच वाले युवकों का चयन होने की सम्भावना बढ़ जाएगी।

साक्षात्कार

यह चयन की एक ऐसी पद्धति है, जो लगभग-लगभग सभी सेवाओं में उपयोग में लाई जाती है और पूरी दुनिया में इसका भरपूर उपयोग किया जाता है। यह तो हो सकता है कि किसी सर्विस में भर्ती के लिए लिखित परीक्षा ली ही न जाए, लेकिन यह नहीं होता कि साक्षात्कार न लिया जाए। अधिकांशतः ऊँचे-ऊँचे पदों के लिए तो केवल इन्टरव्यू के आधार पर ही भर्ती कर दी जाती है। इससे ही आप इन्टरव्यू के महत्व को समझ सकते हैं।
सिविल सेवा के आरम्भिक दो चरणों में आपका मूल्यांकन अप्रत्यक्ष रूप से हुआ है। लिखित परीक्षा में निश्चित रूप से काफी छटनी हो जाती है और सामान्य स्तर से काफी बेहतर स्तर के विद्यार्थी ही इन्टरव्यू तक पहुँचते हैं। यह माना जाता है, जो सिद्ध भी हो चुका है कि आवश्यक नहीं कि जो युवक मस्तिष्क से ठोस और मजबूत हो, विचारों से बहुत स्पष्ट, मौलिक एवं दूरदर्शी हो, जिसकी सत्यनिष्ठा भी संदेह सेपरे हो, उसका व्यक्तित्व भी अच्छा होगा। व्यक्तित्व अच्छे होने का अर्थ है, ऐसे गुणों का होना, जो लोगों का नेतृत्व कर सके, उन्हें प्रेरित कर सके, जिसमें अपने को बदलने की इच्छा हो और जिसका व्यवहार बेहतर एवं अनुकरणीय हो। इसे आप जीवन के वे गुण कह सकते हैं, जो तब आपके सामने आते हैं, जब आप किसी के साथ बात व्यवहार कर रहे होते हैं।

इन्टरव्यू में इन्हीं सबकी जाँच-परख की जाती है। भले ही यह होता तो अधिकतम् आधे घंटे का ही है, लेकिन आपका इन्टरव्यू लेने वाले विशेषज्ञों के अनुभव और उनकी चैकन्नी आँखें परीक्षार्थी के अन्दर उतरकर उसका पूरा आन्तरिक एक्स-रे कर लेती हैं। आपके हाव-भाव (बॉड़ी लैंग्वेज), आपके बोलने का लहजा, उठने-बैठने के तौर-तरीके, पूछे गए प्रश्नों के दिए गए उत्तरों की चमक, बहस करने की कला, अपनी बात को स्पष्ट एवं प्रभावशाली तरीके से रखने की आपकी पद्धति तथा भाषा शैली आदि सभी चीज़ों के माध्यम से यह बात उभरकर सामने आ जाती है कि आपको प्रशासक बनाया जाना चाहिए या नहीं। यदि आपके व्यक्तित्व का प्रभाव नहीं पड़ पाता, तो फिर चाहे आप ज्ञान के मामले में कितने भी अद्भुत क्यों न हों, यहाँ असफलता ही आपके हाथ लगेगी।

मित्रो, मैंने इस अध्याय में बहुत विस्तार के साथ उन तथ्यों की चर्चा की है, जो परीक्षा के माध्यम से आपमें तलाश किए जाते हैं। यह न केवल मेरा ही अनुभव रहा है, बल्कि अन्य बहुत से सफल परीक्षार्थियों का अनुभव रहा है और मैंने अपने विद्यार्थियों को भी इससे परिचित करा कर उन्हें सफलता की मंजिल तक पहुँचाया है। इसलिए मैं इसकी उपयोगिता को न केवल जानता और मानता ही हूँ, बल्कि बहुत अधिक अहमियत भी देता हूँ। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि आय.ए.एस. की तैयारी केवल ज्ञान की ऐसी तैयारी नहीं है, जिसके लिए किताबें ही पर्याप्त हैं। उनकी जरूरत तो है ही, लेकिन केवल उन्हीं से बात नहीं बनती। मूलतः यह एक मनोवैज्ञानिक तैयारी होती है, मनोवैज्ञानिक यात्रा होती है। इसलिए यदि हम उन बातों को समझ लेते हैं कि वे मनोवैज्ञानिक तत्व कौन-से हैं, तो अनजाने में ही हमारे पढ़ने का तरीका और हमारे उत्तर लिखने की पद्धति, बिना कुछ किए ही अपने आप बदल जाते हैं और यह बदलाव हमारे पक्ष में होता है।

मैं जानता हूँ कि इस से जुड़े दो लेखो को पढ़ने के बाद आपको बहुत खुशी नहीं मिली होगी, क्योंकि इनमें ऐसा कुछ नहीं बताया गया है, जो परीक्षा में पूछा जाएगा। हो सकता है कि आप मन ही मन मेरे ऊपर ‘अनर्गल प्रलाप’ तक करने का आरोप लगाकर मुझसे नाराज भी हो रहे हों। लेकिन सच पूछिए तो इसमें मेरा कुछ भी दोष नहीं है, क्योंकि इसकी तैयारी है ही ऐसी, तो मैं कर क्या सकता हूँ। लेकिन इतना जरूर है कि इन दो लेखों को पढ़ने केे एक साल बाद जब आप इसके बारे में सोचेंगे, तो आप वही नहीं सोच रहे होंगे, जो आप अभी सोच रहे हैं। आपके पढ़ने का ढंग और सोचने का रंग चुपके-चुपके बदल चुके होंगे। और यही तो वह है, जो मैं चाहता हूँ। क्या आप भी ऐसा ही नहीं चाहते?

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